कुढ़ता बचपन…
विगत कई वर्षों से सरकार और समाज सेवी संस्थाओं द्वारा बाल श्रम के विरुद्ध अनेक कार्यक्रम और अभियान चलाती आ रही हैं, लेकिन किसी का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे को अपनी खुशी से काम पर नहीं भेजते हैं जो कि उनके खाने- खेलने और पढ़ने की उम्र होती है । अनेकों बच्चे ऐसे हैं जो मजबुरी में अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए छोटे दुकानों और घरों में काम करते हैं। यदि इन बच्चों का काम इनसे छोडवा दिया जाय तो उनका या उनके परिवार का क्या होगा इसका भी विचार आज तक शायद किसी ने नहीं किया है । आखिर ये बच्चे परिस्थितियों के अधिन हो कर दुसरों के घरों और दुकानों में नौकर का काम करते हैं और “अपने हम उम्र के बच्चों को खेलते पढते देखते हैं तो दिल ही दिल में कुढते हैं ।
“दशहरा, दीपावली, ईद जैसे पर्वों पर जिस वक्त हम घर की सफाई, नये कपड़े और आतिशबाजी आदि द्वारा अपनी अपनी खुशी का प्रदर्शन करते हैं, ये मजबुर और जरुरतमंद बच्चे बद्बुदार कुडे के ढेर में अपनी दो वक्त की रोटी तलासते हैं ।”
जब सुविधा सम्पन्न लोग अपना पैसा सजावट और आतिशबाजी में पानी की तरह बहाते हैं वहीं यह बच्चे ये सब देख कर अन्दर ही अन्दर कुढते हैं, आखिर इनकी भी अनिवार्य आवश्यकतायें हैं कुछ बाल इच्छाएँ हैं इस बिन्दु पर कोई शायद गम्भीरता से विचार नहीं कर रहा है । बड़े होकर इन्हीं कुण्ठाग्रस्त बच्चों में से अधिकांश चोरी, आतंकवाद जैसे गलत कार्यों में तरफ बढते हैं । वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए बाल श्रम रोकने के प्रावधानों को कठोर करने से पूर्व आवश्यकता है इन बच्चों के शिक्षा, जीविकोपार्जन और जीवन स्तर सुधार कर समाज की मुख्य धारा में लाने की । इसके लिए सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ आम जन मानस को जागृत होने की । यह सही है कि हमारे समाज में अमीरी और गरीबी आदि काल से चली आ रही और सम्पूर्णता किसी को नहीं मिलती है।
“किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता”
लेकिन अब जरुरत आन पड़ी है इस अमीरी गरीबी की बढती दुरी को पाटने की। यह शायद असम्भव हो लेकिन अत्यन्त कम अवश्य किया जा सकता है बस आवश्यकता है हम सुविधा सम्पन्न लोगों को अपने आस पास के जरुरतमंद और समाज की मुख्य धारा से दुर बालकों को अपनाने की उनके लिए कुछ सोचने और करने की।

