शब्द मसीहा : टोकन नंबर आठ
(शब्द मसीहा केदारनाथ)
सायरन बजाती हुई एंबुलेंस दरवाजे के आगे आकर खड़ी हो गई थी। बूढ़े बाप की टांगे किसी आशंका से काँप रहीं थीं। एंबुलेंस से उतरकर सोनू दादाजी के पास आ पहुंचा था ।
“बाबा ! आप पिताजी को अंतिम बार देखना चाहते हैं तो चलिए। माँ को और दादी को श्मशान में पापा के पास छोड़कर आया हूँ।”
“बेटा! अपने चाचा को फोन नहीं किया क्या?”
“शहरभर में कर्फ्यू लगा है। कोई चाहकर भी नहीं आ सकेगा। बड़ी मुश्किल से इस एंबुलेंस वाले को लेकर आया हूँ ताकि आपको श्मशान घाट में पापा के दर्शन करा सकूं।”
बुजुर्ग की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली थी। कैसा अजीब समय है, जहाँ कोई अपनों को भी नहीं देख सकता।
“मोहल्ले वालों को बताया है?” दादा ने सहारा लेकर खड़े होते हुए पूछा।
“बताने से क्या फायदा होगा। पापा की बॉडी को तो सील किया हुआ है, और इस भयानक बीमारी में भला कौन किसी का साथ देता है। आप चलिए मेरे साथ। अभी तो बहुत देर इंतजार करना पड़ेगा। और भी लोग अपने-अपने लोगों के शव लेकर श्मशान घाट में अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं। हमें भी कुछ घंटे इंतजार करना पड़ेगा। इस एंबुलेंस वाले को भी अपने काम पर जाना है दादा, आप जल्दी से चलिए।”
दादा और पोता दोनों एंबुलेंस की तरफ बढ़ चले थे। तभी किसी ने जोर से पुकारा- “अरे सोनू! क्या हुआ रे एंबुलेंस कैसे घर लेकर आया है?”
सोनू ने स्वर को पहचान लिया था।
“अहमद अंकल ! पापा नहीं रहे। दादा जी को लेने आया हूँ?” सोनू ने जवाब दिया।
“अरे रुक , मैं भी आता हूँ।”
सोनू के तो जैसे पैर ही ठिठक गए थे । अहमद अंकल की बात को सुनकर उसके दिमाग में न जाने क्या-क्या चल रहा था। कई सारे दृश्य और टीवी पर दिखाए जाने वाले समाचार उसकी आंखों के सामने नाचने लगे थे। जिनमें दो समुदायों को एक –दूसरे का दुश्मन दिखाया जाता था ।
“यह मुसलमान होकर भी हमारे साथ क्यों जा रहा है। इसके दादा के साथ तो हमारे दादा की लड़ाई हुई थी।“ सोनू सोचने लगा।
तभी बिल्डिंग का गेट खुला आज अहमद अंकल सामने आकर खड़े हो गए थे ।
“बेटा! .जीवन और मृत्यु हर इंसान की जिंदगी में आते हैं। मुझे भी अल्लाह को जाकर मुंह दिखाना है। बेशक अब्बू मियां और बड़े मियां की लड़ाई हुई थी, पर हम उस प्यार को भी नहीं भूल सकते जो मेरे अब्बू के मन में है। शायद तुम्हारे दादा जान भी नहीं भूले होंगे। एक पड़ोसी का धर्म, एक पड़ोसी को निभाना ही चाहिए। अल्लाह की इबादत के साथ-साथ अपने जैसे लोगों की इमदाद करना एक सच्चे मुसलमान का काम है।” और उसने दादा जी के पैर छू लिए।
“अबे अहमद ! तुझे तेरी माँ ने सबसे पहले मेरी गोद में दिया था। यह तो ऊपर वाले की कोई लीला है। न जाने कैसे उस रोज मेरा भी दिमाग खराब हो गया था। तेरे बाप के बारे में सोचता रहता हूँ। कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि उसे जाकर अपने सीने से लगा लूं। पर सच तो यह है कि वह मेरे से दूर कभी हुआ ही नहीं । जितना प्यारा मुझे मेरा बेटा था, उतना ही प्यारा तू भी है। जो ईश्वर ने लिखा था वह तो हो चुका है। पर बेटा, मैं तुझे अपने साथ नहीं ले जा सकता। यह बहुत ही नामुराद बीमारी है, अगर तुझे कुछ हो गया तो मैं अपने दोस्त को क्या मुंह दिखाऊंगा।” दादा जी ने अहमद से कहा।
