खास-मेहमान

शब्द मसीहा की कहानी : तवे पर

मुरलीधर आज बहुत परेशान-सा दिख रहा था . चाय पीते हुए भी कहीं खोया हुआ था जैसे, नहीं तो वो मुझसे ब्रेड पकौड़ा जरुर माँगता था . आदत में शुमार था उसकी मुझसे मांगकर खाना .

“अरे! मुरली क्या हुआ ? कहाँ खोया हुआ है ?” मैंने आधा पकौड़ा उसकी तरफ़ बढाते हुए पूछा .

“यार! क्या बताऊँ तुझे . घरवाली ने जीना हराम कर रखा है . पर बात उसकी भी सच है , मैं बहिन के लिए करता तो हूँ . उसके घरवाले की जॉब छूट गई है और अगर मैं मदद नहीं करूँगा तो कौन करेगा भला . मैंने अपनी छोटी बहिन को अपनी बहिन और बेटी दोनों ही समझा है मगर ये औरत ….” मुरली गर्दन नीचे किये हुए बोल गया .

“बस यार , मैं सब समझ गया . ये तो घर -घर की कहानी है . बीबियों को लगता है कि हम सिर्फ़ उनके हैं . मानता हूँ वो घर छोड़कर आतीं हैं . मगर हम भी तो अपने सम्बन्ध नहीं छोड़ सकते .”

“यार ! आज खाना भी नहीं मिला . बहुत गुस्से में है . अगर इस तरह की बात करता हूँ उससे तो वो और नाराज हो जाती है . कुछ समझ नहीं आता मुझे .”

“हम्म …एक गेम खेलेगा ?”

“हाँ, बोल यार , करना क्या है ? बोलती तो यूँ भी बंद है अपनी .” मुरली बोला .

“कुछ खास नहीं . शान्ति यज्ञ में थोड़ी सी आहुति देनी है . पहला काम ये कि उसकी बहिन को कोई गिफ्ट भेज दे और दूसरी बात ये कि आज शाम को घर जाकर रसोई पकड़ ले . बर्तन साफ़ कर , सब्जी बना , रोटी बना सबके लिए .”

“अरे! इससे क्या होगा ?”

“मैजिक …..हा हा हा .”

शाम को हम घर चले गए . अभी खाना खाने बैठा ही था कि मोबाइल बजने लगा . मैं खाना खाते हुए फ़ोन नहीं उठाता हूँ . फ़ोन बजकर बंद हुआ . दूसरी गर्म चपाती जैसे ही प्लेट में आई फ़ोन फिर बजा .

“अरे! देख भी लो अपना फ़ोन , क्या पता कोई जरुरी बात हो .” पत्नी बोली .

“कौन है ?”

“पकौड़ा फ्रेंड है …मुरली भाई साहब …हा हा हा .” पत्नी ने हँसते हुए जवाब दिया .

“अरे! जानता हूँ उसे , कोई प्रोब्लम होगी . नहीं तो कौन याद करता है ?” मैंने भी हँसते हुए कहा .

“अगली रोटी तभी मिलेगी जब आप बात कर लोगे . अब मैं गोभी का परांठा बना रही हूँ . हल्की आग पर सेंकूंगी फिर मक्खन से खा लेना . तब तक बात कर लो न .” पत्नी ने कहा . उसकी बात में दम था . मैंने फ़ोन उठा लिया .

“हाँ, बाँसुरी बोल अपने बेसुरे बोल.” मैंने भी मजाक में कहा .

“अबे! बात बन गई .” वह चहकते हुए बोला .

“साले मुझे खाना नहीं खाने दिया और तेरी बात बन गई . बता क्या हुआ ?” मैंने पूछा .

“मैंने छोटी के लिए साड़ी खरीदी, उसे दी और कहा कि मैं आज बहुत खुश हूँ . ओवर टाइम से कुछ पैसे मिले तो दो साडियां खरीद लीं . एक तुम्हारे लिए …”

“और दूसरी दीदी के लिए …हा हा हा ”

“अबे! तुझे कैसे पता चला ?”

“यही तो . अब आगे बता कितने बर्तन धोए ?” मैंने पूछा .

“अरे! यार नौबत नहीं आई . मैंने साड़ी सोफे पर रखी और मैं रसोई में जाकर सब्जी काटने को लेकर खड़ा हुआ . सूखे बर्तनों पर पानी चलाया ही था कि वो आ गई और बोली कि हटो यहाँ से . भूख लगी होगी . सॉरी ….हमें मदद करनी ही चाहिए . आप भी बेकार ही साड़ी ले आए . इसके पैसे दीदी के काम आते. मुझे क्या पता था कि तुम इतने बुरे नहीं हो . बैठो , मैं खाना बनाती हूँ . अब परांठे बना रही है और वो भी गोभी के .”

“हा हा हा …साले ! तो अपना परांठा खा न …मेरा परांठा क्यों ठंडा करवा रहा है अपनी बोरिंग कहानी सुना के . ये सब साली को दी साड़ी का कमाल है .”

“यार ! बहुत पकौड़े खाए हैं मैंने तेरे . कल के लिए लंच मत लाना . मैं लेकर आऊँगा .” मुरली बोला .

“न भाई , रहने दे . कहीं बीबी ने सोच लिया कि कोई लडकी ला रही है तो ??…हा हा हा .” और मैंने फ़ोन काट दिया .

“लो , खा लो जीभर के अगर इस बाँसुरी से जी भर गया हो तो . मुझसे क्या छिपाते हो …नाम मुरली और उसकी आवाज बांसुरी ! याद रखना , मेरे मरने तक किसी से चोंच लड़ाने की हिम्मत भी मत करना वरना…… परांठे गर्म नहीं ….”

“समझ गया …मैं ही तवे पर मिलूंगा …हा हा हा .” अब उनके चेहरे पर भी हँसी छा गई थी .

शब्द मसीहा

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