योगी जी! संभालिए अपनी पुलिस! नहीं तो वह संगठित अपराधी गिरोह बन जाएगी..
@ अरविंद सिंह
● गाजीपुर नगसर थानाध्यक्ष सहित तीन दोषी निलंबित, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट पवन प्रकाश की नोटिस के बाद कार्रवाई हुई तेज
● फौजी परिवार पर टूटा था पुलिसिया वज्रपात,अमानवीयता और बर्बरता की इंतहा.
● पुलिस की कार्य संस्कृति को लेकर एक शायर ने अपने विचार कुछ यूँ रखें हैं,-
"पैदा हुई पुलिस तो इबलीस ने ये कहाँ/
लो अब हम भी साहिबे-औलाद हो गयें."

जब यह शेर लिखा जा रहा है तो इसका हमारे समय में किसी घटना से सीधा ताल्लुक जरूर होगा. जी हाँ हम बात कर रहें हैं योगीराज की पुलिस की, जिसकी कार्य संस्कृति की एक झांकी पिछले 26 जुलाई को गाजीपुर में नगसर थाने के नुरपुर गाँव में देखने को मिला. जिस घटना और पुलिसिया सिस्टम को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि पुलिस आखिर कैसे काम करती है. आखिर पांच दशक पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश जस्टिस मुल्ला क्यों कहना पड़ा कि-
“पुलिस संगठित अपराधियों का एक गिरोह है.”
आज पांच दशक बाद जब देश के सबसे बड़े सूबे में मुख्यमंत्री योगीराज रामराज्य लाने की बात करते हैं तो सवाल और संशय यूँ ही उठने लगतें हैं कि क्या यह वास्तव में योगीराज की पुलिस है या ब्रितानी हुकूमत की पुलिस. कानून के राज में तो पुलिस को तो ऐसा होना ही नहीं था. फिर यह एक संगठित गिरोह की तरह कानून की ही चींख क्यों निकाल रही है.
सीधे मुद्दे पर आते हैं.अब्दुल हमीद, राही मासूम रज़ा और विवेकी राय की सरज़मीं याद है न!, जी हाँ वही गाजीपुर जिसे पूर्वांचल में सर्वाधिक फौजी पैदा करने का अभिमान है. जहाँ के अब्दुल हमीद ने भारत -पाक के युद्ध के समय पैटर्न टैंकों को तोड़कर युद्ध की दिशा बदल दी और भारत को जीत दिलाई. उसी गंगा-जमनी तहजीब की ज़मी गाजीपुर की एक विधानसभा जमानिया है. जहाँ नगसर थाने की अपनी सारी मर्यादाएं तोड़ अमानवीय हो जाती है और एक फौजी परिवार पर कहर बन कर ऐसे टूट पड़ती जैसे किसी आतंकवादी के साथ सलूक कर रही हो. सच यह है कि आतंकवादी को भी मानवाधिकार हासिल है.
लेकिन गाजीपुर की नगसर थाने की पुलिस मानवाधिकार की मर्यादाएं भूल अमानवीयता की सारी हदे भूल जाती है.उसने ऐसा किया, जिसे देखने के बाद आपके भीतर तक भय व्याप्त हो जाएगा कि क्या ऐसा भी पुलिसिया व्यवहार होता है?
शायद ब्रितानिया हुकूमत में भी खाकी वर्दी का ऐसा क्रूरतम कृत्य नहीं रहा होगा।
बीते 26 जुलाई को नुरपुर गाँव निवासी भूतपूर्व सैनिक अजय कुमार पांडे, वर्तमान सैनिक कमल कुमार पांडे, भूतपूर्व सैनिक सुशील कुमार पाण्डेय के थाने में कपड़े निकाल, खड़ा करा कर पीटा गया, बाद में लिटाकर लिटाकर पीटा गया, जिससे प्राइवेट पार्ट से लेकर शरीर के निचले हिस्से पर गंभीर चोटें आयीं. शरीर के कुछ हिस्से ऐसे भी जिनका घाव दिखाने लायक भी नहीं है। यही नहीं इनके घर बच्चों जो पढ़ाई करते हैं अविनाश, निर्भय, विशाल एवं व्यापारी दीपेश, किसानी करने वाले इंद्रजीत,भूपेंद्र सहित कुल 9 लोगों को नगसर थाने के थानाध्यक्ष रमेश कुमार सहित उनकी टीम ने पूरी रात पिटाई कर एक दर्जन गंभीर आरोप लगाते हुए उनकी चालान भेज दिया। हद तो यह की बर्बर पिटाई करते वक्त लगातार यह भी धमकी दिया कि विकास दुबे जैसी हालत कर दूंगा।
पीटते पीटते पहले चमड़ी लाल हुई फिर खून आना शुरू किया जब कराहते लोगों ने ‘राम-राम’ कहा तो थानाध्यक्ष ने कहा ‘जय भीम बोलो।’
क्याथामामला : –
गाजीपुर जनपद अंतर्गत थाना नगसर हाल्ट के ग्राम नूरपुर पोस्ट गोहदा बिशुनपुर में माया देवी पत्नी श्री शिवदयाल पांडे की त्रयोदशी 27 जुलाई को होनी थी।
26 जुलाई को घर के सदस्य दरवाजे के बाहर बैठकर ब्रह्मभोज की तैयारी की योजना बना रहे थे तभी शाम लगभग 6:30 बजे लगभग सादी वर्दी में कुछ लोग आए और घर में घुसने लगे। परिवार के सदस्यों ने मना किया तो उनके साथ उलझ गए मारपीट पर उतारू हो गए तब तक उनके पीछे खड़े पुलिसकर्मी भी आ गए. उन लोगों ने मारपीट किया और दो लोगों को थाने ले गए। परिवार के अन्य सदस्य भी थाने पहुंचे और पूछा कि हमारा कुसूर क्या है?
