साक्षात्कार शृंखला ! डॉ० अनिल शूर ‘आज़ाद’
आदरणीय बलराम सरस जी द्वारा प्रारंभ की गई साक्षात्कार की इस शृंखला में आज जिस साहित्य मनीषी का साक्षात्कार आपके समक्ष होगा वे हैं साहित्यिक, शैक्षिक एवं सामाजिक क्रिया-कलापों के प्रति रुझान रखने वाले व मुख्यतः लघुकथा, कविता, व्यंग्य एवं कहानी विधा में लेखन करने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ० अनिल शूर आज़ाद l
अनिल शूर जी का जन्म 26 जून 1965 को हरियाणा में हुआ था l आपने एम.ए. (इतिहास व हिन्दी) एम.एड., एल.एल.बी., वैद्य विशारद तथा पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है l वर्तमान में आप दिल्ली शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत इतिहास व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं l
कुछ समय आपने पत्रकारिता तथा रविज्योति, हलाहल व प्रशिक्षित अध्यापक आदि पत्रिकाओं का संपादन किया l लघुकथा विधा पर विशिष्ट अध्ययन व राष्ट्रीय पहचान प्राप्त की l आपको हिन्दी लघुकथा में लघुवाद के उदय का श्रेय जाता है l आपने विभिन्न शिक्षक संगठनों में पर्याप्त सक्रियता के साथ शैक्षिक विषयों पर गंभीरतापूर्वक लेखन किया है l
आपकी प्रकाशित कृतियों में ‘सरहद के इस ओर’, ‘क्रांति मर गया’ (लघुकथा संग्रह), ‘मेरी सात कहानियाँ’ (कहानी संग्रह), ‘मेरे प्रिय हास्य व्यंग्य’ (व्यंग्य संकलन), ‘पत्थर पे खुदे नाम’, ‘रोटी के लिए जिद मत करना’, ‘हृदय राग’ (तीनों कविता संग्रह) तथा विभिन्न राज्यों की लघुकथाएं, किशोर साहित्य, संस्मरण एवं विविध विधाओं पर अनेक पुस्तकें हैं l
आपके संरक्षण तथा संयोजन में ‘लघुकथा जगत’ नमक ऑनलाइन पटल भी चल रहा है जिसकी गतिविधियों में आपका भरपूर सक्रिय सहयोग रहता है l सांपला (हरियाणा) के प्रतिष्ठित हिदी विद्यापीठ से मानद डॉक्टरेट ‘विद्यावाचस्पति’, मानद डी.लिट्. ‘विद्यासागर’, सर्वप्रमुख सम्मान ‘भारत गौरव’ सहित अनिल शूर जी को मिले पुरस्कारों तथा सम्मानों की एक लम्बी सूची है l
इतने प्रतिभा-संपन्न व्यक्तित्व के धनी आदरणीय अनिल शूर आज़ाद स्वभाव से बहुत ही सरल तथा विनम्र हैं l आइये इस प्रभावशाली महान व्यक्तित्व से बातचीत का सिलसिला प्रारंभ करें l सदानंद कवीश्वर
पत्र-साक्षात्कार
प्रश्न-1 अनिल जी, आप एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, अपनी साहित्य यात्रा के बारे में विस्तार से बताइए।
उत्तर : इस पत्र-साक्षात्कार के लिए मुझे चुना..एतदर्थ आपका आभार, सदानंद जी। जहां तक लेखन की बात है वर्ष 1978-79 में जब मैं नवीं कक्षा का विद्यार्थी था, तो विद्यालय में शनिवार को होने वाली ‘बालसभा’ के लिए अपने भाषण स्वयं लिखने लगा था। अतः कह सकते हैं कि लेखन तभी आरंभ हो गया था। हालांकि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखना-छपना जून 1982 से शुरू हुआ। संयोगवश रेडिली उपलब्ध है, अतः आप एवं इच्छुक मित्रों के संदर्भ के लिए अपनी लेखन-यात्रा का वर्षवार विवरण भी कॉपीपेस्ट किए दे रहा हूं –
