रचनाकार

समकालीन लघुकथा के प्रति सजग लेखिका हैं डॉ अलका वर्मा : सिद्धेश्वर

पटना। लघुकथा आज सर्वाधिक चर्चित विधा हो गई है और जो विधा अधिक चर्चित हो जाती है, उसमें रचनाकारों की भीड़ भी लगने लगती है। भीड़ लगना कोई गलत काम नहीं है। यह लघुकथा या किसी भी विधा के हित में है । क्योंकि इस भीड़ में ही कई सार्थक रचनाकार हमारे सामने उपस्थित होते हैं । इसी भीड़ में से निकली हुई एक लघुकथा लेखिका है डॉ अलका वर्मा, जिनकी लघुकथाओं की एक खासियत यह है कि अधिकांश लघुकथाएं छोटे आकार की है इसलिए वह अधिक प्रभावकारी है, अधिक पठनीय भी है । डॉ अलका वर्मा ने जितनी भी लघुकथाएं लिखी है, उनमें विचारों की ताजगी है, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार भी है । साथ ही साथ एक नई दृष्टि भी । उनकी लघुकथाओं में भी कथा बीज जीवंत रूप से उभर कर सामने आई है ।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में, गूगल मीट के माध्यम से फेसबुक के अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर, हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन का संचालन करते हुए संयोजक सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उदगार व्यक्त किया । उन्होंने डॉ अलका वर्मा की लघुकथा कृति ” कही अनकही” में प्रकाशित लघुकथाओं पर लिखी गई अपनी डायरी प्रस्तुत करते हुए कहा कि – डॉ अलका वर्मा ने अपनी लघुकथा कृति “कही अनकही ” के माध्यम से व्यक्ति समाज और परिवार की कई ” कही अनकही ” प्रसंगों को अपनी लघुकथाओं में समेटा है, जो लघुकथा के प्रति उनकी जीवंतता का परिचय देता है।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवयित्री और लेखिका डॉ अलका वर्मा ने कहा कि- -लघुकथा की एक अपनी खासियत है कम शब्दों में मारक प्रभाव डालना।
लघुकथा का लघु कहानी से अलग अस्तित्व है। लघुकथा दो या तीन पंक्तियों की भी प्रभावशाली हो सकती है, अगर हम कह सके तो।कम शब्दों में कहने की कला हमें आती है तो हम सही में लघुकथाकार है। समाज के समस्याओ को दर्शाना भी हमारा दायित्व है। अंधविश्वास, कुरीतियों को भी लघुकथा के माध्यम से उजागर करना ही सफल लघुकथाकारों की सफलता का परिचायक है ।
उन्होंने हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन की सार्थकता को रेखांकित करते हुए कहा कि – साहित्यकार और चित्रकार सिद्धेश्वर जी के नेतृत्व भारतीय युवा साहित्यकार परिषद् ने पिछले चार दशकों से नवोदित,युवा एवं प्रतिष्ठित लघुकथाकारों को जोड़ने व विधा की सर्जनात्मकता को अभिनव आयाम देने में सकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया है, जो अभिनंदनीय व प्रशंसनीय है।”
अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी देते हुए वरिष्ठ कवि और लेखक डॉ निर्मल कुमार दे ने कहा कि- आज हैलो लघुकथा मंच पे लघुकथा सम्मेलन का आयोजन हुआ है। इस मंच के सर्वेसर्वा श्री सिद्धेश्वर जी ने मुझे अध्यक्षता की जिम्मेदारी सौंपी। वैसे ऑनलाइन लघुकथा पाठ की शुरुआत करने का श्रेय सिद्धेश्वर जी को जाता है और लघुकथा के विकास के लिए ऐसा प्रयास जरूरी भी है l आजकल अधिक लंबी लघुकथाएं लिखी जा रही है जो लघु कहानी तो हो सकती लघुकथा नहीं।
उन्होंने पठित लघुकथाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी देते हुए कहा कि सभी रचनाएं बहुत अच्छी थी और वाचन भी स्पष्ट और लालित्य पूर्ण। आज के सम्मेलन मेंनिर्मल कुमार दे ने और डॉ अलका वर्मा ने अपने कुछ लघुकथाओं का पाठ किया, जिसे काफी लोगों ने सराहा ।
प्रदीप कुमार ने रंग / रजनी श्रीवास्तव अनंता ने साझा सपने / इंदू उपाध्याय ने रेवड़ी/ सपना चंद्रा ने आत्मा की मुक्ति / सिद्धेश्वर ने अपना अपना हिस्सा / अंकेश कुमार ने अपेक्षाएं / रश्मि लहर ने बिटिया / सुधा पांडेय ने जज्बात / राज प्रिया रानी ने उगलती गर्मी /अंजू निगम ने वैशाखी / नलिनी श्रीवास्तव ने सलाखें / रत्ना मणिक ने परिभाषा प्यार की शीर्षक लघुकथा का पाठ किया l सारी लघुकथाएं एक से बढ़कर एक,सारगर्भित और प्रासंगिक । अंजू निगम,दिल्ली, सुधा पांडेय,पटना, रजनी श्रीवास्तव पटना, सपना चन्द्रा कहलगांव, अंकेश कुमार पटना, डॉ प्रदीप शर्मा, नोएडा,नलिनी श्रीवास्तव,अयोध्या, रश्मि लहर लखनऊ, इंदू उपाध्याय तथा रत्ना मानिक जमशेदपुर ने अपनी अपनी लघुकथा का पाठ किया। सभी की रचनाएँ सुनकर मुझे लगता है कि लघुकथा लेखन के प्रति लेखकों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है और अपनी लेखन प्रतिभा के सुधार और निखार हेतु ईमानदारी पूर्वक प्रयास कर रहे हैं। फेसबुक पर भी कार्यक्रम का लाइव चल रहा था,दर्शकों,पाठकों तथा रचनाकारों की सहभागिता तथा उनकी टिप्पणियों के लिए मैं आभार व्यक्त करता हूँ । मित्रवर सिद्धेश्वर के साहित्य प्रेम सचमुच वंदनीय है ।
इन रचनाकारों के अतिरिक्त मीना कुमारी परिहार , डॉ शरद नारायण खरे, कृष्ण नंदन,योगराज प्रभाकर, दुर्गेश मोहन , सेवासदन प्रसाद/ पद्मजा शर्मा/ रिमझिम /उपमा आर्य / अनीता मिश्रा /इरा जौहरी / ज्योति शर्मा / सुनीता सिंह आदि की भी भागीदारी रही । ऑनलाइन लघुकथा सम्मेलन का समापन संस्था की उपाध्यक्ष राज प्रिया रानी के धन्यवाद ज्ञापन किया ।

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