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२१वीं सदी में भारत का भविष्य : विकास या विनाश ?

आज जो हम करते हैं, वही कल होगा। वर्तमान की नींव पर भविष्य खड़ा होता है। हर आने वाले कल में वर्तमान के द्वार से ही प्रवेश करते हैं। इसलिए कल के लिए वर्तमान का महत्व या भूमिका बहुत बड़ी होती है। यही बात हमारे देश भारत के लिए भी लागू होती है कि आज जो भारत है, वह कल का भारत होगा। आज का भारत कल का भारत है ।
निश्चित ही नई सदी में बहुत सारी चीजें काफी चमकदार दिख रहीं है। बीस साल या पचास साल पहले के मुकाबले भारत काफी आगे दिखाई दे रहा है। कई तरह की क्रांतियां हो रही है। कम्प्यूटर क्रांति चल रही है। मोबाईल क्रांति भी हो गई है- अब गरीब आदमी की जेब में भी एक मोबाईल मिलता है। आटोमोबाईल क्रांति चल रही है। एक जमाना था जब स्कूटर के लिए नंबर लगाना पड़ता था, वह ब्लेक में मिलता था। कारों के बस दो ही मॉडल थे – एम्बेसेडर और फिएट। अब किसी भी शोरुम में जाइए, मनपसंद
मॉडल की मोटरसाईकल या कार उठा लाइए। नित नए मॉडल बाजार में आ रहे है। सड़कों पर कारें ही कारें दिखाई देती हैं।  सड़कें फोरलेन-सिक्सलेन बन रही है। हाईवे, एक्सप्रेसवे की चिकनी सड़कों पर गाड़ियां हवा से बात करती हैं। ‘फोरलेन‘ शब्द तो बच्चे-बच्चेे की जुबान पर चढ़ गया है। इसी तरह शिक्षा में भी क्रांति आ गई है। पहले इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. कालेज गिनती के हुआ करते थे। आज एक-एक शहर में दस-दस कॉलेज है और उनमें सीटें खाली रहती है। पहलें चुनिंदा कान्वेंट स्कूल हुआ करते थे,  अब इंग्लिश मिडियम स्कूल गली-गली, मोहल्ले में खुल गए है।
यह चमक-दमक कुछ खोखली मालूम होती है। इस चकाचैंध के पीछे कुछ अंधेरा सामने नजर आ रहा है

इंसान चाँद पर तो पहुँच गया पर भाई के घर तक नहीं पहुँच सका। हम अन्तरिक्ष में उड़ना सीख गए , समुद्र में तैरना सीख गए मगर जमीन पर रहना भूल गए। हमने इमारतें बड़ी बना लीं पर दिल छोटा कर लिया। हमने रास्ते चौड़े कर लिए पर देखने का नजरिया छोटा कर लिया, हमने साधन कई गुना बढ़ा लिए पर अपना मूल्य कम कर लिया, हमने ज्यादा बोलना सीख लिया पर प्रिय बोलना छोड़ दिया।
प्रगति का अर्थ कमजोर को रौंद कर स्वयं आगे बढ़ना कदापि नहीं । समाज में हर एक व्यक्ति को हक़ है, समुचित अवसर पाने का, स्वयं के पुरुषार्थ को सम्पूर्णता से जीने का। विश्व की व्यवस्था में, भारत एक नयी राह- ‘तीसरा रास्ता’ – बनाने में सक्षम है; जहां आर्थिक-समृद्धि पाने के लिए सदियों से चली आ रही भारतीय सभ्यता का मूलमंत्र ‘विविधता में एकता’ खोये नहीं, बल्कि एक स्व-प्रेरित अनिवार्यता बने l आवश्यकता है ऐसे नव-निर्माण की, जहां “शहर बसे गाँवों की गोद में, जैसे पृथ्वी बसी है प्राण-दायक वायुमंडल में”।
इक्कीसवीं सदी का भारत, विश्व को एक नयी दिशा देने के लिए उद्यत हो रहा – जिससे समस्त मानव-समाज को जीने का एक नया पैगाम मिल सके । जहां जीवन में आर्थिक-समृद्धि के साथ-साथ वह सब भी मिल सके जो पैसे से कभी ख़रीदा ही नहीं जा सकता । क्या सभ्य और स्वतंत्र समाज के लिए यह जरुरी नहीं कि उसमें एक सहज अपनापन हो, जहां अजनबी इंसान से भय नहीं लगता हो l जहां हर बचपन को खिलने का अवसर मिल सके । जहां खेत-खलिहान, नदियाँ तथा जंगल इतने भी दूर न हो कि केवल टीवी पर दूर से ही दर्शन हो सके । जहां पड़ोस भी परिवार सा लगे । जहां हर जीव में कुछ नया कर दिखाने की तड़प पैदा हो । कुल मिलाकर, जहां अर्थ के साथ ही सभी प्रकार के अन्य सुख हर व्यक्ति को स्वयं के पुरुषार्थ से प्राप्त हो सके, ऐसी व्यवस्था हो ।
