रचनाकार

न ज़मीं न आसमा, न चाहते फिरदौस है

@ डा. राहुल राय…

न ज़मीं न आसमा
न चाहते फिरदौस है
जो दिया है बहुत है
मुझको तुझसे न कोई
गिला न अफ़सोस है

अब दे न मुझे कुछ और बस
कुछ कम कर दे मेरी ये खुद्दारी
मेरी नेक नियत,
सबको खुश रखने की लाचारी
बना सके बना दे मुझे भी
जैसी ये दुनिया सारी
मैं भी खुश रहूं अपनी खुदगर्ज़ी में
किसी और के दुःख से न हो मेरा ह्रदय ये भारी

सजा का हकदार है,
जो सबसे यहाँ निर्दोष है
न ज़मीं न आसमा
न चाहते फिरदौस है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *