रचनाकार

मन व्यथित हैं, भावनाये अब हो रही आहत

( आशा साहनी )

अभी दौर नहीं आया है खुलकर सांस ले पायें,
बिना मास्क के घर से हम बाहर निकल जायें।
थोड़ा सतर्क होकर अगर जिन्दगी हम जियेंगे,
तो एक दूसरे का साथ सहजता से चाय पीयेगें।
हम मिलें एक दूसरे से जरूरी नहीं है इस वक्त,
बस भावनायें अपनी, अपनों तक करते रहे व्यक्त।
चलो प्रभु के आगे हम सब भिखारी बन जाते हैं,
एक दूसरे के जिन्दगी की भिक्षा मांग आते है।
मन व्यथित हैं, भावनाये अब हो रही आहत,
चलो चलते हैं मिलकर हम सब प्रभु की अदालत।
ये वक्त नही है आपस में लड़ने और लड़ाने का,
मुश्किल को हिम्मत से जीत कर मुस्कुराते हैं।
अनेकता में एकता की भारतीय जो पहचान है,
वही हमारी दौलत और वही तो हमारा सम्मान है

(लेखिका आशा साहनी, मऊ उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं)

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