बेरोजगारी पर ‘द सरस कलेक्शन’ जैसी योजनाओं से भी आस
विचार...
(संजय दुबे)
स्वतंत्र पत्रकार
मजदूरों की वर्तमान स्थिति से सभी वाकिफ है। इनकी अपने अपने घरों की वापसी काफी दर्दनाक है। ये वो तबका है जिसका भारत निर्माण में हर तरह से महत्वपूर्ण रोल है। चाहे वो उपभोग का मामला हो या निर्माण का। इनके इर्द गिर्द ही बाजार की अधिकांश गतिविधियां संचालित होती है। कोविड 19 महामारी की वजह से बाजार की सारी गतिविधियां बंद है। जिसके चलते इनकी आमदनी बंद है। वैसे भी इनकी आय इतनी नहीं रहती है कि ये उसमें से कुछ हिस्सा बचा सकें। जिससे इस तरह के हालात में वो कुछ महीनें बिना काम किये रह सकें।
ऐसा नहीं है कि ये प्रवासी मजदूर घर जाना ही चाहते है। मगर जब ये बंदी लंबी अवधि तक चली तब उनकी परेशानी बड़ी हो गयी। मसलन एक महीनें तक तो मकान मालिक ने किराया नहीं मांगा। मगर जब दूसरा महीना भी शुरू हो गया और किराया मिलने के आसार नहीं दिखें तब उसे भी पैसे की मजबूरी के चलते घर छोड़ गांव जाने को कहना पड़ा। इनके नियोक्ताओं की भी मजबूरी समझनी होगी। उनके पास जब तक रहा उन्होनें इनकी मदद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब उनका भी पैसा खत्म हो गया तब उन्होंने भी मजबूर होकर इनको जो उचित लगें करों, कहना पड़ा। असंगठित क्षेत्र देश को सबसे ज्यादा रोजगार देता है। इसमें प्राइवेट इंजीनियर से लगाए हज्जाम तक शामिल है। धोबी, दर्जी, जरीदोंज, ईंट बनाने वाले मजदूर, उसे खच्चरां पर ढ़ोने वाले गदहलद्दा आदि सबके हाथ खाली हो गए। जब समूचें देश की सारी आर्थिक गतिविधियां बंद है तब इनको अपने अपने गांव जाने के अलावा कोई चारा बचा ही नहीं। असंगठित क्षेत्र की ताकत को यूं समझा जा सकता है। इनका अर्थव्यवस्था में योगदान 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। अपने देश में तकरीबन 50 करोड़ का कार्यबल है। इनमें से भी तकरीबन 45 करोड़ के आस पास असंगठित क्षेत्र में है। इनमें भी तकरीबन 80 प्रतिशत के आस पास ग्रामीण रिहाइशी है। ये कृषि कार्य या लगन सहालग के वक्त जब गांवो को वापस लौटते है तब इस देश के कई औद्योगिक उत्पादन तक प्रभावित हो जाते है। अब जब ये सभी गांवो को वापस आ चुके है या आने वाले है तब वहीं प्रश्न यहां भी खड़ा होगा। जो महानगरों में था। मतलब,काम का। गांव में अगर इतनी बढि़या व्यवस्था होती तो वो गए ही क्यों होते?
