रचनाकार

आईने यू तो शाकिर ने देखे बहुत, तुमसा देखा नहीं दिल रूबा आईना

( शाकिर नकश्बंदी )

पहले खुदको सरापा बना आईना,
फिर ज़माने को जाकर दिखा आईना,
जो पसंद तुझको आए वो ला आईना,
घर को जन्नत के जैसा बना आईना,
शुक्र क्यू ना खुदा का अदा मैं करू,
जैसा सोचा था वैसा मिला आईना
मै तुझे भुल जाऊ ये मुम्किन नही,
इस तरह मेरे दिल मै बसा आईना,
दिल में अपने चराग़े मोहब्बत जला,
तुझसे करने लगेगा वफा आईना,
उनको घर का पता ना बताना कभी,
दोस्तों की नजर से बचा आईना,
मुझको दिखती नही है मेरी खामियाँ,
कोई आकर दिखादे ज़रा आईना,
मिस्ले पत्थर के मै हो ना जाऊ कहीं,
औ मेरे हमंनशी आ दिखा आईना,
आईने यू तो शाकिर ने देखे बहुत,

तुमसा देखा नहीं दिल रूबा आईना।

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