मान गया बन्दे को
“पागल हो गई हो क्या ? अरे! दोस्त का मतलब सिर्फ दोस्त होता है . कमरे दो ही लेने पड़ेंगे …नहीं तो ..” प्रभात बोला .
“ओहो ! डरना मुझे चाहिए और डर तुम रहे हो. कैसे मर्द हो यार ..हा हा हा .” नीरा ने इठलाते हुए कहा .
“हाँ, मैं डर रहा हूँ . क्योंकि मर्द का काम अपनी इज्जत के साथ अपनी दोस्त की इज्जत की रखवाली करना भी है . कल को कोई अगर हम दोनों के बारे में कुछ कहेगा तो तुमसे ज्यादा बुरा मुझे लगेगा .” प्रभात बोला .
“हम्म्म….पर तुम साथ तो रहोगे न . वहां पूरे आयोजन में तुम्हारे सिवाय कोई नहीं है जान पहचान का .” नीरा बोली .
“हाँ, वो काम मेरा है . मैं साथ भी रहूंगा और थोडा बहुत समय मिला तो घुमा भी दूंगा बैंगलोर . देखो मैं उनमें से नहीं हूँ जो देह पर फिसल जाय . दोस्त हूँ तो दोस्ती की गरीमा भी जानता हूँ . चाहो तो जाने से मना भी कर सकती हो .” प्रभात ने कहा .
“लो सुन लिया . ये है मेरा दोस्त प्रभात . कितनी इज्जत करता है मेरी .” उसने फोन बंद करते ही पति से कहा .
“फिर भी मर्द तो है .” पति बोला .
“सच कहते हो …मर्द तो पिता भी होते हैं …जिन पर कोई शक भी नहीं करता और बेटियाँ भोगते हैं. उसने निर्णय मुझ पर छोड़ा है . कहो ! क्या कहते हो ?” पत्नी ने कहा .
“अब कहने को बचा क्या है . उस आदमी के दर्शन करना है . मैं भी चलूँगा रेलवे स्टेशन तुम्हें छोड़ने ….मान गया बन्दे को .”
शब्द मसीहा