साहित्यिक-यात्रा – वर्षवार विवरण
1. रेवाड़ी-प्रवास के अहम पड़ाव
- 1982 : साहित्यिक लेखन की नियमित शुरुआत। प्रथम लघुकथा “विरासत” प्रकाशित।
- 1982-84 : भारती-चिंतन (पंजीकृत) साहित्यिक संस्था से जुड़ाव एवं विविध आयोजन। पलवल, रेवाड़ी तथा गुड़गांव में इसकी शाखाएं थी।
- 1984 : “रविज्योति” त्रैमासिक का संपादन शुरू किया।
- 1984-93 : आकाशवाणी रोहतक सहित आगमन, मित्र-संगम, शुभ तारिका, मिनियुग, लघुआघात, क्षितिज, दृष्टि,अंचल भारती, अंकुर आवाज, सुपर ब्लेज, शब्दवर, गरिमा भारती, सानुबंध, हरिगंधा, पंजाब सौरभ, ब्लिट्ज, दैनिक ट्रिब्यून, हिन्दुतान, जनसंदेश दैनिक, जनसत्ता, वीरअर्जुन, पंजाब केसरी नवभारत टाइम्स तथा सारिका आदि ढेरों पत्र-पत्रिकाओं से सतत जुड़ाव एवं प्रकाशन।
- 1985 : प्रथम लघुकथा संग्रह सरहद के इस ओर का प्रकाशन।
- 1986 : “हलाहल” त्रैमासिक का संपादन-प्रकाशन आरंभ। “हलाहल-मंच” लघुकथा आधारित संस्था का भी गठन।
- 1987 : दूसरी पहल लघुकथा-संकलन संपादित।
- 1988 : “सुमंगलन” दिल्ली तथा “हरियाणा प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन, सिरसा” से जुड़ाव।
- 1990 : पत्थर पर खुदे नाम प्रथम कविता-संग्रह का प्रकाशन।
- 1992 : मेरी सात कहानियां प्रथम कहानी-संग्रह प्रकाशित।
- 1993 : शिक्षा-जगत की लघुकथाएं दूसरा लघुकथा संकलन प्रकाशित। यह वरिष्ठ साहित्यकार प्रो रूप देवगुण के साथ संयुक्त रूप से संपादित किया था।
- 1993 : क्रांति मर गया द्वितीय एकल लघुकथा-संग्रह प्रकाशित। 2. दिल्ली प्रवासकालीन घटनाक्रम
- 1994-96 : “प्रशिक्षित अध्यापक” शिक्षा एवं लघुकथा केंद्रित मासिक पत्र का प्रकाशन।
- 1996 : मेरे प्रिय हास्य-व्यंग्य प्रथम व्यंग्य-संग्रह का प्रकाशन।
- 1997 : “दिल्ली साहित्य समाज” राजधानी की प्रतिष्ठत संस्था से जुड़ाव।
- 2001 : लघुकथाकार अनिल शूर आज़ाद इंदु वर्मा के संपादन में प्रथम मूल्यांकनपरक पुस्तक प्रकाशित।
- 2005 : अंजुरी भर साहित्य कविता, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, शैक्षणिक आलेख आदि चुनिंदा रचनाओं का संग्रह।
- 2006 : अनिल शूर आज़ाद : प्रतिनिधि लघुकथाएं इंदु वर्मा के संपादन में द्वितीय मूल्यांकनपरक कृति।
- 2008 : रोटी के लिए ज़िद मत कर द्वितीय कविता-संग्रह का प्रकाशन।
- 2013 : दिल्ली की लघुकथाएं प्रदेशवार लघुकथा-संकलन कड़ी की प्रथम पुस्तक का प्रकाशन।
- 2014 : हरियाणा की लघुकथाएं प्रदेशवार लघुकथा- संकलन कड़ी की द्वितीय पुस्तक का प्रकाशन।
- 2014 : राजस्थान की लघुकथाएं प्रदेशवार लघुकथा-संकलन कड़ी की तृतीय पुस्तक का प्रकाशन।
- 2014 : मध्यप्रदेश की लघुकथाएं प्रदेशवार लघुकथा-संकलन कड़ी की चतुर्थ पुस्तक प्रकाशित।
