शब्द मसीहा की कहानी : आशीर्वाद की छतरी
एक घंटे की बारिश में सड़क जैसे तालाब बन चुकी थी । भोलाराम अपने रिक्शे को किसी तरह एक तरफ लिए खड़ा था । तभी उसने देखा कि एक वृद्ध महिला केमिस्ट की दुकान से निकल पानी के बीच गुजरने का प्रयास कर रही है । वह तेजी से उधर अपने रिक्शे को दो फुट से ज्यादा पानी की धार को चीरते आगे बढ़ा और उनके पास पहुंचा ।
“माँ जी ! पानी का धार बहुत तेज है । आप बैठ जाइए, हम आपको घर छोड़ देते हैं । ” भोलाराम बोला ।
“कितने पैसे लोगे ? मुझे शिवपुरी कालोनी जाना है पार्क के पास ।” महिला ने पूछा ।
“जो भी आप देंगी मैं ले लूँगा । आप बैठ जाओ ।” भोलाराम बोला ।
“अरे! भैया , लोग बाद में चिकचिक करते हैं । पहले ही बता दो मुझे । मैं ज्यादा पैसे नहीं दे पाऊँगी । मेरे वो बीमार हैं …नहीं तो इस बारिश में मैं नहीं आती । ” महिला बोली ।
“बोला न आपको … जो देना हो सो दे देना ।” भोलाराम ने कहा और कांधे से गमछा उतारकर सीट को पोंछकर सुखा दिया । वृद्ध महिला को सहारा देकर रिक्शे में बैठाया और गंतव्य की तरफ चल दिया । बारिश अब भी तेज हो रही थी । भोलाराम बारिश में भीग रहा था । धीरे-धीरे कर वह आगे बढ़ रहा था ।
“बस बेटा यहाँ रोक दो । यहीं जाना है मुझे । ” महिला ने कहा । भोलारम ने उनका हाथ पकड़ा और उन्हे उतारने में मदद की ।
“ये लो बेटा ।” महिला ने पर्स से बीस रुपये देते हुए कहा ।
“अजीब माँ हो , बेटा भी कहती हो और पैसे भी देती हो । कोई बेटा भी भला माँ से मजूरी लेता है ?” भोलाराम ने मुस्कुराते हुए कहा ।
“बेटा मत बनो ….इस रिश्ते से डर लगता है । इसकी सजा हम भुगत रहे हैं । दो-दो है मेरे …इसी घर में रहते हैं पर जरा परवाह नहीं ।” महिला बोली ।
“ठीक है , बेटा मत बनाओ …….पर एक आशीर्वाद का हाथ तो सिर पर रख दो ….हमार माई जैसी लागत हो ।” और वह उनके सामने झुक गया । बूढ़ा हाथ उसके सिर पर था । फिर वह देख नहीं पाया कि बारिश तेज थी या आँसू । उसने तेजी से रिक्शा मोड़ा और बारिश में आँसू बहाता धड़कते दिल से आशीर्वाद की छतरी में नहाता तेजी से निकल पड़ा ।

