तुम पास मेरे आना तो नखरे उतार कर रखती है मेरी माँ मेरे सदके उतार कर
माँ के कई रूप हैं ,वो जननी है पालनहार भी है ,रक्षक है ,तो सबकी अस्तित्व भी है ,एक रचना माँ ,और प्रकृति पर ,सामयिक समस्या पर प्रस्तुत है
ताटंक ,और कुकुभं छंद में…
( विभा तिवारी )
माँ तो माँ होती है ये, बात सभी ने है माना
पर अंतरमन की पीड़ा को ,क्या तुमने है पहचाना
होठों पे इक मौन लिए अब,जिन्दगी य ठहर गई है
आँखों को बेचैन किए है, गम लवों से गुजर गई है
टीस उठ रही है अंदर से, अब झंझावात बड़ा है
अभिलाषाएं बिखर रहीं हैं ,जीवन भी शान्त पड़ा है
समय कठिन है आज विश्व मे ,कोरोना ये ठहरा है
धर्य हृदय मे तुम रखो सब , गुजरेगा, सब गुजरा है
गलत राह पर जब अपना ,तुमने कदम बढाया है
दुर्गा काली चंडी बन कर ,उसने सबक सिखाया है
बिना हौसला कभी समर मे , कोई जीत नही होती
ये भी तो तुलसी ने कह दी ,भय बिन प्रीत नहीं होती
जिसने तुमको जनम दिया है,उसको बंजर कर डाला
क्रोधित होकर उसने तुमको, सबक बड़ा ये दे डाला
लेखिका विभा तिवारी, जौनपुर

