कविता : पुरूष…
@ रोशनी जायसवाल…
जिसके लिए बहुत कम लिखा गया है..
सारा प्रेम, सौंदर्य, साहित्य,
आ गया स्त्रियों के हिस्से।
शायद इसलिए ही क्योंकि
पुरूषो ने स्वयं को महत्व नही दिया,
अपने से बहुत ऊपर रखा अपनी प्रेयसी को।
सच भी यही है…
जब पुरूष अथाह प्रेम मे होता है,
वो शब्दों से नही जता पाता प्रेम को अपने,
स्त्रियों के पास प्रेम कहने के लिए
शब्दों के भंडार होते है।
पुरूष शब्दों से परे,
अपनी प्रेयसी के लिए संसार के
तमाम सुख इकट्ठा करने की चाह रखता है
वो सपने देखने लगता है के वो किस तरह
अपनी प्रेयसी को एक सबसे सुखद और
खुशहाल रानी बनाए रखे ताउम्र।
वो नही कह पाता वो सब, जो वो कर देता है..
पुरूष को जताना नही आता,
शायद वो अपने प्रेम के लिए किए गये
प्रयासो को दिमाग मे ही नहीं रखता,
वो उन्हे अपना दायित्व मानकर
बस पूरा करता चला जाता है
अपनी प्रेयसी की एक सुखद मुस्कान पाने के लिए।
पुरूष पूरे संसार के लिए
बहुत ज्यादा मजबूत सख्त बनकर रहेगा..
लेकिन अगर वो एक बच्चे के जैसा बनता है,
तो केवल अपनी प्रेयसी की गोद मे सिर रखकर।
बहुत कोमल ह्रदय होता है पुरूष का ,
जब उसे अथाह प्रेम लुटाने वाली स्त्री मिल जाती है
तब वो शिशु की भाति छुपा लेता है खुद को
उसकी गोद मे और भूल जाना चाहता है सबकुछ,
बहुत भागयशाली होती है हैं वो स्त्रियाँ
जिनके लिए उनका प्रेमी आँखो मे पानी ले आता है।
यहाँ केवल सच्चे ईमानदार पुरुषों की बात हो रही है..
जो नायक है प्रेम ग्रंथो के जिनके लिए
लिखा जाना चाहिए एक अमर साहित्य..