- 2014 : अपना सौरपरिवार विद्यार्थीपयोगी पाठ्यक्रम-आधारित कृति।
- 2014 : आपदा प्रबंधन – एक परिचय पाठ्यक्रम-आधारित एक अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक।
- 2016-17 : “फ़ेसबुक लघुकथा-संगोष्ठियों का आयोजन” जिनके माध्यम से सैंकड़ों नए लघुकथाकार साथियों से संपर्क हुआ।
- 2017 : “आधुनिक हिंदी लघुकथा-शोधपीठ, नई दिल्ली” की स्थापना उपेक्षित रह गए तथ्यों/कार्यों को सामने लाने के निमित्त की गई।
- 2018 : नई सदी की लघुकथाएं अत्यंत सफल एवं लोकप्रिय हुई “फ़ेसबुक लघुकथा-संगोष्ठियों पर आधारित’ ऐतिहासिक कृति।
- 2019 : हृदय राग तीसरे कविता-संग्रह का प्रकाशन, जिसमें प्रथमबार शेरो-शायरी भी प्रस्तुत की गई है।
- 2019 : मेरा लेखन तथा जीवन संस्मरणों पर आधारित आत्मकथात्मक पुस्तक का यह प्रथम खंड है।
- 2020 : मेरी प्रिय लघुकथाएं तीसरा एकल लघुकथा-संग्रह। इसमें प्रथमबार शताधिक लघुकथाएं, एकसाथ उपस्थित हैं।
- 2020 : देश-विदेश से लघुवादी लघुकथाएं लघुकथा-आधारित आठवीं संपादित कृति।
- 2020 : अनिल शूर आज़ाद की कृतियां – एक अवलोकन तीसरी मूल्यांकनपरक पुस्तक। लेखिका, रेखा पूनिया स्नेहल।
प्रश्न-2 आपकी गिनती आज के सफल लघुकथाकारों में होती है, साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में लघुकथा को आप जनमानस के कितना निकट पाते हैं ? और क्यों?
उत्तर : साहित्य की अन्य विधाओं के अपेक्षाकृत नई होते हुए भी ‘लघुकथा विधा’ ने जनमानस में तेजी के साथ अपना स्थान बनाया है। इसका कारण शायद यह है कि भारतीय जनजीवन गत कुछ दशकों में तेज बदलावों का गवाह बना है। उपन्यास, महाकाव्य, नाटक या लंबी कहानियां पढ़ने का किसी के पास समय नहीं। फ़िल्म देखने वालों की मैं बात नहीं कर रहा, लेकिन साहित्यप्रेमी पाठक के लिए लघुकथा बहुत ही उपयुक्त विधा सिद्ध हो रही है। लघुकथा यदि सशक्त हो तो एक चौथाई से भी कम समय मे, कहानी जैसा संतोष प्रदान कर देती है।
प्रश्न-3 ‘लघुकथा विधा’ आज की प्रचलित विधाओं में से एक है, इसकी बनावट के विषय में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर : लघुकथा समूचे जीवन या जीवन के कुछ वर्षों का चित्र प्रस्तुत नहीं करती। बल्कि समान्यतः एकदो घंटे की सीमित अवधि में घटित घटनाक्रम को ही लघुकथा में लिया जाता है। इतने में ही इसके माध्यम से कोई धीर-गंभीर संदेश इसे व्यक्त करना होता है, जो निश्चय ही अधिक चुनौतीपूर्ण बात है। इसमें एकएक शब्द पूरी सावधानी से प्रयोग करना होता है। एक भी गैरजरूरी या अवांछित शब्द लघुकथा के प्रभाव को घटा सकता है। ऐसे में आपका लेखन-अनुभव बहुत काम आता है।
प्रश्न-4 अक्सर यह कहते देखा गया है कि ‘लघुकथा’ हिन्दी साहित्य की नवीनतम विधा है जबकि इसका अस्तित्व भारतेंदु काल से ही माना गया है l इस विषय में आप क्या कहेंगे?