हम जब एक भवन का निर्माण करते हैं, उसकी डिज़ाइन बड़ी महत्वपूर्ण होती है । अन्यथा कितना भी धन खर्च करने के बाद पछ्ताना पड़ सकता है । पिछले ६० वर्षों से हम एक ही गल्ती लगातार करते आ रहे हैं । सारी समृद्धि और आकर्षण शहरों में केन्द्रित करते आ रहे हैं ।  इस हद तक कि, भारत के किसी भी कोने में रहने वाला हर व्यक्ति यह धारणा बना चुका है कि बिना बड़े शहर गए उसकी प्रगति संभव ही नहीं । दुर्भाग्य से इसका यह अर्थ भी होने लगा कि गाँव याने पिछड़े लोगों के रहने की जगह । कितनी विडंबना है कि जो किसान जीने की  सबसे बहुमूल्य चीज़ का उत्पादन करता है, वह भी बिना किसीसे तनख्वाह लिए; स्वयं के पुरुषार्थ से- उसकी गिनती उसके स्वयं के बच्चे पिछड़ों में करने लगे हैं और मौका पाते ही शहर का रूख करने के लिए बाध्य हो गए हैं, क्योंकि शहर जाने से ही उनकी अच्छी कमाई हो सकती है, भले ही उसे गन्दी नाली पर बने कच्चे घर में रहना पड़े, जिसे हम स्लम कहते हैं । ऐसी उल्टी अर्थ-व्यवस्था का हमने ही निर्माण किया हुआ है और इसे गल्ती समझने के बजाय अपनी श्रेष्ठता समझे बैठे हैं । शहर याने उन्नति, और गाँव याने पिछड़ापन। इस मूर्खतापूर्ण मानसिकता के बने रहने का मूल कारण है हमारी अर्थ-व्यवस्था की गलत डिज़ाइन (यानी गलत नीतियां)– जिसने धन और ज्ञान दोनों को शहरों में इस कदर केन्द्रित कर दिया है कि हम सट्टेबाज़ी और बेईमानी से धन पाने को भी पुरुषार्थ कहने में लग गए  हैं ।  हमारा ज्ञान बजाय नए अविष्कारों की खोज में (जिससे जीवन और प्रकृति का तारतम्य सुगम हो), अधिक से अधिक धन हड़पने की तिकड़में लगाने में लगा है, जो गांवों में बसे सीधे-सादे किसानों की कल्पना से कोसों दूर है l यही कारण है कि जो भारत में सच्चा पुरुषार्थ करते हैं जैसे कि किसान, वो समान्यतः गरीब ही बने रहते हैं l
उन्नति के अवसर बड़े बड़े महानगरों में केंद्रित जैसे मुंबई, दिल्ली इत्यादि।
शहर दिन-ब-दिन नर्क बनते जा रहे हैं- छोटे-छोटे पिंजरों में सिमटा जीवन । सम्पूर्णता में देखें तो – राष्ट्रीय संपत्ति का क्रिमिनल दुरुपयोग सिर्फ शहर में रहने वाले व स्थानान्तरण करने वालों को महज रोजी-रोटी देने में ।
गाँव उजाड़ व वंचित …
हर प्रकार के उन्नति के अवसरों से । न तो अच्छे स्कूल, न अच्छे कॉलेज या ना इंस्टीट्यूट, न ही अच्छे अस्पताल, न सही प्रकार की टेक्नोलॉजी, न पूरी बिजली, न अच्छे रोज़गार, न अच्छी आमदनी इत्यादि । गाँवों की क्षमता का पूर्णतया अनुपयोग । एक-तरफा स्थानान्तरण शहरों की ओर निरंतर जारी । बारी-बारी से हम हर अच्छे शहर को बर्बाद ही करते जा रहे हैं, अपनी ही गल्तियों के चलते । जबकि हम कितने ही गाँवों में एक नए अर्थ उत्पादन की प्रक्रिया स्थापित कर सकते थे ।
हम क्यों लगातार एक गलत ग्रोथ-मॉडल को लेकर ही चल रहे हैं ?
क्या ही अच्छा हो कि नयी नीतियां ऐसी बने कि अर्थ-व्यवस्था का सही ढंग से विकेंद्रीकरण हो सके । हम क्यों न शहरों और गाँवों में एक नया तालमेल बिठाएं । हमें शहर भी चाहिए, और गाँव भी । शहर की आवश्यकता इसलिए है की बड़ी संख्या में विविध ज्ञान के लोगों के संगम से ही नए-नए ज्ञान का उदय होता है, और गाँव इसलिए जरूरी हैं कि छोटे-समुदाय में ही आत्मीयता व सामाजिकता के मूल्य विकसित होते हैं । शहर व्यक्ति को विविध प्रकार के कार्यों के अवसर दे सकता है, तो गाँव उसे स्वस्थ और प्राकृतिक वातावरण । एक ही व्यक्ति जीवन के विभिन्न पड़ावों में दोनों प्रकार के अवसरों को जी सके, ऐसी व्यवस्था आज इंटरनेट के युग में संभव है l एक किसान खेती के अलावा लघु-उद्यम भी कर सकता है, वैसे ही एक पढ़ा-लिखा वैज्ञानिक खेती और ऐसा होना सम्भव भी लगता है । शहर और गाँव की ताकतों का संगम रोज़मर्रा के जीवन में सहजता से कैसे उतारा जाये, यह हमारे लिए एक चुनौती है या कहें कि २१वीं सदी में ‘मानवीय व्यवस्था’ की नयी डिज़ाइन का प्रारंभ – जहां गाँव व शहर दो शब्द न रहकर एक नए जुड़न की परिभाषा बन सके । जो भारत को रुरल व अर्बन की भ्रमित परिभाषाओं से बाहर निकाल सके ।
कैसे बन सकती है, ऐसी नयी डिज़ाइन ?
गाँव की आत्मीयता व परंपराए शहरों में संस्कृति के पनपने में ऑक्सीज़न का काम करें । जहां एक ओर गाँव की खेती भी रहे, वहीं नयी पीढ़ी उद्यमी भी बनें । इतना ही नहीं, पंचायत की भागीदारी से बंजर-भूमि का उपयोग बड़े उद्योगों को लगाने की व्यवस्था के लिए तथा अन्य प्रयोगों के लिए निश्चित हो सके, ताकि जमीन-अधिग्रहण को लेकर समाज के विभिन्न घटकों के बीच कोई विवाद कभी भी न हो । हर आर्थिक उत्पाद का कार्य, चाहे खेती हो या उद्योग, चाहे छोटा हो या बड़ा, एक दुसरे के पूरक बन सकें, न कि विरोधी । विषय जमीन की कमी का नहीं, योजनाबद्ध तरीके से जमीन के समुचित उपयोग के निर्धारण का है ।
इंटरनेट के अविष्कार के साथ ही पूरी दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है । आज हर व्यक्ति एक मोबाईल फोन के जरिये सारे देश ही नहीं, विदेशों से भी जुड़ चुका है । यह एक मूलभूत परिवर्तन है, जो विज्ञान का वरदान बन कर हम सबको समान रूप से प्राप्त हुआ है लेकिन इसका दुरुपयोग बहुत बडा अभिशाप बनता जा रहा है । अब मनुष्य की भौगोलिक स्थिति उसकी उन्नति में कोई बड़ी रुकावट नहीं रही l गाँव में बसे व्यक्ति को विदेशों से भी व्यापार करने से अब कोई रोक नहीं सकता है । जो जितनी क्षमता और ज्ञान अर्जित करेगा, वह अपनी प्रगति कहीं भी रहकर कर सकता है । इस हिसाब से देखें, तो सरकार नयी नीतियों के जरिये पढ़ी-लिखी नयी-पीढ़ी को भी गाँव में विशेष रूप से आकर्षित कर सकती है । फिर चाहे चिकित्सक हो या अध्यापक, सोफ्टवेयर सीखे IT-विशेषज्ञ हो, या कि फुड-प्रोसेसिंग करने के इच्छुक उद्यमी ।

संक्षिप्त में कहें तो हमारे पास विचार तो बहुत आ गए पर आचार (आचरण) चला गया। २१वीं सदी में प्रगति के साथ हमारी दुर्गति भी हुई है। हम धरती के लोग हैं, हमारा स्वर्ग यहीं है और जीते जी है, मात्र आवश्यकता है आधुनिकता, वैज्ञानिकता, विकास के साथ साथ अपनी‌ सभ्यता, संस्कृति और संस्कार बचाये रखने की।

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