लकीर बड़ी खींचो
परसा राम शहर से अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने गाँव वापिस लौट रहा था . रेलवे स्टेशन पर बहुत सुन्दर नृत्य चल रहा था . कुछ अंग्रेज बहुत ही तन्मयता से हरे रामा हरे कृष्णा गा रहे थे . आने जानेवालों को वे गीता और श्री कृष्ण किताबें भी बेच रहे थे . कालेज की लायब्रेरी के लायब्रेरियन बहुत विद्वान और दयालु व्यक्ति थे . परसा राम वहां पर बहुत सी किताबों का अध्ययन करता रहता था . उसे इतिहास और धर्म दर्शन अच्छा लगता था . लायब्रेरियन ने एक रोज उसे अपनी गीता खरीदने को कहा था और साथ ही कहा था –
“बेटे ! गीता जीवन और व्यवहार का ग्रन्थ है . मैं जानता हूँ कि तुम्हारे धर्म अध्ययन का मंतव्य क्या है . किन्तु तुम धर्म के ज्ञान को कभी किसी को नीचा दिखाने के लिए या ख़ुद को बड़ा साबित और ज्ञानी दर्शाने के लिए मत करना . ज्ञान सदैव बड़ी जिम्मेदारी और अच्छे आचरण की जिम्मेदारी लेकर आता है .”
“सर ! तब बाकी लोग जो हमें छोटा और नीच कहते हैं, वे क्या गलत है ?” परसा ने पूछा .
“बेटा ! एक प्रश्न का जवाब दो ! अगर तुम्हें कोई पाक कला की किताब दे जिसमें बहुत अच्छे पकवान बनाने की कला हो तो क्या तुम्हारा पेट भर सकता है ?” लायब्रेरियन ने पूछा .
“नहीं , ऐसा तो कभी संभव नहीं . उस किताब को पढ़ना पडेगा , सारा सामान इकठ्ठा करना पडेगा और फिर विधि अनुसार खाना बनाना भी पडेगा . तब ही खाने के बाद भूख शांत होगी सर !”
“बस …यही अंतर है उनके पढने और तुम्हारे पढने में . तुम इस ज्ञान पर चलोगे तो जीवन सफल और श्रेष्ठ हो जाएगा . बाकी जन्म , गोत्र , जाति , धर्म सब छोटे-छोटे दायरे हैं . गीता में भगवान् श्री कृष्ण ही तो कहते हैं कि मैं सब में हूँ . अब स्वयं सोचों कि तुम किसी से ज्यादा या कम कैसे हो सकते हो ?” लायब्रेरियन बोले .
गाँव की तरफ बढ़ते हुए उसे सारी बातें याद आ रहीं थीं . उसने निश्चय किया कि वह अपने लोगों के दिमाग से इस छोटेपन और शूद्रता के विचार को सदा के लिए दूर कर देगा जो उन्हें दूसरों से मिलने नहीं देता और इंसान की तरह जीने का और बराबरी का अवसर समाप्त कर देता है .
गाँव पहुंचकर वह सबसे मिला और सबको शाम को उसने भागवत सुनने का निमंत्रण दिया . शाम को सब लोग एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए . टाट , बिछौना आदि भी ख़ुद ही बिछाया था परसा ने .
“भाइयो ! जय श्री कृष्ण . मैं आज आपको भागवत कथा और उसके सार के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ . हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं .”
“अरे! ये तो भगवान् बुद्ध ने नहीं कहा . हम तो जय भीम और नमो बुद्धाय कहते हैं .” एक व्यक्ति ने कहा .
“अरे! सुन तो लो पहले ये क्या कहना चाहता है . तुम पहले से क्यों उसकी बात के लिए दरवाजे बंद करते हो .” दूसरा व्यक्ति बोला .
“अरे! इस धर्म ने ही तो हमें इंसान नहीं रहने दिया . सदियों से सेवा की और पाया क्या ? तिरस्कार , नफरत और गरीबी ही न .” पहला व्यक्ति बोला .
“अरे! भाई , मानियो मत मानियो पर शान्ति से सुन तो सही . हमने कौन-सा उन पे फूल बरसाए हैं . उन्होंने नफरत की तो आज हम भी तो नफरत ही कर रहे हैं उनसे . इस नफरत का असर क्या होगा ? फिर लड़ेंगे -मरेंगे और जो कुछ बनाया कमाया है लुटा बैठेंगे अपना . ये कोई तीर, तलवार तो चलाने से रहा …बात ही तो कह रहा है अपनी .” दूसरा व्यक्ति बोला.
