शब्द मसीहा की कहानी : मुझे कंचना ही रहने दो
( शब्द मसीहा केदारनाथ )

कॉलेज के कंपाउंड में बहुत सारे लड़के-लड़कियां बैठे हुए एक -दूसरे से बतियाने में मशगूल थे। कंचना इन हँसते- खेलते बच्चों को देखकर बहुत ही खुश होती थी। जब भी उसे अपनी क्लास के बाद मौका मिलता तो वह अक्सर इन्हीं बच्चों को निहारना पसंद करती थी। अपनी क्लास के अंदर वह बच्चों के साथ बहुत ही शालीनता और नरमी से पेश आती थी। उसकी क्लास के अंदर कुछ बच्चे गरीब घरों से भी आते थे। उन बच्चों की न सिर्फ़ पढ़ाई में मदद की बल्कि चुपके से उनकी आर्थिक मदद भी की थी, ताकि उन्हें किसी के सामने नीचा न देखना पड़े ।
कॉलेज के स्टाफ रूम में कई बार कंचना अपने साधारण कपड़ों के होने के कारण अपने साथी प्रोफेसरों की फब्तियों का शिकार होती रहती थी। उसे इन सब चीजों बस मुस्कुराकर टालना आता आता था। वह कभी भी अपने बचाव के पक्ष में नहीं रहती थी । यूं भी वह हॉस्टल में रहने वाली अकेली प्रोफेसर थी महिलाओं के ग्रुप से। उसे तो यह भी नहीं पता होता था कि उसका जन्मदिन कब है। वह तो कॉलेज के रजिस्ट्रार मोहन बाबू ही थे जो उसे याद करवाते थे कि आज उसका जन्मदिन है। मोहन बाबू भी कॉलेज के हॉस्टल में ही रहते थे।
उस रोज कंचना का जन्मदिन था और मोहन बाबू कॉलेज में आने से किसी काम की वजह से लेट हो गए थे। कंचना ने आज हल्के नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी और उसके शरीर पर बहुत फब भी रही थी । तभी मिसेज शर्मा ने कंचना को देखते हुए कहा, ” क्या बात है कंचना, आज तो तुम्हारा रंग- रूप ही बदला हुआ है।”
कंचना बस उनकी तरफ देख कर मुस्कुराई थी। उसमें कोई जवाब नहीं दिया था। वह चुपचाप बच्चों के नोट्स पढ़ते हुए उनकी मार्किंग में व्यस्त रही।
कुछ देर बाद स्टाफ रूम के दरवाजे पर दो बच्चे आकर खड़े हो गए थे। उन बच्चों के हाथों मंए दो गुलदस्ते थे। उन्होंने स्टाफ रूम में आने की परमिशन मांगी और वे दोनों मुस्कुराते हुए कंचना मैडम की तरफ बढ़ गए।
“हैप्पी बर्थडे मैडम।” और उन दोनों ने वो गुलदस्ते कंचना मैडम की तरफ बढ़ा दिए। स्टाफ रूम के अंदर तो जैसे यह अनोखी घटना हो गई थी। कंचना पिछले कई साल से कॉलेज में पढ़ा रही थी लेकिन उसने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया था।
“अरे कंचना! तुम तो बहुत छुपी रुस्तम हो, तुमने किसी को भी नहीं बताया कि आज तुम्हारा जन्मदिन है।”
“हां मैडम, अब जन्मदिन मनाने का मन ही नहीं करता। अब तो मैं खुद भी भूल चुकी हूँ कि कभी मेरा जन्म भी हुआ था।” कंचना ने अपना सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया।