“मैं जानता हूँ कि बहुत नामुराद बीमारी है लेकिन इंसानियत का फर्ज है कि मैं दूसरे बाजू के रूप में आपके साथ मौजूद रहूँ । हां, मेरी अम्मी आपको भाई जान कहा करती थी। वैसे ही मुझे भी भाभी, भाई जान ही कहते हैं। मैं उनसे किस तरह आंखें मिला पाऊंगा। आज आप रोकेंगे, तब भी मैं नहीं रुक सकता । कम से कम इस आखिरी वक्त में तो मुझे पराया मत कीजिए।”
और अहमद ने दादा जी का हाथ पकड़कर उन्हें एंबुलेंस में चढ़ने में मदद की। पीछे-पीछे सोनू भी एंबुलेंस में सवार हो गया और एंबुलेंस श्मशान घाट की तरफ दौड़ पड़ी। एंबुलेंस के अंदर तीनों एक दूसरे को निहार रहे थे, किसी के भी मुंह से कोई बात नहीं निकल रही थी। कुछ देर बाद जब एंबुलेंस श्मशान घाट के पास पहुंची, तब एंबुलेंस वाले ने उन्हें श्मशान घाट के बाहर ही छोड़ दिया। अहमद, दादाजी का हाथ पकड़े हुए आगे बढ़ने लगा। अहमद को देखते ही और दादा जी को सामने पाकर सास- बहू दोनों ने ही विलाप करना शुरू कर दिया। दादा जी खामोश खड़े थे। श्मशान घाट के बाहर एंबुलेंस की लाइन लगी हुई थी । श्मशान घाट के गेट के अंदर कई शव जलाए जाने का इंतजार कर रहे थे। हर एक के मुंह पर मास्क चढ़ा हुआ था, इसलिए किसी को पहचान पाना भी बहुत मुश्किल था ।
सोनू को साथ लेकर अहमद श्मशान घाट के अंदर चला गया। सोनू से पूछने पर पता चला कि उसे आठ नंबर टोकन मिला है। अहमद ने लकड़ियों के बारे में पूछताछ की और सोनू ने बताया कि दादा जी को यहां लाने से पहले ही उसने लकड़ियों के पैसे जमा करवा दिए हैं । बीसियों लाशें श्मशान घाट के अंदर धू-धू कर जल रहीं थीं । पूरे श्मशान घाट में लाशों के जलने की बदबू फैली हुई थी। ऐसा लगता था जैसे कि पूरा शहर का शहर ही मरघट में तब्दील हो गया हो। श्मशान घाट में काम करने वाले लोगों ने अलग से कई चबूतरे बनाए थे। ऐसा लगता है जैसे लाशों की संख्या को देखते हुए उन्होंने जल्दबाजी में ही यह सब इंतजाम किया है।
तभी उनमें से किसी ने पुकारा-” टोकन नंबर 7 और 8 तैयार हो जाओ।”
“अरे बेटा! कोई मुझे मुंह तो दिखा दो।” दादा जी ने आवाज लगाई।
“अरे बाबा जी! लाश का मुंह देखना मना है । आपको लाश का मुंह नहीं दिखाया जा सकता। बीमारी से मौत हुई है। हो सकता है किसी और को भी यह बीमारी लग जाए।” श्मशान घाट में नियुक्त पुलिस वाले ने कहा।
दादाजी ने दुख के मारे दोनों मुट्ठियाँ और जबड़े भींच लिए थे। माँ और दादी का रोना फिर से और तेज हो गया था। शव को श्मशान घाट के लोग स्ट्रेचर से उठाकर काठी पर रख चुके थे।
“अरे! किसी को हाथ लगाना है तो हाथ लगा लो।” श्मशान घाट का एक कर्मचारी बोला।
इस आवाज को सुनकर टोकन नंबर 7 के लोग स्तब्ध खड़े हुए थे। किसी ने भी लाश को हाथ नहीं लगाया था। अलबत्ता लाश के साथ जरूर चल रहे थे। कैसा दिल को चीर देने वाला दृश्य था यह। अब लोग सिर्फ टोकन नंबर बन चुके थे। सोनू ने फटाफट कफन के सामान की पोटली को खोला और कफन निकालकर काठी पर रख दिया। श्मशान घाट के दो कर्मचारियों ने सोनू के पिता की लाश को उठाकर काठी पर रख दिया। सोनू ने हाथों में दस्ताने पहने हुए थे, मुंह के और सिर के ऊपर पूरी तरह से ढंका हुआ था। पिता के शरीर को उस ने दूसरे कपड़े से ढँक दिया । माँ और दादी का चीत्कार और तेज हो गया था।
अहमद आगे बढ़ा और उसने पीछे की तरफ से काठी को सहारा दिया । और सोनू की तरफ देखते हुए कहा -“सोनू बेटा आओ, अब इन्हें ले चलें।”
कैसा अजीब मंजर था। एक आदमी को चार कंधे नसीब नहीं हो रहे थे। सोनू ने अपने पिता की अर्थी को आगे से उठाया। तभी दादाजी आगे बढ़े और अपने हाथ अपने बेटे के सिर पर रख दिये ।
“तेरी भी कोई जाने की उम्र थी बेटा, जाना तो मुझे था। न जाने कौन से कर्म का बोझ उठाने के लिए मैं अभी तक जिंदा हूँ। मुझे तो तेरे कांधे पर जाना था, पर हाय रे विधाता, मेरी आंखों के सामने तू जा रहा है।” दादाजी विलाप करते हुए जमीन पर बैठ गए थे।
“चलो बेटा।” अहमद के कहते ही सोनू चल पड़ा था। श्मशान घाट के कर्मियों ने जिस तरफ इशारा किया था, उस तरफ ले जाकर के काठी को रख दिया। दो लोग लकड़ियों का ठेला खींचते हुए आठ नंबर की जगह तक ले आए थे।
“अरे भाई! तुम इस आठ नंबर के साथ हो?” लकड़ी का ठेला खींचकर लाए हुए एक आदमी ने कहा।
“हाँ, हम इनके साथ हैं।”
“तो भाई! ये लकड़ियां रखना शुरू करो। हमारे तो हाथ छिल गए हैं लकड़ियां उठाते उठाते , और लगाते हुए। यह मोटी- मोटी दो लकड़ियां नीचे रख लेना। साइड से यह बल्ले लगाने हैं। बाकी तुम्हें पंडित जी बता देंगे।” और वे दोनों लोग फिर से अपना खाली ठेला खींचते हुए आगे चले गए।
असलम ने जो दो बड़ी भारी- भारी लकड़ियां बताई थी, उन्हें खींचकर ईटों के बनाए हुए चबूतरे पर लगा दिया। सोनू भी उसके साथ जुटा हुआ था। कुछ ही देर में दो लोग आ गए।
“क्रिया का सामान कहां है?” उनमें से एक बोला। उसके हाथ में लोहे का एक तसला था। उसने तसले को जमीन पर रखा ।
सोनू ने सामग्री की और क्रिया के सामान की थैली उसके सामने रख दी । उसने थैली को उलट दिया और उसके अंदर से सामग्री निकालकर तसले में डाल दी। उसके बाद उसमें चीनी, राल,घी और दूसरी चीजें मिलाने लगा।
“चलो भाई! जरा हाथ लगाओ।” और उस ने सोनू के पिता के शरीर को उठाकर दोनों लकड़ियों के ऊपर सजा दिया।
फिर वह कुछ लकड़ियां अपने हाथ से लगाने लगा और बोला-” यह पेटी की लकड़ियां अंदर लगानी हैं, और ये बड़ी लकड़ियां साइड में लगा कर के चिता को बनाने में मदद करो भाई।”
सोनू और अहमद दोनों ही जुट गए थे। पंडित ने गंगाजल की शीशी उठाई और उसके बाद लाश के चारों तरफ छींटे मारते हुए कुछ मंत्र पढ़ने लगा। काठी के पुआल को उसने सोनू के पिता के सिर के नीचे लगा दिया था। कपूर निकाला गया , धूपबत्ती के डब्बे से धूपबत्ती निकालकर एक डंडे के ऊपर पुआल के साथ रख दी गई और कपूर सुलगा दिया गया।
“बेटा! इसको लेकर अपने पिता के सात प्रदक्षिणा करो। गायत्री मंत्र का जाप करते जाओ।” पंडित बोला।
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।” सोनू ने बोलना शुरू कर दिया और अहमद भी पीछे- पीछे इसे दोहरा रहा था। जब सात प्रदक्षिणा पूरी हो गईं तब सोनू के हाथ से वह डंडा, जिसमें अग्नि प्रज्वलित थी, लेकर पंडित ने चिता के सिर के नीचे रख दिया। देखते ही देखते धुआं उठने लगा और फिर लकड़ियों ने आग पकड़ ली ।
“देखो भाई, अभी तो अस्थियों का हरिद्वार ले जाना मुश्किल है। सभी अस्थियों को इकट्ठा ही हरिद्वार भेजने के लिए ट्रस्ट ने इंतजाम किया हुआ है। कर्फ़्यू खुलने के बाद सभी अस्थियों को विधिवत गंगा जी में विसर्जित करवा दिया जाएगा। आप जाकर के पर्ची कटवा लीजिए। कल सुबह सात बजे इन की अस्थियों को चुनने के लिए आ जाना। दूध, पांच मेवा पांच फल और पांच मिठाई भी ले आना। अस्थियों को रखने के लिए थैली भी साथ लानी है।” कहते हुए पंडित दूसरी तरफ चला गया ।
सोनू की आंखें अपने पिता को जलते हुए देख रही थीं । भाव इतना उमड़ पड़ा था कि बच्चे की हिचकियां बंध गई थीं । अहमद ने सोनू को अपने सीने से लगा लिया और कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। फिर सोनू का हाथ पकड़कर वह बाहर की तरफ चलने लगा।
“अहमद! कर दिया अपने भाई को विदा।” दादाजी भर्राए हुए गले से बोले।
अहमद ने कुछ नहीं कहा, वह किसी मौन अपराधी की तरह उनके सामने खड़ा हुआ था।
“अभी तो बहुत कुछ करना था तुझे। बेटे का ब्याह देखना था। ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी तुझे जाने की।” दादा जी ने अपना हाथ अपने माथे पर मारते हुए कहा तो उधर से माँ और दादी ने भी जोर से रोना शुरू कर दिया था।

“भाभी जी! माँ जी को संभालिये। अब तो आपको बहुत सब्र से काम लेना है। अगर आप ही हिम्मत हार देंगी तो फिर कैसे चलेगा। अब तो आप ही इस घर का बेटा हैं। जो कुछ भी होना था अब अल्लाह की मर्जी से वह हो चुका है। कल सुबह मैं और सोनू आ जाएंगे अस्थियों को चुनने के लिए।” अहमद ने कहते हुए दादाजी को सहारा दिया तो दूसरी तरफ से सोनू ने दादाजी का हाथ पकड़ लिया। माँ और दादी दोनों एक दूसरे का सहारा लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगीं। यहाँ चुप भी कराने वाला कौन मौजूद था भला। खुद ही रो-रोकर चुप हो गई थीं ।
“अबे अहमद! अपने बाप से कह दियो, मेरे बेटे को अब तो माफ कर दे। उसकी तरफ से मैं माफी माँग रहा हूँ बेटा।” दादाजी ने कहते हुए अपना सिर अहमद के कंधे पर रख दिया था ।
“दादाजी! अब्बू तो कब का माफ कर चुके हैं, उन्होंने ही तो मुझे भेजा था। पता तो हमें लग ही गया था लेकिन आने की हिम्मत नहीं हो रही थी। हमें तो आप दोनों के बीच में बोलना ही नहीं चाहिए था। आप लोग बड़े थे, आपस में लड़ सकते थे, लेकिन हमारा बीच में आना ठीक नहीं था। आप मुझे भी माफ कर दीजिए और हो सके तो मुझे अपने बेटे की जगह ही समझिए। न हमारा मजहब अलग है न आपका धर्म अलग है, मरना तो एक दिन सबको ही है।”
“अहमद चाचा! ऐसा मत कहिए। हमारे पास तो आज हमारे अपने भी नहीं आ सके। अगर आप नहीं होते तो यह सब कैसे होता।” सोनू बोला।
“अरे! तेरा बाप मेरा भी तो कुछ लगता था, साथ कैसे नहीं आता। आखिरत के समय क्या किसी को बुलाने की जरूरत होती है। अगर मुझे कुछ हो जाता तो, तू क्या नहीं आता….बोल रे छोटे ।” अहमद ने भरे गले से कहते हुए सोनू को भी अपने सीने से लगा लिया।
शमशान की आग आज उन्हें एक सबक सिखा चुकी थी कि मुसीबत सब के ऊपर एक जैसी होती है, और मुसीबत के समय कोई पराया नहीं होता। टोकन नंबर आठ एक बड़ा सबक सीखा गया था।
