रचनाकार

महामारी

( डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा )


महामारी का आलम है
पसारती पाँव बीमारी।
सहमते डोलते सब हैं
कोई घर में छिपे बैठे।
बेशर्म लोग कुछ ऐसे
नोट पर दिख रहे ऐंठे।
चीखते लोग पीड़ा से
मुस्कुराते देख व्यापारी।
जीवन की है जो रेखा
दवा को भी छिपा देते।
साँस पर भी करें कब्जा
वे तिगुना दाम फिर लेते।
देख नफरत जगे मन में
बेदर्द हैं ये कालेबाजारी।
कहीं पे बेड नहीं मिलता
कहीं पे खत्म ऑक्सीजन।
दवा भी तो कहीं कम है
तड़प कर जान देते जन।
महामारी का आलम है
पसारती पाँव बीमारी।

( डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा”, दिल्ली )

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