” काउमैन से स्पोर्ट्समैन फिर एअरमैन और अब टैक्समैन”
मऊ के लाल, बेमिसाल..

खेल और पढ़ाई के अद्भुत मिश्रण को अगर इंसानी रूप में ढाला जाए तो मऊ जिले से भी एक नाम जरूर चर्चा में आएगा और वो नाम है अखिलेश कुमार यादव का। जिनकी पहचान अब ज्वाइंट कमिशनर, इनकम टैक्स विभाग, दिल्ली के रूप में है। लेकिन खेल से आज भी उनका दिली रिश्ता है।

यही वजह है कि जब अपना मऊ के संपादक आनन्द कुमार ने उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू किया और जब तक ये बातचीत खत्म नहीं हो गई, तब तक पढ़ाई और खेल के बीच करियर की संभावनाओं पर चर्चा होती रही।

यूं तो खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी अव्वल रहना आसान नहीं है। लेकिन अखिलेश के बताये रास्ते पर अगर चला जाए तो ये बिल्कुल भी कठिन नहीं है।

मऊ जिले के अमिला के जिस बरकोला गांव में अखिलेश का जन्म हुआ वो यादव बाहुल्य था। इसलिए वहां के ज्यादातर लोग कृषि और पशुपालन व्यवसाय से जुड़े थे। लेकिन अखिलेश की मंजिल कुछ और थी। इनका खेलों की तरफ झुकाव बचपन से ही रहा और ग्रामीण पृष्ठभूमि (अखाड़ा, गंवई खेलकूद) खेती किसानी से लगाव और बाबा स्व. रामयश यादव की प्रेरणा से वे खेलों की तरफ खिंचते चले गये, जबकि पूर्व अध्यापक पिता से वह पढ़ाई की बारीकियों को समझते थे. यही वजह थी कि अखिलेश बचपन से ही खेल और पढ़ाई दोनों में महारत हासिल करने में कामयाब रहे।



नंदन बाल विद्या मंदिर से शुरुआती शिक्षा, फिर प्राइमरी स्कूल अमिला और बाद में एस.एस.बी. इंटर कॉलेज अमिला में पढ़ाई के साथ-साथ वह खेल प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते थे। गांव में खेल के लिए तब कोई खास इंतजाम नहीं था, तो वह और उनके कुछ साथी खुद के बनाए सामानों से ही गांव के मैदान में खेल का अभ्यास करते थे, जैसे सीमेंट का गोला बनाकर, लकड़ी के फट्टे में कील लगाकर लम्बी कूद का बोर्ड, सफेदा के तने से पोल वाल्ट। अखिलेश अक्सर अकेले अपने ट्यूबवेल (डीह ) पर डिस्कस थ्रो , लांग जंप और जैवेलिन की अथक प्रैक्टिस करते थे और यही जुझारूपन उनके जीवन का हिस्सा बनता चला गया।

ग्यारहवीं में उनको पढ़ाई में और उनके दोस्त को खेल में अव्वल आने का पुरस्कार मिला, तो इसे देखकर अखिलेश ने स्वयं से कहा कि अगले साल से वह भी स्पोर्टस में प्रतिस्पर्धा करेंगे और इसके बाद उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी और समय देना शुरू कर दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि लॉन्ग जंप में 6.20 मीटर का जंप किया। 1992-93 मे स्कूली रैली में डिस्कस थ्रो में जिले में प्रथम स्थान पर रहे तथा मंडल स्तर तक अपने जिले के तरफ से खेले। पढ़़ाई में होनहार होने के कारण उनके पिताजी अक्सर उनके खेल के प्रति रुझान से रुष्ट रहते थे, जो अक्सर उन्हे खलता था। इसके अलावा ब्लाक, तहसील और जिला स्तर की ओपेन कैटेगरी में भी उन्हें लांग जम्प, ट्रीपल जंप, पोल वाल्ट, जैवेलिन थ्रो, डिस्कस थ्रो आदि प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज की।


खेल और पढ़ाई में अखिलेश का कारवां बढ़ता गया। अमिला के एस.एस.बी इंटर कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद अखिलेश यादव आगे की पढ़ाई और तैयारी के लिए इलाहाबाद (अब प्रयागराज) आ गए और यहीं उनको पहली सफलता मिली। पढ़ाई में भी अव्वल अखिलेश ने बेमन से ही एयरफोर्स की परीक्षा पास कर ली। दरअसल अखिलेश एयरफोर्स की परीक्षा में नहीं बैठना चाहते थे, लेकिन उनके पिता जी इसके तात्कालिक कारण बने। हुआ कुछ यूं कि एक दिन पहले ही एयरफोर्स की परीक्षा का एडमिट कार्ड उनके घर अमिला पहुंचा था। जिसको अखिलेश के पिता जी और उनके एक मुस्लिम दोस्त (रोजे के दिनो में) पूरा दिन कार से चलकर इलाहाबाद देने आए थे। इसके बावजूद अखिलेश ने अपने पिता से कहा कि वह इस परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहते हैं और आगे पढाई पर फोकस करना चाहते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने अपने दोस्त दयानंद सिंह के समझाने पर उस रात बिना किसी तैयारी के परीक्षा के लिए निकल पड़े और उनका सेलेक्शन एयरफोर्स में टेक्निकल ट्रेड (एयरमैन ) में हो गया। 1995 में उन्होंने भारतीय वायु सेना, यह सोच कर ज्वाइन किया कि उनको वहां खेलने और पढ़ने को दोनों मिलेगा। इस प्रकार यहां भी उनका पीछा खेल से नहीं छूटा और छूटता भी कैसे, पढ़ाई उनके मन में बसता था तो तन खेल के लिए बैचेन रहता था। नौकरी के दौरान ही उन्होंने एयरफोर्स टीम की तरफ से पोल वाल्ट, डिकैथेलॉन, लॉन्ग जंप, डिस्कस थ्रो जैसे खेलों में कई मेडल्स हासिल कर एयरफोर्स को भी गौरवान्वित किया।

