जिसने दिया बुलंदी का आसमान तुमको, उसको ही भूल बैठे ऊँची उड़ान लेकर

पूर्णिका…
(हरिलाल राजभर)
क्या शोख ये अदाएँ मानेगीं जान लेकर,
या बख्श देंगी मुझको उल्फत का दान लेकर ।
दिल खोलकर है स्वागत इस प्यार की फिजां में,
आओ अगर खुशी से मीठी जुबान लेकर ।
ये हुस्न भी ढलेगा जब उम्र ये ढलेगी,
जिस पे बहक रहे हो इतना गुमान लेकर ।
मैं प्यार का समंदर बस प्यार बाँटता हूँ,
नदियों को प्यार देता हर पल उफान लेकर ।
तुम इश्क़ की अदालत में झूठ बोल लो पर,
हाज़िर हुआ हूँ मैं तो सच्चा बयान लेकर ।
मुझसे नहीं मुहब्बत की जंग जीत सकते,
मैं आ गया हथेली पे अपनी जान लेकर ।
जिसने दिया बुलंदी का आसमान तुमको,
उसको ही भूल बैठे ऊँची उड़ान लेकर ।
“हरिलाल” बचके रहना दुनिया की भीड़ में तुम,
कुछ लोग आ मिलेंगे दिल में गठान लेकर ।
क़ाफिया- आन
रदीफ- लेकर
रचनाकार- हरिलाल राजभर, मऊ जनपद के कुचहरा, बिजपुरा,, उ० प्र०

