रचनाकार

व्यंग्य : वतन सभी का है, स्वार्थ के लिए क्यों सब पे उंगली उठा गए

( कामनी गुप्ता )

सुलग रही थी कहीं चिंगारी और वो यूं हवा देने आ गए,
बात वतन की गरिमा की थी मुफ़्त में राजनीति दिखा गए।

भोली-भाली जनता के सम्मुख बस आंसू बहा कर फिर,
चुनाव में अपने वोट बढ़ाने को शातिर नेता हाथ आज़मा गए।

मुश्किल वक्त में भी देखो कैसे मौके की तलाश में निकले हैं,
खुद चाहे कुछ न करें मगर जनता को ट्विटर में उल्झा गए।

अब भी वक्त है कुछ और नहीं इंसानियत तो दिखला दें कहीं,
अपना दोहरा चेहरा छुपाने की खातिर सरकार को दोषी बता गए।

मतभेद रखो कोई बात नहीं पर मनभेद को इतना बढ़ाओ मत ,
वतन सभी का है स्वार्थ के लिए क्यों सब पे उंगली उठा गए।

(लेखिका कामनी गुप्ता जम्मू की निवासी हैं)

One thought on “व्यंग्य : वतन सभी का है, स्वार्थ के लिए क्यों सब पे उंगली उठा गए

  • केदारनाथ शब्द मसीहा

    आज ऐसे प्रश्न उठाने की बहुत जरूरत है । तभी समता और समानता का संविधान में लिखा गया सपना , जीवन मे उतर सकेगा । कामनी गुप्ता जी को बहुत-बहुत बधाई ।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *