सुनिल चौरे ‘उपमन्यु’ द्वारा जितेंद्र शिवहरे की कहानी ‘दौराहा’ की समीक्षा,
दौराहा…प्रेम और कर्तव्य का-कहानी
कहानीकार–जितेंन्द्र शिवहरे (इंदौर)
आधारित–प्रेम और कर्तव्य पर
समीक्षक- सुनिल चौरे ‘उपमन्यु’ (खंडवा)

जितेंन्द्र शिवहरे द्वारा लिखीत कहानी ‘दौराहा’ प्रेम और कर्तव्य पर आधारित है। अनिकेत, हेमा, कृष्णा और चित्रा आदि पात्रों के माध्यम से शानदार कथन हुए है।
अनिकेत का हेमा पर गुस्सा होना
कि पहले उन दोनों का विवाह हो, वहीं हेमा का कर्तव्य के प्रति जागरूकता बोध अनुठा एवं रोचक है। कर्तव्य को प्रथम दृष्ट्या रख आपदा में भी सेवा में लगी रही, जिससे हेमा का विवाह न हो सका। सेवा करते-करते स्वयं भी महामारी से ग्रसित हो गयी। जिसकी देखभाल कृष्णा पात्र ने बखूबी की और उसे स्वस्थ्य किया। कृष्णा का मन ही मन हेमा के प्रति प्रेम अथाह रहा।
कहानीकार ने यहां कृष्णा की भी
सेवा को महत्व देते हुए उसके प्यार को भी उभारा है। जो कहानीकार की लेखन क्षमता का प्रतिफल है।
चित्रा के माध्यम से कृष्णा के प्रेम
का हेमा को पता चलना, हेमा का कृष्णा के प्रति प्यार प्रस्फुटित होना, चित्रा का मन ही मन कृष्णा को चाहाना, बहुत सुंदर कथोपकथन हुआ है।
कहानी के अंत मे चित्रा, हेमा, कृष्णा की बातों को अनिकेत द्वारा सुनने से उसका हृदय परिवर्तन होना, अनिकेत द्वारा कृष्णा और हेमा की विचारधारा एक के आधार पर, दोनों का हाथ एक दूसरे के हाथ मे देना अनिकेत का बड़ा मन बताया है कहानीकार ने।
वहीं चित्रा भी अनिकेत की महानता के वशीभूत हो, उसको दिल देकर अनिकेत की हो जाती है।
कहानी में कहीं ठहराव नही आता, निरन्तर पढ़ने हेतु जिज्ञासा बनी रहती है।
कहानी में प्रमुख पात्रों का प्रेम, त्याग, तपस्या व कर्तव्यनिष्ठा को बखूबी बताने में कहानीकार जितेंन्द्र शिवहरे मेरे विचारानुसार सफल हुए है।
जितेंन्द्र शिवहरे जी को बहुत-बहुत बधाइयां व उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।
समीक्षक-:
सुनील चौरे उपमन्यु (खंडवा)

