रचनाकार

नखरेवाली…

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
टी वी पर चलती न्यूज देखकर दादी के चेहरे पर जैसे चमक-सी आ गई थी।
“अरे बेटा !इसे जरा दोबारा तो दिखा मुझे।” दादी ने कहा।
“क्या हुआ दादी ? ये तो बस चुनाव के समाचार हैं । और इसमें बड़ी बात भी क्या है , दो लोग एक साथ वोट डालने तो जा ही सकते हैं। इन टी वी वालों को और कुछ नहीं मिला तो ये शगूफा छोड़ दिया कि पिचासी साल की महिलाओं ने वोट डाला ।” पोता बोला।
“पर मुझे देखना है उन्हें।”दादी ने कहा।
“दादी! मेरे मैच चल रहे हैं । मैं तो वही देखने आया था । हाँ, मैं इसका लाइव प्रोग्राम वीडियो जैसे ही अपलोड होता है , आपको दिखाता हूँ। पर इस खबर में ऐसा है क्या , जो आप इतनी उतावली हो रही हैं ?” पोता टी वी का चैनल बदलते हुए बोला।
“तू नहीं समझेगा बेटा , ये बात उन दिनों की है जब तेरा बाप भी पैदा नहीं हुआ था । ये चेहरे देखकर बहुत कुछ याद आ गया । याद आ गए अपने बचपन के वो सुहाने दिन । देश में आंदोलन हो रहे थे । जगह-जगह से अंग्रेजों और हिंदुस्तानियों की खबरें आती थीं । क्या हिन्दू, क्या मुसलमान सब जैसे जान देकर आज़ादी पा लेना चाहते थे । जालिम अंग्रेज़ बहुत चालाक थे।”
“तुम्हें अभी तक याद है दादी ? तब आप कितनी बड़ी थीं ?” पोते ने पूछा।
“हम सात भाई बहिन थे । मैं सबसे छोटी थी । हमारे मोहल्ले में हिन्दू-मुसलमान सब साथ -साथ रहते थे । मिलकर हर खुशी मनाते थे । आज जैसा जहरीला माहौल नहीं था । ” दादी ने कहा ।
“ओफ्फो , दादी मैं आपकी उम्र पूछ रहा हूँ , उस समय आप कितनी बड़ी थीं ?”
“जब मुल्क आज़ाद हुआ तब मैं यही कोई चौदह पंद्रह साल की रही होंऊंगी । अगर मेरी नज़रों ने धोखा नहीं खाया है तो ये दोनों वही हैं । बहुत प्यार था इन दोनों में ।” दादी ने कहा ।
“किन दोनों की बात कर रही हैं?”
“वही जिन्हें टी वी पर दिखाया गया है। मेरा ब्याह हो गया था तब ।” दादी ने कहा।
“क्या बात कर रही हैं आप , चौदह पंद्रह साल में शादी भी हो गई थी आपकी !” पोते ने आश्चर्य से दादी को देखा ।
“हाँ रे, तब ब्याह जल्दी हो जाते थे , पर गौना भी होता था । शादी के बाद भी मैं कई साल घर रही । और जब तेरे दादा जी के साथ दिल्ली आई तो जैसे सब छूट गया , वो बचपन के दिन, खेल, मेरी सखियाँ…. और न जाने क्या-क्या ।” दादी ने कहा ।
“गौना क्या होता है दादी ?”
“हा हा हा …. अब सब्र कहाँ है आजकल के लोगों में । अब तो शादी के कार्ड के साथ हनीमून की टिकट बुक होती है । वो दिन ऐसे थे कि लोग भरोसा करते थे प्यार करते थे । वो जमीला तो मेरी विदाई में मेरे साथ ही आई थी । महिनाभर मेरी ससुराल में मेरे साथ रही और वो कलावती भी मुझे बहुत प्यार करती थी। बस माँ जाई नहीं थीं पर हम सब एक ही थीं जैसे । “दादी ने पुराने वक्त को याद करते हुए कहा ।
पोते की निगाहें बेशक टी वी स्क्रीन पर बार-बार जा रही थीं पर दादी की बातों को वह ध्यान से सुन रहा था ।
“तब तो मेरे साथ बहुत अन्याय हुआ है । मेरी शादी तो अट्ठाईस साल में हुई । ये तो परंपरा का पालन नहीं हुआ न मेरे साथ ….हा हा हा ।” पोता बोला ।
“तेरे बाप की भी पच्चीस साल में शादी हुई थी । जमीला की माँ से ही मैंने उर्दू और फारसी पढ़ना सीखा था, तब उर्दू और फारसी के साथ अंग्रेज़ी चलती थी। औरतों को बस इतना ही पढ़ाया जाता था कि ख़त पढ़ सकें, लिख सकें । आज की तरह किताबें भी हर जगह नहीं मिलती थीं । और गरीब लोग तो पढ़ने के बारे में सोचते भी नहीं थे । औरतों का पढ़ना -लिखना या आज की तरह नौकरी करना कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था । पर गरीब औरते अपने मर्द के साथ काम करने जाती थीं ।” दादी ने कहा।
“मतलब की आप गरीब नहीं थीं , तभी आपकी लिखाई-पढ़ाई का इंतज़ाम हो सका ।” पोते ने कहा ।
“हाँ, ये बात सही है । जमीला की माँ मुझे बहुत प्यार करती थी । उसका घर वाला हमारी दुकान पर काम करता था । बहुत नेक आदमी था। ” दादी ने मुस्कुराते हुए कहा ।
तभी बहू भी अपनी नौकरी से लौट आई थी । वह दादी के कमरे में पति को देख हैरान हुई और पूछा- “आज क्या खास बात है कोई ? टी वी तो हमारे कमरे में भी है ।”
“हाँ, टी वी तो है पर यहाँ दादी के कमरे में आमों के बौर की खुशबू आती है । अरे मैच अकेले देखने का क्या मजा , सो मैं दादी के पास आ गया।”
“दादी को क्या लेना तुम्हारे मैच से । कोई और ही बात होगी ।”
“नहीं, बस दादी के पास रहने का मन था । ” पति बोला।
“अरे तू अपना मैच देख जाकर , और बहू अभी कुछ देर पहले तेरे टी वी चैनल पे एक खबर आई थी दो बुजुर्ग औरतों के वोट डालने की । मुझे वो खबर देखनी है। इसने तो कुछ किया नहीं , क्या तू मुझे वो खबर दिखा सकती है ?” दादी ने पोते की पत्नी से कहा ।
“हाँ, याद आया । वो हमारा हैदराबाद का रिपोर्टर था कोई । चुनाव कवरेज के लिए वहाँ का लोकल रिपोर्टर है जुनैद फ़रूखी ।”
“हाँ हाँ वही …. उसके दादा को ही फारुखी कहते थे ।”
“उसमें ऐसा क्या है ?”
“पता नहीं क्यों मुझे लगा कि वो दोनों मेरी सहेलियाँ हैं। मैं उन्हें देखना चाहती हूँ । पर ये कह रहा था कि वीडियो अपलोड होगा तब दिखाएगा मुझे ।”
“हाँ, मैं अभी देखती हूँ । नहीं तो जुनैद का नंबर मालूम कर उस से फुटेज मँगवा देती हूँ ।”
“तू कुछ भी कर , पर मुझे न जाने क्यों कुछ महसूस हो रहा है कि हो न हो ये कलावती और जमीला ही हैं । हम तो हैदराबाद से दिल्ली आ गए और यहीं के हो कर रह गए । वे दोनों पक्की दोस्त थीं , एक ही मोहल्ले में ब्याही थीं ।” दादी ने कहा ।
बहू अपने कमरे में जाकर किसी से बातें करने लगी और फिर से दस -पंद्रह मिनिट बाद दादी के कमरे में लौटी ।
“क्या हुआ बेटी ? वीडियो मिला क्या ?”
“हाँ, वीडियो भी है और उसकी ओरिजनल रिकार्डिंग भी । जुनैद का नंबर भी मिल गया है ।”
“दिखा तो सही जरा मुझे । ”
“बस एक मिनिट रुकिए । मैं जरा मोबाइल को टी वी से कनेक्ट कर देती हूँ बड़ा और साफ दिखेगा ।”
“हाँ हाँ , जल्दी से कनेक्ट कर ले बेटी।” दादी की नज़रें बेकरारी से टी वी की स्क्रीन पर देख रही थीं। कुछ ही देर बाद वे दोनों बुजुर्ग महिलाएं एक-दूसरे का हाथ पकड़े दिखाई दीं।
“बस बेटा रोक जरा इसे ।” दादी गौर से उन चेहरों को देखने लगी। एक औरत बुर्के में थी और एक दूसरी बुजुर्ग औरत का हाथ पकड़े हुए थी । दूसरी औरत के माथे पर लाल बिंदी लगी हुई थी । आँखों से खुशी के आँसू बहाने लगे ।
“क्या हुआ दादी ? आप रो क्यों रही हैं ?” बहू ने पूछा ।
“तू न समझेगी बेटी । अगर इन बूढ़ी आँखों ने धोखा नहीं खाया है तो ये दोनों औरतें जमीला और कलावती ही हैं । क्या इनका नाम पता चल सकता है ?” दादी ने बहू की तरफ देखते हुए पूछा।
“कोशिश कर सकती हूँ । मैंने जुनैद का नंबर लिया है । उसे फोन करती हूँ , शायद कोई सुराग मिल जाय।” और बहू ने फोन लगाया ।
“हेलो ! मेडम, क्या हुआ जो आपको मेरे नंबर की जरूरत पड़ गई ? मैं तो लोकल ही कवर करता हूँ ।”
“जुनैद! तुमने एक बूथ वोटिंग कवरेज भेजी थी जिस में एक मुस्लिम और हिन्दू बुजुर्ग औरत थीं, क्या उनका नाम या कोई और डिटेल्स हैं तुम्हारे पास ?” बहू ने कहा ।
“पर हुआ क्या है मेडम?” जुनैद ने पूछा।
“मेरी दादी सास जो पहले हैदराबाद में रहती थीं उन्हें ऐसा लगता है कि वे दोनों औरतें उनके बचपन की सहेली हैं । जमीला और कलावती हैं उनके नाम, तो ये वही हैं ।” बहू ने कहा ।
“हाँ, मोहतरमा जमीला फ़रूखी और कलावती कश्यप है उनका नाम ।” जुनैद ने जवाब दिया ।
“एक रिक्वेस्ट है तुमसे । क्या तुम उनके एड्रेस पर जाकर उनसे किसी तरह बात करवा सकते हो। ” बहू ने पूछा ।
“हाँ , लेकिन जमीला जी को ऊंचा सुनाई देता है ।”
“कोई बात नहीं, हीयरिंग एड अरेंज कर के बात करवानी है उनसे ।” बहू ने कहा ।
“उन्हें कान में मशीन लगाना पसंद नहीं , कहती हैं , सुनाई नहीं देता तो सकून से रहती हूँ ।”
“मतलब कि तुम उन्हें पहचानते हो ? उनका कोई कांटेक्ट नंबर है ?” बहू ने खुश होते हुए पूछा।
“हाँ, लेकिन ऐसा क्या हुआ है कि आप मुझे तलाश रही हैं?” जुनैद ने पूछा।
“तुम बस किसी तरह बात कराओ । एक मजेदार स्टोरी मिलेगी तुम्हें और केमरा लेकर जाना । ” बहू ने कहा ।
“मैं कुछ समझा नहीं मेडम।”
“जब जानोगे तो बहुत खुशी होगी तुम्हें और दुआएं मिलेंगी वो अलग । ” बहू ने जैसे ही कहा तो दादी का हाथ अपने कमर पर पाया ।
“बस थोड़ा -सा इंतज़ार करना होगा आपको।”
“कितनी देर लगेगी वहाँ पहुँचने में ?” बहू पूछा।