उत्तर : हर लघुआकारिय कथात्मक रचना लघुकथा नहीं कही जा सकती। यही ‘आधुनिक हिंदी लघुकथा’ एवं भारतेंदु काल की रचनाओं का अंतर है। आधुनिक हिंदी लघुकथा का जो स्वरूप इन दिनों सामने है – निर्विवादित रूप से इसकी शुरुआत वर्ष 1965 के आसपास से हुई है।
प्रश्न-5 जैसा कि इस विधा के नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक छोटे आकार की कथा है, क्या किसी भी छोटी कथा को लघुकथा कहा जा सकता है?
उत्तर : नहीं, जैसा कि पहले कहा हर लघुआकारिय कथात्मक रचना को ‘लघुकथा’ नहीं कहा जा सकता। इस विधा का अपना एक सैटअप है। इससे इतर कथात्मक रचनाएं कहानी, छोटी कहानी, मिन्नी कहानी, हास्य कथा आदि चाहे हों – उन्हें लघुकथा नहीं कहना चाहिए। विशेषतया..हास्य ही जिनका उद्देश्य हो, जो अंधविश्वास पर आधारित या इसे बढ़ावा देती हों, मात्र उपदेशात्मक हों, कथाविहीन विचारमात्र हों.. या मानव-गरिमा के प्रति बोध व आदरभाव जिनमें न हो – ऐसी रचनाएं आदर्श लघुकथा नहीं कही जा सकती।
प्रश्न-6 पिछले कुछ वर्षों से फेसबुक का चलन बहुत बढ़ गया है इस पर यह स्वतंत्रता हर किसी हो होती है कि वह कुछ भी पोस्ट कर सकता है ऐसे में इस पर पोस्ट की जाने वाली लघुकथाओं के विषय में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर : सशक्त और स्तरहीन रचनाएं फेसबुक ही क्यों, किताबों-पत्रिकाओं में भी होती हैं। फेसबुक चूंकि सर्वसुलभ आसान माध्यम हैं अतः इसपर अधिक रचनाओं का पहुंचना भी स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सत्य है कि यहां झूठी वाहवाही का चलन कुछ अधिक है। इससे इतर कुछ कहने का प्रयास करें तो अधिकांशतः लगता है ना कहना ही बेहतर होता। हालांकि फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे माध्यमों से ही अनेक नए रचनाकार तथा असंख्य अच्छी लघुकथाएं भी सामने आई हैं।
प्रश्न-7 आपके अब तक कितने लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ? उनके विषय में तथा आपको प्राप्त सम्मानों के विषय में विस्तार से बताइएl
उत्तर : मेरे तीन एकल लघुकथा-संग्रह
- सरहद के इस ओर (सितंबर’85)
- क्रांति मर गया (वर्ष 1993) तथा
- मेरी प्रिय लघुकथाएं (वर्ष 2020)
अबतक प्रकाशित हुए हैं। इनमें सौ से अधिक चुनिंदा लघुकथाओं को ‘लघुकथा कलश’ के यशस्वी संपादक योगराज प्रभाकर ने स्वयं पंजाबी में अनुदित कर, पुस्तक-रूप में प्रस्तुत करने की घोषणा भी हाल में की है। इसके अतिरिक्त प्रदेशवार संकलनों की चर्चित श्रृंखला में चार पुस्तकों तथा बहुचर्चित फेसबुक लघुकथा संगोष्ठियों पर आधारित कृति ‘नई सदी की लघुकथाएं’ के सहित कुल आठ संपादित कृतियां अबतक प्रकाशित हुई हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एमफिल शोध के अतिरिक्त इंदु वर्मा के संपादन में दो मूल्यांकनपरक पुस्तकें 1. लघुकथाकार अनिल शूर आज़ाद एवं 2. अनिल शूर आज़ाद : प्रतिनिधि लघुकथाएं..तथा रेखा पूनिया स्नेहल कृत 3.”अनिल शूर आज़ाद की कृतियां : एक अवलोकन” बहुत चर्चित-प्रशंसित हुई हैं। जहां तक प्राप्त सम्मानों की बात है दिल्ली सरकार के सर्वोच्च ‘राज्य शिक्षक पुरस्कार-2005’, प्रज्ञा सम्मान सांपला, अवसर साहित्य-मंच पटना, मानव भारती हिसार, सुप्रसिद्ध विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा मानद डॉक्टरेट ‘विद्यावाचस्पति’ विद्यासागर तथा सर्वोच्च ‘भारत गौरव सम्मान’, हिंदी साहित्य सम्मेलन सिरसा, प्रादेशिक लघुकथा मंच सिरसा, साहित्य सभा कैथल, दिल्ली साहित्य समाज आदि दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सौ से अधिक बार सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त।
प्रश्न-8 अक्सर कहा जाता है कि लघुकथा का अंत एक पञ्च वाक्य से होना चाहिए l इससे क्या तात्पर्य है तथा क्या एक सफल लघुकथा के लिए यह आवश्यक है?
