मऊ ! मनोज की कुर्सी पाने से ज्यादा धर्मप्रकाश के गंवाने की चर्चा है

( आनन्द कुमार )
मऊ। गजब की दास्तां है, गजब का खेल है, यह राजनीति भी कितनी बेमेल है, जो तोहमतें लगा रहे थे सरकार के किरदार पर, उन्हीं के ऊपर लगा आरोपों का ढेर है, सच क्या है, झूठ क्या कौन किससे कहे, चर्चा बस यही है, कौन राजनीति में पास है और कौन फेल है। जी मेरी यह चंद लाइनें बिल्कुल फिट बैठ रही हैं, वर्तमान में मऊ जिला पंचायत की राजनीति की सियासत में। जिला पंचायत अध्यक्ष, मऊ के चुनाव में शनिवार को नामांकन के दिन ही भाजपा प्रत्याशी मनोज राय का सिर्फ इसलिए निर्विरोध निर्वाचन हो जाना कि सपा प्रत्याशी रामनगीना यादव नामांकन ही नहीं कर पाएं और नामांकन न होने के कारणों में सपा जिलाध्यक्ष धर्म प्रकाश यादव का जिला प्रशासन पर उनके अध्यक्ष पद के प्रत्याशी को गायब कराने व भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाना अभी चर्चा में बना ही था, तो कुछ पलों के अंदर ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की संस्तुति पर यूपी सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम द्वारा मऊ के सपा जिलाध्यक्ष धर्मप्रकाश यादव समेत 11 जिलाध्यक्ष को तत्काल प्रभाव से पद से हटाना यह संदेश देता है कि कहीं न कहीं कुछ ना कुछ कमी तो मऊ समाजवादी पार्टी में रही होगी। वर्ना यह कदम क्यों उठता और उसी का कारण है कि आज मनोज राय के जीत की जितनी चर्चा जनपद में नहीं है उससे ज्यादा सपा प्रत्याशी के नामांकन न कर पाने और धर्मप्रकाश यादव को जिलाध्यक्ष पद से हटाने की चर्चा है।

हां अगर अंदरखाने की बात करें तो खुशी भाजपा और सपा दोनों खेमे में है। भाजपा में जीत की तो सपा में पद से हटाने की। खैर अब सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष धर्मप्रकाश यादव द्वारा जिला प्रशासन पर लगाए गये आरोपों व संघर्ष फूंकने की बिगुल की कड़ी में क्या होगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा ?

लेकिन समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ सिपाही व पूर्व जिला पंचायत सदस्य देवनाथ यादव की बातों और उनके सोशल मीडिया के फेसबुक पेज पर गौर करें तो काश! सपा मुखिया अखिलेश यादव या सपा के वरिष्ठ नेता देवनाथ की बातों पर गौर करके अगर यह कदम पहले उठाए होते तो आज जो भाजपा के आंगन में खुशी की धूम है वह तीन जुलाई को ही पता चलता कि खुशियां किसके हिस्से में आती।
अपने पार्टी के नेताओं की उपेक्षा और पूर्व में जब सपा जिलाध्यक्ष धर्मप्रकाश यादव की धर्मपत्नी अंशा यादव जिला पंचायत अध्यक्ष थी उस समय समाजवादी पार्टी के साथ साथ अन्य जिला पंचायत सदस्यों की उपेक्षा, उनकी बातों पर ध्यान न देने के वजह से ही अविश्वास प्रस्ताव में धर्मप्रकाश यादव की पत्नी श्रीमती अंशा यादव को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था। खैर धर्मप्रकाश यादव को चेतना उस समय भी चाहिए था, चेतना इस समय भी चाहिए था लेकिन वे चेत न सके।

सपा नेता देवनाथ यादव हर पल हर क्षण लम्बे समय से सपा जिलाध्यक्ष धर्मप्रकाश यादव के खिलाफ बगावत व खिलाफत कर, यह जताने की कोशिश किए कि धर्मप्रकाश यादव समाजवादी पार्टी हित में सही कार्य नहीं कर रहे लेकिन सपा मुखिया का अपने जिलाध्यक्ष के प्रति आस्था कम होने का नाम ही नहीं था।
तभी तो जब देवनाथ यादव ने जिला पंचायत में धर्मप्रकाश यादव की पत्नी अंशा यादव के खिलाफ कई दलों के जिला पंचायत सदस्यों व निर्दलों को मिलाकर बिगुल फूंका तो उन्हें न सिर्फ हराकर दम लिया, बल्कि नारा भी लगाया अखिलेश यादव से बैर नहीं धर्मप्रकाश यादव तेरी खैर नहीं। खैर इस बगावत पर देवनाथ का निष्कासन सपा से हो गया। बाद में ससम्मान वापसी भी हुयी।

ऐसे में जिला पंचायत के चुनाव की घोषणा के बाद से ही देवनाथ यादव अपने सोशल मीडिया के फेसबुक पेज धर्मप्रकाश यादव की भूमिका पर सवाल उठाते आ रहे हैं। उनके कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न करते आ रहे हैं।
देवनाथ यादव फेसबुक पर 25 जून 2021 को लिखते हैं कि पता चला है कि बड़े नेता जी पचास लाख में सेट होकर रामनगीना यादव का पर्चा भरा न सके इसका सिस्टम बना दिया है।
22 जून 2021 को देवनाथ यादव पुनः लिखते हैं… जिला अध्यक्ष जी मिटिंग में बोलते हैं कि आज कोई पार्टी में टिकट मांगने वाले नहीं हैं यह किसकी कमी है और क्या राम नगीना यादव पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी नहीं है।

जब सपा के राम नगीना यादव का नामांकन शनिवार को नहीं हो पाता है तो देवनाथ यादव कहते हैं…
मेरा कल का कहा हुआ आज सच हो गया।।
जैसे ही उन्हें पता चला कि धर्म प्रकाश यादव को सपा जिलाध्यक्ष से हटा दिया गया तो अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद, देते हुए कहते हैं जैसे को तैसा।
और कहते हैं जो, हमें खरीद रहे थे ओ खुद बिक गया।
ऐसे में जिला पंचायत का चुनाव होने से लेकर अब तक अगर सपा नेता देवनाथ यादव के फेसबुक पोस्ट पर नजर डाले तो दूध का दूध और पानी का पानी का पता चल जाएगा। यह तो देवनाथ यादव तो जो सोशल मीडिया से लेकर, पत्र पर आरोप व लखनऊ जाकर धर्मप्रकाश यादव के खिलाफ बोलते रहे, इनके साथ-साथ बहुतेरे सपा नेता भी गुपचुप तरीके से विरोध किए, शनिवार को सपा मुखिया का आदेश आते ही देवनाथ यादव की तरह सोशल मीडिया पर बहुतेरे सपा नेता मुखर हो गये और वे अपने नेता के फैसले का स्वागत कर रहे हैं।
अब देखना होगा कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के लिए मुंह की बल गिर चुकी समाजवादी पार्टी 09 ब्लाक प्रमुखों के चुनाव में कितने विकास खण्ड में जीत पाती है और 2022 के विधानसभा चुनाव में चार विधानसभा सभा सीट में से कितने सीट पर खाता खोल पाती है। इन सभी कवायदों के लिए कौन सपा जिलाध्यक्ष का धर्म ईमानदारी से निभाते हुए सपा के साइकिल को प्रकाश की ओर ले जाता है, यह भी मायने रखता है। जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए तो बस इतना ही कि जब चिढ़ियों ने चुग खेत लिया तो पछताए क्या होत है।