सरकारों को भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर वो करें क्या? मजदूरों की घर वापसी के मसलें पर इस देश की वों सरकारें भी असफल रहीं जिन्हें इस देश के कई पैमानें पर अव्वल राज्य का दर्जा हासिल है। महाराष्ट्र्, तमिलनाडु, पंजाब, कर्नाटक,गुजरात जैसे राज्य भी अपने यहां इनको रोक पाने में असफल रहें। इनसे उम्मीद इसलिए ज्यादा थी कि इनके पास यूपी,बिहार से ज्यादा आर्थिक संसाधन है। उनसे कम आबादी है। इस महामारी के वक्त कई बातें प्रमुखता से उभरी है। जैसे, अब सिर्फ दिखाऊ नीति के बजाय एक खास ठोस नीति परवान चढ़ती दिख रही है। जिसमें मजदूरों के पास खर्च के लिए और नियोक्ताओं के पास माल,मजदूरी और अन्य नीतिगत खर्चों के लिए नकदी पर्याप्त रहने की आस जगी है। अभी तक केंद्र सरकार नें 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज दिया है। अर्थ व्यवस्था को सम्हालनें के लिए ये संजीवनी है। ऐसा कई अर्थशास्त्रीयों का मानना है। राष्ट्र्ीय सैंपल सर्वे के मुताबिक इस समय बेरोजगारी की दर 27 फीसदी के आस पास हो गयी है। ये एक गंभीर बात है। क्योंकि इसका मतलब है कि देश के भीतर मौजूदा कार्यबल का तकरीबन आधा हिस्सा बेरोजगार है। दिंसबर 2019 में श्रम शक्ति की भागीदारी 49.3 फीसदी थी। आज जो घटकर 27 प्रतिशत के पास आ पहुंची है।
गांवों को वापस पहुंचे मजदूर क्या करेंगें? इनके लिए राज्य सरकारों को योजनाएं बनानी ही होगी। क्योंकि इसकी दोहरी मार पड़नी तय है। जो मजदूर पंजाब,महाराष्ट्र्,गुजरात से आया है वो इतनी जल्दी वापस नहीं जाएगा। अब अगर जहां इंडस्ट्र्र्ीज खुलेंगी तब वहां मजदूरों की समस्या आनी स्वाभाविक हो जाएगी। पहले तो वो मिलेगें नहीं अगर मिल भी जायेगें तब कुशल नहीं होगें। लिहाजा उत्पादन भी प्रभावित होगा। ऐसा भी नहीं है कि इस दौर में सकारात्मक कुछ हो ही नहीं रहा। इसके मद्देनजर केंद्र सरकार के एक मंत्रालय ने एक योजना शुरू की है। जिससे काफी उम्मीदें है। इसके सफल होने की संभावना भी ज्यादा है। इसकी शुरूआत केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बीतें 4 मई को बिक्री के आनलाइन पोर्टल जीईएम पर की। इसका नाम द सरस कलेक्शन रखा गया है। इस योजना में ग्रामीण इलाकों के स्वयं सहायता समूहों द्धारा निर्मित उत्पादों को केंद्र राज्य सरकारों के खरीदारों को बेचा जाना है। इसमें स्वयं सहायता समूह पांच उत्पादों को बेचेंगें। हस्तशिल्प, हथकरघा और वस्त्र, कार्यालय प्र्रयोगीय सामान, रसोई के सामान, राशन ,व्यक्तिगत देखभाल और स्वच्छता संबधी सामान। इस योजना के पहले चरण में 11 राज्यों के 913 स्वयं सहायता समूहों ने 442 सामानों के बेचने के लिए पंजीकरण कराया है। इसका सबसे बड़ा फायदा इनको मिलना तय है। क्योंकि ये सीधे यहां सरकार द्धारा रजिस्टर्ड खरीदारों को माल बिना बिचौलिए के बेच सकेंगें। ये प्रयोग अगर सफल हुआ तब ग्रामीण भारत में एक नये आर्थिक अध्याय की शुरूआत होगी। जो भविष्य में पांच वस्तुआें से बढ़कर पाच सौ तक भी हो सकती है। ग्रामीण अंचल से मजदूरों के पलायन की जगह हो सकता है कि कई उत्पादन इकाइयां इस इलाके का रूख कर लें। जहां भी राज्य सरकार का विनिर्माण ढांचा मौजूद होगा वहां ऐसा होने में आसानी होगी।
जीईएम दरअसल एक सरकारी ई मार्केट प्लेस है। इसको बनाने के पीछे सरकार की मंशा नए शुरू हुए स्टार्ट अप को बढ़ावा देने की है। इससे 25 फीसदी सरकारी कंपनियों को माल खरीदनें की अनिवार्य शर्त केंद्र सरकार द्धारा लगायी गयी है। जिसका फायदा यहां रजिस्टर्ड सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों (एमएसई) को खूब मिला। आज इस प्लेटफार्म पर 37 हजार से ज्यादा खरीदार और 2.5 लाख के आस पास विक्रेता और सर्विस प्रदाता है। जो तकरीबन 10 लाख के करीब उत्पाद और 13 हजार से भी ज्यादा तरह की सेवा उपलब्ध करा रहे है। इसके कारोबार का अंदाज किसी मल्टीनेशनल सरीखा है। अपने स्थापना के साल इसने 420 करोड़ का आर्डर पाया। तो दूसरे साल इसने 6 हजार करोड़ का आर्डर पाया। इतना ही नहीं इसके बाद तो इसने कमाल ही कर दिया। तीसरे साल इसने 32 हजार करोड़ का आर्डर पाया। 2019-20 में इसे 1 लाख करोड़ के करीब पहुंचने का अनुमान है। फिलहाल इस पोर्टल पर 42 हजार से ज्यादा एमएसई जुड़े है। ऐसे में क्या इनसे आत्मनिर्भरता का रास्ता नहीं खुलेगा?