“कंचना! तुम अपने आप को इतना रिजर्व क्यों रखती हो? हो सकता है तुम्हारे अपने कारण हों, लेकिन तुम्हें अपने बारे में भी सोचना चाहिए। वैसे तो हमें कोई अधिकार नहीं बनता कि हम तुम्हारी निजी जिंदगी में दखल दें, लेकिन तुम्हारी उदारता की खबरें कई बार हमारे कानों में पड़ी हैं। मैं तुम्हें बता देना चाहती हूँ कि इस जमाने में सिर्फ पैसा ही हमारा सबसे बड़ा दोस्त होता है। मुझे नहीं पता कि तुम्हारा परिवार कैसा है, लेकिन ये इस तरह से अपने पैसों को उड़ाना ठीक नहीं है। और मैं तो ये भी कहूँगी कि अभी तुम्हारी उम्र भी कुछ ज्यादा नहीं हुई है, अगर कोई जीवनसाथी तुम्हें तुम्हारी पसंद का मिल जाता है तो तुम्हें अपना घर बसा लेना चाहिए।” मैडम शर्मा ने अपनी बात कंचना के सामने रख दी थी।
कंचना ने इस बार भी चुप्पी साधे रखी थी और मैडम शर्मा की तरफ देखकर बस हौले से मुस्कुरा दी थी । बच्चे अभी भी कंचना के पास ही खड़े हुए थे। कंचना ने दोनों बच्चों का आभार व्यक्त किया और उनके सिर पर अपनी ममता का हाथ रखते हुए उन्हें उनके जीवन में सफल होने का आशीर्वाद दिया। बच्चे स्टाफ रूम से बाहर चले गए थे। कंचना अभी भी अपने काम में व्यस्त थी।
जैसे ही दूसरे पीरियड के अनाउंसमेंट हुई, एक लड़की ने स्टाफ रूम के अंदर प्रवेश किया। उसमें आकर कंचना को नमस्ते किया और उसने संदेश दिया कि मोहन बाबू आपको बुला रहे हैं। उसके बाद वह लड़की वापस चली गई।
कंचना को समझ नहीं आ रहा था कि मोहन बाबू को उससे क्या काम हो सकता है। रात बारह बजे मोहन बाबू का जन्मदिन का बधाई संदेश दो पहले ही आ चुका था, और वह उन्हें उसका शुक्रिया भी कह चुकी थी । फिर भी मन में आया कि हो सकता है किसी स्टूडेंट से रिलेटेड कोई काम होगा। कंचना स्टूडेंट्स की नोटबुक्स अपनी अलमारी में बंद कीं और मोहन बाबू के कमरे की तरफ चली गई।
कमरे के अंदर पहले ही कुछ और साथी प्रोसेसर मौजूद थे। उन सभी ने कंचना का तालियां बजाकर स्वागत किया और उसे उसके जन्मदिन की बधाई दी। मोहन बाबू ने टेबल पर कंचना का नाम लिखा एक छोटा- सा केक भी रखा हुआ था, और साथ ही मिठाई और चाय नाश्ते का इंतजाम भी किया हुआ था।
“आइए कंचना जी! आज हम सब की तरफ से आपके जन्मदिन पर आपके लिए यह छोटा- सा प्रोग्राम रखा गया है।” और मोहन बाबू ने केक काटने के लिए छुरी कंचना की तरफ बढ़ा दी ।
कंचना को यह सब बहुत अजीब लगा था। उसमें मोहन बाबू के हाथ से छुरी लेते हुए कहा, ” मोहन बाबू! आपको मुझसे पूछ तो लेना चाहिए था।”
फिर भी क्योंकि सारा स्टाफ वहां कंचना की तरफ़ ही देख रहा था उसमें अनमने से मनसे केक के ऊपर छुरी चला दी । उसके बाद कंचना ने सभी को केक के टुकड़े करके देना शुरू कर दिया। जब चाय-नाश्ता हो गया तो कंचना भी अपनी क्लास का बहाना करके वहां से चली गई।
