खास-मेहमान

शब्द मसीहा की कहानी : आप बातों का खाते हैं

एक बाबा प्रवचन करने के लिए अपने लाव-ओ-लश्कर के साथ पहुंचे. कई सुरक्षाकर्मी थे हथियारों के साथ .

“प्रभु ने हम सबको बनाया है और वही हमारा रक्षक है . हम सबको अपने आपको उसके नाम पर छोड़ देना चाहिए . हम तो इस जीवन की नदी में सिर्फ़ एक नौका हैं और प्रभु का नाम ही पतवार है . इसलिए हमें उसकी रजा में राजी रहना चाहिए . उसकी मर्जी के बिना कुछ नहीं हो सकता .” प्रवचन चल रहा था .

बीच-बीच में भजन भी चल रहे थे . लोग पूरी तरह भाव विभोर थे . झूम रहे थे . बाद में वे शांति से बैठ गए . लोग उनके सामने से गुजरते रहे और दानपात्र में अपनी श्रद्धा भी उडेलते रहे . तभी एक युवक सामने आया .

“महाराज ! आप कहते हैं कि हम सब कुछ प्रभु के भरोसे छोड़ दें .”

“हाँ, जो कुछ करता है , वही करता है. उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता .”

युवक झुका और दानपात्र उठा लिया .

“अरे! रुको ….कहाँ ले जा रहे हो इसे ?”

“तुम कौन हो मुझे रोकने वाले ? ये तो प्रभु कि इच्छा है . अभि प्रभु ने मेरे अन्दर इच्छा पैदा की है मैं इसे ले जाकर मन पसन्द भोजन करूँ फाइव स्टार होटल में .”

अब बाबा जी विचलित हुए .

“ये तो संगत का है बेटा , इस पर संगत का हक है . ये तुम्हारा नहीं है .”

“मेरे और प्रभु के बीच संगत कहाँ से आ गई ? मेरे प्रभु की बात आपको कैसे पता चली ?”

अब बाबा जी ने आँखों को तरेरा और सुरक्षा कर्मी की तरफ़ देखा . सुरक्षाकर्मी आगे बढ़ा और युवक को पकड़ लिया .

“महाराज ! आप उसका नाम बेचना छोडिये जिस पर आपको खुद भरोसा नहीं है . आप बातों का खाते हैं और बन्दूक के साये में रहते हैं ….भगवान के नहीं.”

शब्द मसीहा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *