रचनाकार

स्त्री का होना

डॉ. धनंजय शर्मा…

स्त्री का होना जगत में
बालुकामय कगारों पर
रेंगती नदी की धारामय
हिमगिरि से निकल क्षिप्रजल
उद्गम और विसर्जन प्रांजल
नैहर और सासुर का वहन
घाटों के तीरे जल प्लावन
क्षिप्रतामय तारुण यौवन
पाटों के बीच सिमटी, सहमी-सी
सिसक-सिसक बहती कराह-सी
बहुद्देशीय खड़े पर्वताकार बांध
बलात् अपहृत गई साथ कई
काटी गई, तोड़ी गई, मोड़ी गई
अपनी ही धारा के विरुद्ध
पैरो में नूपुर हुए आबद्ध
जैसे छंद करते हैं लयबद्ध
सिमट गई दो पंक्ति मध्य
धीर-नीर शाश्वत गंभीर
त्याग,तप,करुणा अभीर
शक्ति-पुंज यह महाविशाल
अनुशासन में गजभरी ताल
कल-कल छल-छल सलिल
नथनी,बाली,झुमका,पायल
कंगन से आबद्ध तन-मन
भावमय गीता बनी सीता
किसी पुरुष की परिणीता
सिथिल कृशकाय आत्मबद्ध
सिमट गई दो पाटों के मध्य
सिसकन भरी बेचैन तन-मन
तोड़ कगार सभी बंधन
सागर प्रेमी से महामिलन
स्त्री जीवन दो टूक कथन……..है।।

लेखक डॉ.धनंजय शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी विभाग)
सर्वोदय पी जी कॉलेज, घोसी मऊ

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