रात के लगभग साढ़े आठ बजे थे और स्टूडेंट के साथ कॉलेज में रहने वाले एक -दो प्रोफेसर कैंटीन में एक तरफ बैठे हुए खाना खा रहे थे। जैसे ही कंचना ने प्रवेश किया तो मोहन बाबू ने उन्हें अपने ग्रुप में आकर खाना खाने के लिए इशारा किया। कंचना ने अपनी थाली में अपने लिए खाना लिया और उन सब के साथ बैठकर खाना खाने लगी । कंचना की आदत थी कि वह बहुत धीरे-धीरे खाना खाती थी। इसलिए बाकी लोग अपना खाना खाकर चले गए थे, बस मोहन बाबू और कंचना ही अब खाने की टेबल पर बैठे थे। यूं तो मोहन बाबू अपना खाना खा चुके थे लेकिन शिष्टाचार के नाते वे कंचना के सामने बैठे रहे।
“मोहन बाबू! आपका खाना हो चुका है। आप तकलीफ न करें, अगर आपको जाना है तो जा सकते हैं। मुझे खाना खाने में देर लगती है।” कंचना ने कहा।
“ठीक है, लेकिन मैं चाहूँगा कि खाना खाने के बाद आप थोड़ी देर मेरे साथ सैर भी करें अगर आपको कोई ऐतराज न हो तो।” मोहन बाबू ने अपनी थाली उठाई और वे कैंटीन में अपनी थाली को उसकी नियत जगह पर रख कर बाहर निकल गए।
कुछ देर बाद कंचना भी खाना खाकर बाहर निकल गई। मोहन बाबू जैसे उसके आने का ही इंतजार कर रहे थे।
“आइए।” और मोहन बाबू ने कंचना के बगल में चलना शुरू कर दिया।
“मोहन बाबू ! आज जो आपने किया है, कृपया आप कभी भी उसे न दोहराएँ । यह सब मुझे अच्छा नहीं लगता है।” कंचना ने कहा।
“माफ कीजिए कंचना जी! मुझसे गलती हो गई। मुझे पहले आपसे पूछ लेना चाहिए था।”
” हां, अगर आप ऐसा करते तो मुझे खुशी होती।” कंचना ने कहा ।
“कैसी बातें करती हैं कंचना जी , भला क्या हमें इतना भी अधिकार नहीं कि हम आपका जन्म दिन मना सकें?”
“नहीं, मैं ये अधिकार किसी को नहीं दे सकती। आप मेरे बारे में बहुत कम जानते हैं ।“
“मैं सिर्फ अपने बारे में जानता हूँ, और मुझे आपका जन्म दिन मनाकर बहुत खुशी हुई। आप मेरे बुलाबे पर आई , मैं उसके लिए आभारी हूँ। दरअसल मेरे घर से अब बहुत दबाब आ रहा है कि मैं शादी कर लूँ । मुझसे छोटे भाइयों की भी शादी हो चुकी है। मैं काफी समय से आपको लेकर कुछ सोच रहा था। आपका तो कोई और है नहीं , इसलिए मैं आप से बिना पूछे प्यार बैठा हूँ ।“ मोहन बाबू ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी थी।
“हा हा हा …. मोहन बाबू ! अपने ऊपर काबू रखिए। मैं न तो बेसहारा हूँ और न ही बेचारी। रहा शादी का सवाल तो वो इक्कीस साल की उम्र में हो चुकी है। मैं एक बेटे की माँ भी हूँ।“
कंचना ने तो ये कहकर जैसे मोहन बाबू को बहुत तगड़ा झटका दे दिया था। उनके कदम एकदम से लड़खड़ा गए थे। उन्हें जैसे इस बात को सुनकर गहरा आघात लगा था।
“पर …..ये सब ? तुम तो अभी भी मिसेज नहीं लिखती हो। पति का नाम भी नहीं लिखवाया।“ अवाक से मोहन बाबू ने कहा।
“हाँ, क्योंकि मेरा मिस्टर है ही नहीं, तो मिसेज का तमगा लगाए क्यों घूमूँ मैं ?”