उत्तर : पंचवाक्य से अभिप्राय यदि रचना को उच्च भावभूमि पर पहुंचाकर समाप्त करने से है तो यह उचित ही है। इससे निश्चय ही लघुकथा की प्रभावशीलता में वृद्धि होती है। लेकिन यह स्वाभाविक होना आवश्यक है, कृत्रिम रूप से थोपा हुआ नहीं! हालांकि नए लघुकथाकार साथियों को यह भी समझना चाहिए कि पंचवाक्य अच्छी लघुकथा की अनिवार्य शर्त नहीं है। इसके बिना भी सैंकड़ों सशक्त लघुकथाएं लिखी गई हैं जो अपने स्वाभाविक प्रवाह के चलते अनायास हृदय में कहीं गहरे तक उतर जाती हैं।
प्रश्न-9 आपके अनुसार क्या लघुकथा की कोई शब्द-सीमा निर्धारित है ? यदि ऐसा है तो वह क्या है?
उत्तर : ऐसी कोई शब्दसीमा निर्धारित तो नहीं है, लेकिन..चार दशकों से मेरा आग्रह रहा है कि अपने नाम के अनुरूप इसे लघुआकारिय अवश्य ही होना चाहिए – अधिकाधिक सामान्य पुस्तक के सवा-डेढ़ पृष्ठ तक। गत वर्षों में कुछ महत्वाकांशी महानुभावों ने बारह-पंद्रह सौ शब्दों या तीन-चार पेजी लघुकथाओं की वकालत की तो उनपर लगाम लगाने के निमित्त ही, मैंने ‘लघुवादी लघुकथाएं’ का विचार प्रस्तुत किया था। इसे लेकर मासिक लघुकथा केंद्रित पत्र ‘प्रशिक्षित अध्यापक’ के कई अंक तथा एक पुस्तक भी संपादित की गई। मेरी अपनी नब्बे प्रतिशत से अधिक रचनाएं तीन सौ शब्दसीमा के आसपास ठहरती हैं।
प्रश्न-10 आपकी कतिपय लघुकथाएं अत्यंत लघु हैं, क्या आपको लगता है कि कथ्य से कथानक बुनते हुए आप ऐसी लघुकथाओं के साथ न्याय कर पाते हैं l यदि आप अपनी ऐसी किसी लघुकथा का उदहारण देते हुए अपनी बात कहें तो बेहतर होगाl
उत्तर : जैसा कि मैंने पहले भी कहा मेरी नब्बे प्रतिशत से अधिक लघुकथाएं तीन सौ शब्द में सिमट जाती हैं। मात्र पांच प्रतिशत सवा पृष्ठ तथा पांच प्रतिशत ही ऐसी हैं जो मात्र चौथाई पृष्ठ लेती हैं। इन चौथाई पृष्ठ वाली को ही मैंने ‘लघुवादी लघुकथाएं’ कहा है। विश्व लघुकथा साहित्य में खलील जिब्रान, मंटो, जोगेन्दर पाल आदि अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने ऐसी बहुत सी लघुकथाएं लिखी हैं जो विधा की धरोहर कहलाने का दम रखती हैं।
अब अपनी ऐसी लघुकथाओं के बाबत स्वयं क्या कहूं। कुछ रचनाएं ही प्रस्तुत कर देता हूं, आकलन आप स्वयं कर लीजिए –
- मुर्गा
दावत के सिलसिले में मुर्गा खरीदने वह कसाईवाड़ा पहुंचा। कसाई ने उसे मुर्गा दिखाया। उसने मुर्गे को परखा ओर उसे काट देने को कहा।
कुछ दिनों के बाद घर में मरम्मत कार्य हेतु उसे एक मजदूर की आवश्यकता पड़ी। सुबह-सवेरे वह, नगर के प्रसिद्ध झंडा लेबर-चौक पहुंच गया जहां बहुत सवेरे ही मजदूर आ जुटते थे। मजदूरी पर जाने के इच्छुक लोगों के हुजूम में एकपर उसकी आंखें ठहर गईं..बीस-इक्कीस वर्षीय गठे बदन का स्वस्थ और तगड़ा नवयुवक!