अखिलेश अपने मां-बाप के बड़े बेटे थे तो जिम्मेदारियां भी बड़ी थीं। दादा जी उन्हें शुरू से रेसलर बनाना चाहते थे तो पिता बंशीधर यादव (रिटायर्ड, एस. डी. ओ., बी. एस एन एल.) चाहते थे बेटा कोई बड़ा अफसर बने। ये भी एक बड़ी वजह थी कि अखिलेश खेल और पढ़ाई दोनों को साधने में कामयाब रहे। किन्तु बाएं पैर की लिगामेंट्स इन्जरी के कारण वह अपने ही रिकार्ड को मीट नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में एयरफोर्स की नौकरी के दौरान ही वह इग्नू से ग्रेजुएशन और दो-दो विषयों में मास्टर्स की पढ़ाई भी पूरी करने में सफल हो गए। लेकिन कुछ बड़ा करने की चाहत उनके मन को हमेशा झकझोरती रही। उनके बचपन के गुरू स्व. रमेश गुप्ता, राजमन यादव आदि चाहते थे कि वो पीसीएस अधिकारी बने। बस इन्हीं सपनों और उम्मीदों के साथ वो आगे बढ़ते गए। इस बीच 21 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई और घर की जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं। लेकिन अखिलेश ने पढ़ाई का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने एक दिन अपनी पत्नी श्रीमती किरनलता से कहा कि वह आईपीएस अधिकारी बनना चाहते हैं। फिर क्या था, पति-पत्नी के बीच ऐसा सामंजस्य बना कि कामयाबी का रास्ता खुद निकल आया। हालांकि दो बार IAS की परीक्षा में असफल होने के बाद तीसरी बार 2009 में वह इस कठिन परीक्षा इम्तहाने हिन्दुस्तान (Civil services Exam 2009) को पास करने में कामयाब रहे, और इंडियन रेवेन्यू सर्विस के लिए उनका चयन हो गया। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय पत्नी किरन व बेटे रमन के सहयोग, माता श्रीमती सोनमती व पिता बंशीधर यादव एवं गुरु जन वृन्दो के आशीष, सच्ची लगन और मेहनत तथा ईश्वर की कृपा को दिया। नौकरी और पढ़ाई की जिम्मेदारी अखिलेश खुद उठाते थे, तो पत्नी बाकी सारी जिम्मेदारियां बखूबी संभालती थीं।

अखिलेश बताते हैं कि खेल और पढ़ाई को एक साथ साधने के लिए समय और सच्ची लगन की जरूरत होती है। वो जितना वक्त पढ़ाई को देते थे, उतना ही स्पोर्ट्स को भी। उनका मानना है कि खेल में रुचि की वजह से स्पोर्ट्समैन/ स्पोर्ट्स परसन के दिमाग तेज चलते हैं। वह बताते हैं कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरे दिल से काम करना होता है, भाषा पर अच्छी पकड़ परीक्षा को आसान बनाती है। इंटरनेट को लेकर वो बताते हैं कि इंटरनेट पिंडोरा ब़ॉक्स है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्या कंटेंट कहां से पढ़ना है।
वो बताते हैं कि किताबों की अहमियत कम नहीं हुई है। इसलिए किताब और इंटरनेट के साथ सामंजस्य लक्ष्य को भेदने का अच्छा फार्मूला हो सकता है। इसके अतिरिक्त उनकी अनन्य रुचि (हाबी) पुराने भोजपुरी लोक संगीत के गाऩो से भी रही है, और वे न सिर्फ़ उन्हे सुनने बल्कि गाने का भी शौक रखते हैं। आज भी वह रेगुलर बैडमिंटन और वालीबाल कोर्ट में वही अथक प्रयास करते हुए नजर आते हैं।
बात का सिलसिला खत्म करते हुए उन्होंने अपना मऊ की टीम के इस स्पेशल सेगमेंट ‘मिसाल-ए-मऊ’ की जमकर सराहना की और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि ये काबिले तारीफ पहल है। पता नहीं किस बात से किसको कहां प्रेरणा मिल जाए। उन्होंने बताया कि हमारे जिले में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। सिर्फ एक मोटिवेशन की जरूरत है जो “अपना मऊ” की टीम कर रही है।
अपना मऊ के संपादक आनन्द कुमार ने भी ज्वाइंट कमिशनर अखिलेश कुमार यादव, जो एक दुर्धर्ष व्यक्तित्व के स्वामी हैं, उनका कीमती वक्त निकालने के लिए आभार जताया और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। मऊ को अपने इस लाल पर गर्व है।