“और आपका बेटा कहाँ है? आप कैसी माँ हैं ? तीन साल से ज्यादा हो गए , कभी उस से मिलने का मन नहीं हुआ ?” मोहन बाबू ने कहा।
“औरत का अपना कुछ होता है क्या इस समाज में ? औरत तो सिर्फ मशीन है बच्चा जनने की । किसी को बाप बनना है तो किसी को दादी। औरत ही औरत को नहीं समझ पाती। औरत ही औरत की दुश्मन है, मोहन बाबू।“
“मुझे नहीं पता था कि मैं आपको अंजाने में इस तरह दुखी कर दूंगा। मुझे माफ कर दीजिये। पर अगर आप मुझे इस लायक समझती हैं तो इस दुर्घटना को सुना जरूर दीजिये। मुझे अब भी भरोसा नहीं हो रहा है।“ मोहन बाबू ने कहा।
“हाँ, अब ज़िन्दगीभर बस उस दुर्घटना को ही तो याद करते हुए मरना है मुझे। थोड़ा- सा रहम आप भी खा लीजिएगा मुझपर।
कंचना अभी भी मोहन बाबू के साथ चले जा रही थी ।
“आप जानना ही चाहते हैं तो सुनिए । बात उन दिनों की है जब मैं बी ए के फाइनल साल में थी। माँ-बाप ने मेरी शादी का फैसला कर लिया था। बड़ा और अमीर परिवार था। पिताजी के पास रिश्ता भी ख़ुद लड़के वालों की तरफ से आया था। मेरे माँ-बाप को इस रिश्ते में कोई बुराई नहीं दिखती थी। सो जल्द ही शादी का मुहूर्त भी तय हो गया। मैं खुश थी, और मेरे पढ़ने –लिखने से भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था। बी ए के एग्जाम हो चुके थे। पति काम पर चले जाते और मैं घर में रहती थी। मेरी सास को मुझसे औलाद की बहुत जल्दी थी और मुझे ये ठीक नहीं लगता था। मेरे पति ने कई बार कोशिश की लेकिन मैं माँ नहीं बन सकी। मेरी सास मुझे लेकर डॉक्टर के पास गईं और जांच हुई तो सब ठीक आया। मैंने अपने पति के चेकअप के लिए कहा तो जैसे कोई पाप कर दिया था। उस रोज से मेरे ऊपर अत्याचार होने शुरू हो गए। मामला बड़े खानदान का जो ठहरा। “
“तो तुम्हें अपने परिवार को बताना चाहिए था।“ मोहन बाबू ने कहा।
“कहा न ….औरत ही औरत की दुश्मन होती है। माँ को डर था कि अगर मैं वापिस आई तो छोटी बहिन का रिश्ता कैसे होगा और मैं अब इस घर की बंदी बना ली गई थी । मेरे ऊपर हर तरह की पाबंदी थी। घर से फोन कटवा दिया गया था। मुझे बहुत बाद में पता चला कि मेरी जेठानी को भी बच्चा नहीं हो सकता है। सारी उम्मीदें मुझसे थीं मेरी सास को।“
“फिर क्या हुआ ?” मोहन बाबू ने पूछा।
“हा हा हा ….फिर क्या होना था। वही हुआ जो खानदान की नाक के नाम पर होता है। मेरे बहुत जिद करने पर जब पति का टेस्ट हुआ तो मेरे पति में कमी पाई गई। मैं बुरी तरह टूट चुकी थी। मेरे अपनों ने मेरा साथ नहीं दिया। मेरे पिताजी जबकि मेरे पक्ष में थे मगर उन्हें भी मेरे ससुर ने अपनी दबंगता के घेरे में ले लिया था। बाद में मेरे ससुर चुनाव लड़े और जीत भी गए , तब तो मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जिसकी कोई औरत उम्मीद नहीं कर सकती।“
“क्या हुआ कंचना जी?” मोहन बाबू ने बहुत ही भावुक होते हुए पूछा।
“उस रोज मेरी जेठानी, मेरे ससुर साहब की एक सभा में गई हुई थी, और मेरे पति विदेश गए हुए थे। उन्हें एमबीए करने के लिए आस्ट्रेलिया भेज दिया गया था। और उनके ईलाज के लिए भी। उस रोज घर में मेरी सास और मैं ही थे। मैं अपने कमरे में लेटी हुई थी। उन दिनों भी मैंने एम ए की पढ़ाई जारी रखी हुई थी। मैं पढ़ने में ही व्यस्त थी और कब किताब मेरे सीने से हटी मुझे पता नहीं चला। हुआ यूं था कि मेरी पढ़ते हुए आँख लग गई थी। कब दरवाजा बंद हुआ मुझे ये मालूम न चला । किताब हटाने के बाद जो हुआ वह कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मेरे शालीन खानदान के बड़े बेटे और मेरे जेठ मुझे दबोचे हुए थे। मैं चीखी। मगर घर में किसी ने मेरी आवाज नहीं सुनी। जानवर के जाने के बाद जब दरवाजा खुला तो सामने मेरी सास खड़ी थी।“
“तो क्या तुम्हारी सास भी शामिल थी इसमें ?” मोहन बाबू ने सवाल किया ।
“हाँ, उनका ही तो रचा हुआ खेल था सब। उसने मेरे पैर पकड़ लिए और मुझसे इस बच्चे को जन्म देने के लिए कहा। हमारे बीच ये समझौता हो गया था कि इसके बाद कोई भी मेरे शरीर को हाथ नहीं लगाएगा। बस मुझे बच्चे को जन्म देना है और उसके बाद मैं चाहूँ तो आज़ाद हो सकती हूँ। इसके बाद मैं घर में पड़ी आँसू बहाती रही। फिर मैंने अपने मन को कठोर कर लिया और उस बच्चे को जन्म देने के बाद मैंने उसकी शक्ल तक नहीं देखी। मेरे पिताजी के एक फौजी दोस्त थे। मैं उनपर भरोसा करती थी, जो कि अब हमारा शर छोड़ गए थे । मैं सीधे वहाँ चली गई । मेरी सास ने मुझे बीस लाख रुपये दिये थे और वादा किया था कि मुझे कोई नहीं तलाशेगा। मेरे जाने के बाद ये खबर फैला दी गई कि मैं पढ़ाई करने विदेश गई हुई हूँ। मैंने अपना एम फिल और पी एच डी कंप्लीट किया और कुछ साल फौजी अंकल के घर ही रही। फिर मैं यहाँ नौकरी पर आ गई। मैंने अपने परिवार को फिर कभी संपर्क करने की कोशिश नहीं की । मुझे अब पता चल गया था कि रिश्तों की हकीकत क्या है। इसके बाद हर रिश्ते से मेरा विश्वास उठ गया। पर माँ तो हूँ , इसलिए अक्सर इन बच्चों को देखा करती हूँ।“ कंचना ने कहा।
“ओह! तुम पर वाकई बहुत जुल्म हुआ है , लेकिन एक बात बताओ कि सारा जीवन क्या इस तरह काट पाओगी ?” मोहन बाबू ने पूछा।
“हाँ, काटना ही होगा। मैंने बहिन , माँ, सास सब का कर्ज़ उतारा ….बस एक बाप कर्ज़ उतारना बाकी है। मैं जल्द ही कानूनी रूप से किशनपाल को गोद लेने वाली हूँ और साथ ही उसकी माँ को भी । पहला बच्चा होगा जो माँ को दहेज में लेकर आयेगा ….हा हा हा । मोहन बाबू ! आप बहुत अच्छे हैं , लेकिन मैं फूलों की चाहत में बहुत बुरी तरह बींधी गई हूँ ….प्लीज़ मुझे बाप का फर्ज़ निभाने दो ….मुझे फिर से माँ, पत्नी बनाने से डर लगता है।“ कंचना कहे जा रही थी और उसकी आँखों से ममता की तड़प भी बह रही थी । मोहन बाबू के कदम ठिठक गए थे।
“सुन रहे हैं न ?”
“हाँ, सुन रहा हूँ ….. एक बेटी मेरे लिए भी देख लेना । मैं कहाँ एक देवी को छूने चला था , मुझे माफ कर दीजिये कंचना जी।“
“हा हा हा ….ये देवी बना देना ही तो अत्याचार है औरत पर …मुझे कंचना ही रहने दो।“ कहकर कंचना हॉस्टल के लेडीज विंग की तरफ मुड़ गई थी।
मोहन बाबू बस उसे जाते हुए देख रहे थे ….लोहा हो गए थे, और कंचन में भला लोहे का क्या काम।
शब्द मसीहा