“दादी जान अभी नमाज़ अदा कर रही हैं। जैसे ही उनकी शाम की चाय अम्मी लेकर जाएंगी मैं आपकी बात करवाता हूँ ।”
“ओ के वीडियो कॉल करवा देना और तुम दूसरे केमरे से शूट करना । तब तो तुम हमारे भी अपने हो । मेरी दादी सास तुम्हारी दादी जान की बचपन की दोस्त हैं ।”बहू ने कहा ।
“क्या आप नखरे वाली दादी जान की बात कर रही हैं जो शादी के बाद अपने शौहर के साथ दिल्ली चली गईं थीं ….. उनका नाम ….हाँ, कुछ भला सा नाम था चंचला रावर । रावर साहब से उनकी शादी हुई थी किसी सरकारी महकमे में मुलाज़िम थे । दादी कभी-कभी उनकी बातें करती हैं हम सबसे ।” जुनैद ने बताया ।
“हाँ, वही हैं । तुम्हारी रिपोर्ट को न्यूज में देखकर किसी बच्चे सी जिद किए हुए थीं वीडियो देखने की हस्बेंड से, और तभी मैं ऑफिस से लौटी थी । बस किसी तरह आपका नंबर लिया और फोन लगा दिया ।” बहू ने कहा ।
“ओ जुनैद बेटे ! दादी जान के लिए चाय ले जाओ । वक्त हो गया उनका चाय पीने का ।” पीछे से किसी महिला का स्वर सुनाई दिया ।
“अभी आया अम्मी ।” जुनैद ने जवाब दिया ।
“मेडम! आप फोन चालू रखिए , मैं आपकी बात करवाता हूँ अभी। ”
“अपनी अम्मी से हमारा सलाम कहिए और दादी जान से भी । इस रिश्ते में हम उनकी भी बहू हैं ।”
“जी जरूर ।” और जुनैद के पैरों की आवाज़ आने लगी । कुछ ही देर बाद वीडियो कॉल शुरू हो गया था ।
“दादी जान ! आपसे कोई दिल्ली से बात करना चाहते हैं ।”
“मेरा कौन है वहाँ ? अपने सब लोग तो यहीं हैं या तेरे एक भाई दुबई में है । जहाँ तक मुझे याद है दिल्ली में तो कुनबे का कोई नहीं है। ” दादी जान ने कहा।
“आप ख़ुद पहचान लीजिये । मैं ये फोन आपको देता हूँ , बात कीजिये उनसे ।” जुनैद ने फ़ोन दादी के हवाले कर दिया । इधर बहू ने फ़ोन को टी वी से जोड़ दिया था । टी वी पर चेहरा साफ और बड़ा दिख रहा था ।
“अनारबानों सलाम । कैसी है तू ?” दादी ने कहा ।
इस नाम को सुने वर्षों बीत गए थे । इस नाम को सुन और झुर्री भरे चेहरे को देखकर टपटप आँखों से आँसू बहने लगे ।
” नखरेवाली तुम कैसी हो ? बच्चे और जीजा जी कैसे हैं ? सब ख़ैरियत तो है न ।”
“हा हा हा …. तेरी पोत बहू ने बात करवाई है । अब वो नहीं रहे , पर बच्चे बहुत कामयाब और सेवा करने वाले पाये हैं मैंने ।”
“यहाँ भी अल्लाह की ऐसी ही मर्जी रही । तेरी बातों का जिक्र कई बार बच्चों से किया मैंने । लेकिन आज मुझे अपने ख़ुदा परवरदिगार से कोई शिकायत नहीं रही । तुझे जब भी आम का मौसम आता मैं याद करती रही । मुझे वो बचपन के सारे दिन याद हैं । तेरा वो छेदवाला सिक्का देना जो तुझे मिलता था और तू मुझे दे देती , मैं कुछ भी मांगती और तुम न नहीं कहतीं । कभी मेरे ससुर को पराया नहीं समझा था तुम्हारे खानदान ने । कितने अच्छे दिन थे। आज तुझे कितने जमाने बाद देखा है तो लगता है कि मेरी नमाजों की नेक कमाई का सिला अल्लाह ने मुझे दे दिया ।”