“चाचा ! आप मेरी बात सुन तो लो . आप तो बिना गुनाह की सजा मुझे दिए जा रहे हो . बैठ जाओ .” पर्सा राम बोला .
“अरे! तू कल का छोरा कैसे पंडित बन गया रे ?”
“जैसे आप भगवान् बुद्ध के अनुयाई बन गए . न मैंने कृष्ण को देखा और न तुमने बुद्ध को . हम सब तो ग्रंथों को पढ़ते सुनते हैं और अंदाजा लगाते हैं अपने-अपने दिमाग से फिर जैसा हमें सही और सुविधाजनक लगता है हम करते हैं . चलिए आप ही बताइये हम आम्बेडकर और बुद्ध को मानते हैं . उनकी तस्वीरें लगा रखी हैं घरों में पर क्या अहिंसा को अपनाया है ? क्या हमने मांस खाना छोड़ा है ? क्या हम दारू पीना छोड़ सके हैं ? क्या हमने दहेज़ लेना छोड़ा है ? क्या हम शादियों में दूसरों की बराबरी नहीं करते ? क्या हम उनके सारे रीति रिवाज अभी तक नहीं मान रहे हैं ?”
अब तो सभा में सन्नाटा छा गया था . परसा राम की बात कड़वी जरुर थी मगर सही थी .
“देखो सब लोग एक ही तरह से पैदा होते हैं. मुंह से ही खाते हैं . इसलिए किसी को छोटा या बड़ा मत समझो . आप कहते हैं मनुस्मृति को जला दो . मगर उसको जलाने से क्या होगा ? आप तो खुद जाटव, जटिया और खटीक करते रहते हैं . आप कौन-सा अलग व्यवहार करते हैं . अगर वो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र करते हैं तो आप भी तो वही करते हैं . उनमें और हम में क्या फर्क है ? ये वर्गीकरण रहा होगा सही कभी लेकिन आज जरुरत है कि हम आपस में सब को बराबर समझें . भगवान् बुद्ध ने कौन-सी अलग शिक्षा दी थी . हर संत ने, महापुरुष ने जीवन जीने की कला ही बताई है . फिर वह राम हो या कृष्ण , आम्बेडकर या बुद्ध . तुम सब फुले बाबा को कितना मानते हो ? पेरियार की बातों को कितना सुनते हो ? उसी तरह वे भी हैं , वे भी सही धर्म के रास्ते पर कहाँ चलते हैं . मनुष्य-मनुष्य में भेद करना तो ईश्वर की नजर में अपराध है . अगर वे लोग अपराध करते हैं तो उसकी सजा भी वे ही भुगतेंगे . हम उनके जैसे क्यों बनें? क्यों न अपने आचरण से, एक दूसरे की मदद से करें, खूब पढ़ें, अच्छा व्यापार करें अब नौकरियों की छोड़ो राह देखना . पैसे कम हैं तो मिलकर व्यापार करें. हमारा उत्थान हमारे ही हाथ में है और गीता यही कहती है कि किये गए कर्म का फल जरुर मिलता है . कहानियाँ मत सुनो -सुनाओ उन कथाओं और कहानियों या ज्ञान को जीवन में भी ढालो .” परसा राम बोला .
“बेटा! तू तो पढ़ लिख के बड़ा समझदारी की बात करने लगा रे ! शाबास .” एक बुजुर्ग बोला .
“दादा ! ग्रन्थ कोई भी बुरा नहीं . वे अपने समय के हिसाब से सही रहे पर जरुरत वर्तमान में सही को अपनाने की है . सब लोग अपने बच्चों को खूब पढाओ . आधी रोटी खाओ मगर घर में ज्ञान और पढ़ाई का दीपक जलाओ . जिसके पास अधिक है बाँट लो थोड़ा सा और पैसे की मदद नहीं समय और श्रम की मदद करो एक दूसरे की . किसी के विरोध से नहीं बल्कि अपने उत्थान से सम्मान मिलता है …बड़ी लकीर खींचना बहुत जरुरी है , बड़े बनने के लिए . लकीर बड़ी खींचो !”
शब्द मसीहा

