अखिलानन्द यादव की कविता : नेतागीरी या कुछ और…
अब ना पूजईहे त्रिपुरारी
भईल सब राजनीति के पुजारी।
खोजें सब बंगला सरकारी
घूमल चाहे लेके एसी गाड़ी।।
साधु सन्यासी, चाहे बाल ब्रह्मचारी ।
चोर बेईमान, चाहे होखे व्यभिचारी ।।
खोजे सब टिकट के बारी
सब राजनीति के पुजारी…
नेता जी के चर्चा, होई हर हाल में।
चाहे परिवार होंखे, कवनो बुरा हाल में।।
चाहे रोवे बाप महतारी
सब राजनीति के पुजारी..
ईश्वर के जगहा, पुजाले सब नेता ।
खुद के बतावे, हई भारत मां के बेटा।।
खिंचे सब अबला के साड़ी
सब राजनीति के पुजारी…
“आनंद” चाहे बस, बईठल कोठारी में।
भले सब भीख मांगे, घुम के बाजारी में।।
“अखिल” रहे बनके अनाड़ी
भईल सब राजनीति के पुजारी,
काहे के पूजईहे गंगा धारी।
अब ना पुजईहै कवनो नारी।।