“हा हा हा …. तुझे वो गुड़दानी वाला याद है जो हमें एक पैसे में झोली भर देता था और वो कमरू जो हमें बिरयानी लाकर देता था । ”
“सब याद है मुझे । मुआ ये फ़ोन है तेरी शक्ल तो देख सकती हूँ पर तुझे सीने से नहीं लगा सकती । ”
“हाँ, उम्र और दूरियों की मजबूरी है । और वो जो तेरे साथ थी ….वो अपनी …. ।” बात अधूरी ही रह गई ।
“हाँ, वो तुम्हारी कल्लो ….कलावती ही है । वो भी दादी नानी और परदादी तक पहुँच गई है । पास में ही रहती है , अल्लाह की मेहर है उस पर । भरापूरा खानदान है , पर खसम की बुराई अब भी करती है …. हा हा हा ।”
“उसे कहना , मैं मरी नहीं हूँ। उसे याद करती हूँ। मेरी दुआएं देना , सलाम कहना और हो सके तो कभी बात करा देना । अपनी दुआओं में मेरे लिए भी ख़ुदा से एक बार मिला देने की गुहार करना ।”
“क्यों नहीं । एक आखिरी बार हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर तेरा पोता ले जा रहा है मुझे । तुम दिल्ली में कहाँ हो कैसे पता चलेगा ? कहते हैं कि दिल्ली बहुत बड़ी हो गई है ।”
“नहीं , दिल्ली अब भी वो इमली , अमरक , गुड़दानी वाली ही उम्र में अटकी है । मैं बेटे से कहती हूँ , तुझे दिल्ली ले आयेगा ।”
“न , उसे क्यों परेशान करती है । तेरा पोता ला रहा है न मुझे । पोते से नहीं मिलेगी क्या ?”
“कल्लो को भी ले आ साथ, तुझे दिल्ली का बिड़ला मंदिर दिखाऊँगी और हाँ, आम का पेड़ है घर में । हम मिलकर झूला झूलेंगे ।”
“हा हा हा …. अब काँधों पर झूला झूलने का वक्त है ।”
“हट करमजली , कीड़े पड़ें तेरी जुबान में । महीनेभर मेरे साथ रहना है तुझे और कल्लो को । तू गौने में साथ रही थी मेरे , सोच ले एक बार फिर मेरा गौना हो रहा है मौत से । नब्बे साल पार की बूढ़ी हो गई हूँ , पता नहीं कब मौत से गौना कर विदा हो जाऊँ मैं ।”
“अब तो नखरे छोड़ दे अपने …. नखरेवाली । आ रही हूँ जुम्मे को दिल्ली।”
“हाँ, जल्दी आना , मैं इंतज़ार में हूँ तेरे । अल्लाह सलामत रखे सबको।”
“आमीन …सुम्मा आमीन ।”
अब आवाज़ें बंद थीं और सिर्फ आँसू आँखों से किसी दरिया के मानिंद बह रहे थे दोनों के ।
“थैंक्स जुनैद। मैं फ्राई डे गाड़ी भेज दूँगी । एयरपोर्ट से सीधे घर आना है , फिर सब साथ चलेंगे दरगाह पर ।”
“जी मेडम। नवाजिश आपकी । पर अब आपको कुछ और कह सकता हूँ ।”
“हाँ, जरूर । हम सदियों वाले परिवार का हिस्सा हैं …. नखरेवाली की बहू या भाभी कह सकते हो मुझे ।”
“वाउ …. यही टाइटल बढ़िया रहेगा स्टोरी का …. नखरेवाली।”

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