आंखों ही आंखों में उसने, सुगठित देह को परखा और अपने साथ चले आने को कह दिया।■
- बड़ी मछली
व्यवसायी पिता ने सरोवर के नीले जल में झांक रहे अपने पुत्र को अर्थपूर्ण शब्दों में टोका – ‘देखा! हर बड़ी मछली, छोटी को कैसे खा जाती है..’
युवा पुत्र ने पिता की भावनाओं का खण्डन करते हुए सरोवर के दूसरे तट पर जल रही चिता दिखाकर कहा – ‘उधर देखिए! छोटी हो या बड़ी, हर मछली का यही हश्र होता है।’
वातावरण में एक गम्भीर खामोशी पसर गयी।■
- दूरी
जंगल के बीच से निकलती सड़क के कारण जंगल की शान्ति भंग हो चुकी थी। दो भागों में बंट गये वन्य-जीव अब शाम ढले ही कहीं, सड़क के दूसरी तरफ़ जा पाते।
ऐसे ही एक शाम, एक हिरणी अपने बच्चे के साथ सड़क की ओर बढ़ी, मगर..उसी समय एक लारी को आते देखकर वापस भी हो ली। शावक ने प्रश्नात्मक निगाहों से अपनी मां की ओर देखा।
“हां बेटे..इंसान है ही ऐसा जानवर..इससे दूरी ही भली!” यह सुनकर बेटे ने समझदारी से सर हिला दिया।■
- प्रतिघात
दो नन्हे पिल्ले.. सुअर के एक बच्चे को देखकर धींगामस्ती करने लगे। इधर से उधर भागते, बेचारा वह निढाल हो गया।
अचानक उसे क्रोध आया। वह रुका और..पूरे आवेग के साथ पिल्लों पर झपट पड़ा।
शीघ्र ही..पिल्ले घबराकर भाग निकले।■
- डण्डा ‘आज फिर गलत लिखा..बेवकूफ कहीं का! चल बीस बार इसे अपनी कापी में लिख।’
‘नही लिखूंगा!’ उसके स्वर की कठोरता देखकर मै दंग रह गया। मैंने पूछा ‘क्यों नही लिखोगे?’
‘पिताजी रोज दारू पीकर मारते हैं..कहते थे, अब एक महीना पूरा होने से पहले नई कापी मांगी तो बहुत मारूंगा..’ कहते हुए डण्डा खाने के लिए अपने नन्हे हाथ उसने आगे कर दिए।
मैं उसकी डबडबाई आंखों में झांकता रहा। मेरा उठा हुआ हाथ जाने कब का नीचे ढरक गया था।■ - विद्रोही
पार्क की बेंच पर बैठे एक सेठ, अपने पालतू ‘टॉमी’ को ब्रेड खिला रहे थे। पास ही गली का एक आवारा कुत्ता खड़ा दुम हिला रहा था।
वह खड़ा दुम हिलाता रहा, हिलाता रहा। पर..लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी जब, कुछ मिलने की संभावना नहीं दिखी तो..एकाएक झपट्टा मारकर वह ब्रेड ले उड़ा। कयांउ-पयांउ करता टॉमी अपने मालिक के पीछे जा छिपा। सेठ अपनी उंगली थामे चिल्लाने लगा।
थोड़ी दूरी पर बैठे उसे,बहुत अच्छा लगा था यह सब देखना।■
- निर्माता
ईश्वर और इंसान – एक बार कहीं मिल गए।
एक दूसरे को देखकर, दोनों के मुंह से यही शब्द निकले “ओह, मेरे निर्माता!”■
प्रश्न-11 पुराने तथा वर्तमान समय के अपनी पसंद के दो-दो लघुकथाकारों के नाम बताएं और यह भी कि वे आपको क्यों पसंद हैं?
