शब्द मसीहा : मैं गुमनाम ही भला
वो कहते हैं न कि बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा . हमारे मित्र ने हमें अपने बिना इस्तेमाल किये हुए दिमाग से सुझाव दिया कि यार तुम लिखते तो ठीक ही हो मगर लोग तुम्हें पहचानते नहीं हैं .
हमने कहा कि हम पचास साला नवांकुर हैं . हमें ऐसे ही रहने दो . वह गुर्राए और बोले- “तुम हमारे साथ रहते तो तुम्हें ऐसे कैसे छोड़ दें . हम बहुत मशहूर हैं . हमारी फोटो थाने में लगी है . जब भी कभी जाते हैं थानेदार हमें तुरंत पहचान लेता है .”
“पर भाई तुम थाने जाते क्यों हो ?”
“अबे! मर्जी से थोड़े ही जाते हैं . लोग प्यार से ले जाते हैं .”
“कोई तो कारण होगा …जो लोग आपको ले जाते हैं .”
“यार ! हम कवि हैं और कहीं पर भी अपनी जनवादी कविता कहने सुनाने का हक़ है . हम आजाद हैं .”
“अच्छा ! जनवाद में आपकी मांग क्या है ?”
“कुछ ज्यादा नहीं मांगते . हां कोई लालची थोड़े ही हैं जो चीफ मिनिस्टर की कुर्सी मांगें . हम सिर्फ चाहते हैं कि हम लिखने पढने वालों को शराब सस्ते दर पर मुहैया करवाई जाय . इसी मांग को लेकर हम अपने सेवक याने कि विधायक जी के यहाँ चले गए . उनके चमचों ने हमें धो दिया और साले ऐसे अस्पताल में पुलिस ने पहुंचा दिया जहाँ एक भी दवाई नहीं थी . गरीब लेखक को शाम का कोटा …समझे ! शाम का कोटा दवाइयों और इंजेक्शन पर खर्च करना पड़ा .”
“ये प्रचार हुआ या मवालिगिरी? या कविता, साहित्य और कवि की बेइज्जती ?”
“बहुत भोले हो यार ! तुम्हारा मेनेजमेंट बहुत कमजोर है . यूँ ही फेस्बुकिया कवि और लेखक बन कर मर जाओगे !”
“तो क्या थाने में फोटो लगवा लूं तुम्हारी तरह ?”
“हट …बड़े आदमी वहाँ लगते हैं . महात्मा गांधी को देखा है न …हर जगह होता है …बापू है सबका . थाने में भी होता है पर बड़ा फोटो …मेरी छोटी है …जल्द ही बड़ी हो जायेगी …कविता लिख रहा हूँ …थानेदार चोर है .”
“अबे! मरना है क्या ? थानेदार चोर है लिखेगा तो फोटो पर फूल माला चढ़ जायेगी जल्दी और रिपोर्ट भी दर्ज नहीं होगी . कुछ तो घर की सोच .”
“हर करम अपना करेंगे …अय वतन तेरे लिए ….”
“अबे! शहीदों के पोते फांसी लगाकर मर रहे हैं और तू मुफ्त में मरेगा !”
“पागल है , साले विपक्ष वाले पेड़ पर चढ़कर गले में फंदा डालने के लिए बीस हजार और पूरी पेटी लाल परी की दे रहे हैं …डील अच्छी है न .”
“हाँ, जरा सा फिसला और काम पूरा …मशहूर तो हो ही जाएगा …कवि न सही कार्यकर्ता पक्का बन जाएगा .”
” तो क्या हुआ …साले सब लोग माला डालेंगे गले में मेरे चित्र के . पूरे घर वालों को लोग पहचानने लगेंगे कि शहीद कवि के सम्बन्धी हैं . मेरे साथ वो भी मशहूर हो जायेंगे .”
“अबे! तेरे मरने के बाद तू क्या देखने आयेगा ? लोग तो बड़े-बड़े लेखकों को भूल गए …तू किस …”
“हाँ ….कह दे कि तू किस खेत की मूली है . तू मेरी तारीफ़ और शोहरत से जलता है . जानता है …मेरे जैसा आदमी अगर तेरी किताब अपने साथ भी रख ले तो कितना प्रचार होगा . चल दो प्रतियां दे दे मुझे .”
“दो का क्या करेगा ? पहले भी तो दी थी तुझे साइन कर के .”
“वो …हा हा हा …साला कोई तेरा ही चाहने वाला निकला . साइन की हुई कॉपी के पांच सौ दे गया . अपना काम चल गया दो दिन का .”
“हम्म्म …इसलिए आज तू फिर दो कॉपी मांग रहा है !”
“नहीं …इस बार एक को घर में रखूंगा और एक मेरी .”
“घर में क्यों ? घर तो तू कभी-कभी ही जाता है .”
‘अबे! तुझे पढेंगे तो थोड़ी इज्जत मुझे भी मिल जायेगी कि मैं तुझे जानता हूँ . तू तो मेरा यार है ….दोनों पर साइन कर के देना . तू क्या मेरी ख़ुशी नहीं चाहता …दोस्ती बड़े काम की चीज है …दोस्ती निभाते हैं अच्छे लोग और तू अच्छा आदमी है …चल प्रूव कर …..नहीं तो …”
बाप रे ! अच्छा खासा मजमा इकठ्ठा कर दिया भाई ने . दो कॉपी दे दीं साइन कर के . हे ! दीनदयाल …मुझे मशहूर मत करना . कहीं मेरी फोटो भी थाने में मत लगवा देना कि मैं कवि पियक्कड़ का दोस्त हूँ . मैं गुमनाम ही भला हूँ।
लेखक- केदारनाथ “शब्द मसीहा” दिल्ली रेलवे विभाग में इंजीनियर हैं।

