कोई कहता मुस्लिम को ना छुओं, कोई कहता हिन्दू को ना देखो
✍️ (रोशनी जायसवाल)
बीमारी में बीमारी,
ये कैसी बीमारी आयी है,
कोरोनावायरस ने ये कैसी आग लगाई है,
कोई तरसे घर आने को,
कोई तरसे बाहर जाने को,
कोई तरसे मां के आंचल को,
कोई तरसे रोटी के एक नेवाले को,
समझ नहीं आता इस वायरस ने,
क्यो इतनी तबाही मचाई है,
किसी के पैरों में है छाले,
तो किसी के कदमों के नीचे है कांटे,
किसी का लहु सड़कों पर है गिरा पड़ा,
तो कोई पटरीयो पर सदा के लिए सो गया,
सबका जीवन है अस्त- व्यस्त,
तो कोई इसमें भी है खुद में मस्त,
सरकार कहती आत्मनिर्भर बनों,
तो क्या चीनी समान आम जनता लाती,
इस वायरस ने कर दिया प्रकृति को साफ,
पर हिला दिया पूरे विश्व का आसमान,
समझ नहीं आता ये वायरस,
और कितनी लाशे गिरायेगा,
ये अब थमेगा या पूरी दुनिया को साथ ले जायेगा,
कोई कहता मुस्लिम को ना छुओं,
कोई कहता हिन्दू को ना देखो,
पर जब मरोगे तो इन्सान ही गिने जाओगे,
ना जाने ये वायरस और
कितना खूनी खेल रचायेगा।
रचनाकार रोशनी जायसवाल सिविल लाइन भुजौती मऊ की रहने वाली हैं।