उत्तर : यह एक मुश्किल प्रश्न है। इसका कारण यह है कि पुराने तथा नए साथियों में दो-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे हैं जिन्होंने बहुत उम्दा लिखा है। इन सबके नाम नहीं देना.. बेइंसाफी हो जाएगी। फिर भी जरूरी है तो सूर्यकांत नागर, डॉ सतीश दुबे, डॉ सुरेंद्र मंथन, अशोक लव, प्रो रूप देवगुण, डॉ रामनिवास मानव, सुकेश साहनी, अशोक वर्मा, बलराम अग्रवाल, शकुंतला किरण, पवन शर्मा – तथा अपेक्षाकृत नयों में संतोष सुपेकर, ज्योति जैन, पंकज शर्मा, विरेन्द्र वीर मेहता, विजयानंद विजय, संदीप तोमर, सारिका भूषण तथा ज्योत्स्ना कपिल आदि का उल्लेख करना चाहूंगा। इनकी अनेक लघुकथाओं में एक परिपक्वता, एक सधा हुआ कौशल अनुभव होता है जिसके चलते वे हृदय को छू जाती हैं।
प्रश्न-12 ऐसा भी देखा गया है कि वर्तमान में कई लेखक किसी घटना, प्रसंग, अनुभव अथवा चुटकुले को भी वैसे के वैसा लघुकथा के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं, आपके अनुसार इन सब को एक सफल लघुकथा में परिवर्तित करने के लिए लेखक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
उत्तर : अच्छी या कहें सफल लघुकथा लिखने का कोई फार्मूला न है, न हो सकता है। मुझे लगता है लघुकथाओं की संख्या बढ़ाने की भी कोई हड़बड़ी नहीं पालनी चाहिए।
लिखें चाहे कम, मगर ज्यादा से ज्यादा पढ़ें। विशेषतया नए साथियों को कहना चाहूंगा कि बीस-तीस या इससे भी पहले से लिख रहे वरिष्ठ लघुकथाकारों की एकल पुस्तकों को धैर्यपूर्वक अधिकाधिक पढ़ें। इससे उनमें अपनेआप विधा के प्रति अपेक्षित, जरूरी समझ विकसित होगी। इसका सकारात्मक प्रभाव निश्चय ही उनके लेखन पर भी पड़ेगा।
प्रश्न-13 वर्तमान में नवोदित लघुकथाकार काफी भ्रमित है, एक ओर उसे लघुकथा के मानक बताए जाते हैं और दूसरी ओर अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से यह सुनने को मिलता है कि ‘लघुकथा मुक्त होनी चाहिए उसे मानकों में जकड़ना उसके प्रवाह को अवरुद्ध करता है l’ इस सन्दर्भ में आप नवोदित लघुकथाकारों को क्या सन्देश देंगेl
उत्तर : जैसा कि अभी कहा बढ़िया लघुकथा का कोई निश्चित फार्मूला नहीं होता। ऐसा फार्मूला किसी के पास होता तो उसकी सभी लघुकथाएं श्रेष्ठ होती। मगर ऐसा है नहीं।
अतः कथित मानकों के सांचे में अपनी रचना को ‘फिट’ करने का प्रयास भी व्यर्थ सिद्ध होगा। हां..नए लेखक को अध्ययनशील अवश्य होना चाहिए। इससे सृजनशीलता निश्चय ही बढ़ेगी। नए विचार, नए प्रयोग सूझेंगे तो रचनाधर्मिता को नया आकाश मिलेगा। मेरा मत रहा है समर्थ रचनाकार मानकों का पीछा नहीं करते – बल्कि स्वयं नए मानक गढ़ते हैं। यह क्रम अनंत..असीम है।■

