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बच्चों के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल आइए, बेहतरीन सुविधाओं का लाभ उठाइए

■ जिला महिला अस्पताल में हैं विशेषज्ञ:सीएमएस

मऊ। जिला महिला चिकित्सालय के शिशु रोग विभाग नवजात शिशु एवं बच्चों को सर्दियों में होने वाले रोगों को लेकर अत्याधुनिक संसाधनों व तीन शिशु रोग विशेषज्ञों की देखरेख में निःशुल्क सुविधा देने के लिये अनवरत कार्य कर रहा है। यह जानकारी जिला महिला अस्पताल के मुख्य चिकित्साधीक्षक (सीएमएस) डॉ आरके गुप्ता ने दी।
डॉ आरके गुप्ता ने बताया कि भारत की जनसंख्या का 40 फीसदी भाग 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है। उसमें से हर सौ बच्चों में से लगभग 12 बच्चे पाँच वर्ष से कम उम्र के हैं। उन्होने बताया कि सर्दियों में छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर ज्यादा प्रभाव होता है क्योंकि ज़्यादातर बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।
घर पर अच्छी तरह से देखभाल कर बच्चों को बहुत सी गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है। इसमें नवजात की माँ और घर वालों का जागरूक एवं तत्पर होना आवश्यक है। वहीं थोड़ी सी आसवधानी या लापरवाही खतरे का कारण बन सकती है।
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ सुरेंद्र राय ने बताया कि सर्दियों में उल्टी, पेट में दर्द, पीलिया, दस्त, जुकाम, खॉंसी, दांत निकलने की समस्या, टॉन्सिल, निमोनिया, खसरा-रूबैला, चिकनपाक्स व स्मालपाक्स आदि की बच्चों में ज्यादा समस्याएं होती है। इस मौसम में इन सभी बीमारीयों का बच्चों पर के स्वास्थ्य पर असर पड़ना एक सामान्य बात है। प्रमुख रूप से पतले दस्त का होना एवं आंव का गिरना एक अलग बीमारी है जो दस्त की बीमारी बच्चे में कुपोषण और विकास में बाधक साबित होती है। यह बीमारी दस्त के जीवाणु दूषित हाथों या भोजन-पानी के साथ बच्चों के पेट में पहुँचते है। 24 घंटों में तीन या तीन से ज़्यादा बार दस्त हों तो सावधान हो जाएँ। खून आने पर पेचिस हो सकती है। दस्त रोग से ग्रसित बच्चा कमजोर और उसका शरीर शुष्क हो जाता है। इससे निपटने के लिये ओ.आर.एस का घोल पिलाएँ और ओआरएस घोल न मिल पाने पर घर में चीनी और नमक का घोल बना कर बच्चे को दिया जा सकता है।
डॉ सुरेन्द्र राय ने बताया कि बच्चों में किसी भी प्रकार की बीमारी का आभास होते ही अपने निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या जिला महिला अस्पताल पर लेकर पहुचें यहाँ पर चौबीसो घंटे इलाज और पूरी तरह से निःशुल्क बेहतर सुविधा उपलब्ध है।
नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 (एनएफ़एचएस-4) के अनुसार जनपद मऊ के ग्रामीण क्षेत्र में दस्त की व्यापकता 27.9 फीसदी और कुल 26.6 फीसदी है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में दस्त वाले बच्चे को ओ.आर.एस प्राप्त होने की व्यापकता 25.3 फीसदी और कुल 24.5 फीसदी है।

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