दुर्भाग्य क्यों ?
एक व्यक्ति बहुत समय तक ध्यान साधना करने के बाद अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला –
“गुरुदेव ! मेरा एक प्रश्न है आपसे . यदि आज्ञा हो तो निवेदन करूँ ?”
गुरु जी ने मुस्कुराते हुए प्रश्न पूछने को कहा .
“गुरुदेव ! संसार में इतना संशय और मनुष्य का दुर्भाग्य किस कारण से है ?”
“मैं जानता था कि साधना से लौटकर तुम ये प्रश्न जरुर करोगे . इस संसार में जो तुम विश्वास करते हो …वैसा ही होता है . तुम किसी को दुश्मन समझते हो …वह हो जाता है . तुम संशय करते हो और वह संशय सामने आ खड़ा होता है . जानते हो इंसान में कितनी शक्ति है , मगर वह उसका दुरूपयोग करता है , उसकी बाहरमुखी मेधा ही संशयों की जननी है . वह प्रश्न तो उठाता है मगर जहाँ से प्रश्न उठा है वहां पर उत्तर नहीं टटोलता . मनुष्य ने भगवान् गढ़े हैं, उनकी स्तुतियाँ की है और उनके लिए ही मनुष्य को मार रहा है . यही मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है.”
शब्द मसीहा