थानाध्यक्ष रमेश कुमार ने बताया कि तुम्हारे घर में राजन ऊर्फ झटका पांडे अपराधी छुपा था.तुम लोगों की वजह से हम लोग उसे पकड़ नहीं पाए, जबकि जिस झनकू पांडे की बात पुलिस कर रही थी, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उसके विरुद्ध नगसर सहित किसी थाने में कोई अपराध ही दर्ज नहीं था.
फिर क्या था कुल 9 लोगों को हवालात में डाल पूरी रात पिटाई किया गया। और तेरहवीं के दिन यानि 27 जुलाई को
इन लोगों की बर्बर पिटाई के बाद भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 147 148 332 333 353 323 504 506 188 269 270 के अतिरिक्त दंड विधि संशोधन अधिनियम 2013 की धारा 7 के तहत संज्ञेय अपराध दर्ज कर चलान भेज दिया गया।
मजिस्ट्रेट ने तेरहवीं और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए सभी को 20 हजार के स्वबंध पत्र पर अंतरिम जमानत दे दिया। 27 जुलाई को एक तरफ घर में तेरहवीं भोज का आयोजन चल रहा था दूसरी तरफ सभी लोग रात्रि के 9:00 बजे तक अपने घर पहुंचे।
मीडिया की #सुर्खियों में था #गाजीपुर के फौजियों का #पुलिसिया उत्पीड़न, #सुप्रीम कोर्ट के #अधिवक्ता #पवन #प्रकाश ने भेजा था #लीगल नोटिस :-
गाजीपुर नगसर थाने का यह मामला स्थानीय ही नहीं, बल्कि प्रदेश की मीडिया में भी सुर्खियों में छाया रहा. समाज का बहुसंख्यक वर्ग इसे पुलिसिया बर्बरता की इंतहा के रूप में पुलिस और योगीराज की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया तो ब्राह्मणों ने इसी निजी अस्मिता से जोड़ कर योगीराज के इकबाल और कार्य संस्कृति पर ही सवाल उठाया, जिसे मुख्यमंत्री ने गंभीरता से लेते हुए जनपद के प्रभारी मंत्री को पीड़ित परिवार के घर भेजा तो 2 अगस्त को स्वयं जिलाधिकारी. जिलाधिकारी ने इस मामले को लेकर मजिस्ट्रेटी जांच बैठा दी और इसकी रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजा. बढ़ते दबाव को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ओपी सिंह ने दोषी थानाध्यक्ष रमेश कुमार को प्रथम दृष्टया 6 अगस्त को ही लाइन हाज़िर कर दिया. लेकिन इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता पवन प्रकाश पाठक ने इस पूरे प्रकरण पर मीडिया रिपोर्ट और दस्तावेजों के हवाले से डीएम और एसपी गाजीपुर तथा मुख्यमंत्री व मानवाधिकार आयोग,उत्तर प्रदेश को लीगल नोटिस 5 अगस्त को भेजकर मामले को और गंभीर बना दिया. विद्वान अधिवक्ता ने योगी सरकार के रामराज्य की व्याख्या करते हुए, प्रख्यात पुलिस सुधारक पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की पुलिस सुधार से संबंधित केस ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार (2016)’ के फैसले का जिक्र करते हुए कहाँ कि पुलिस सुधार के लिए पुलिस को जनकेन्द्रित होने की बात कही गयी बनस्पति सत्ता केंद्रित. आज भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की आवाज मात्र से लोगों को डर लगने लगता है. जबकि पुलिस को लोगों का मित्र होना था.
इस नोटिस का असर यह हुआ कि पुलिस अधीक्षक ने 8अगस्त जाते जाते थानाध्यक्ष रमेश कुमार समेत तीन लोगों को इस प्रकरण में दोषी पाते हुए निलंबित कर दिया. कारण पवन प्रकाश ने इस मामले उचित कानूनी कार्रवाई की अपील की थी, जिस पर विचार न होने पर इस प्रकरण को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की चेतावनी भी दी थी. माना जाता है कि यह कार्रवाई इसी दिशा में डैमेज कंट्रोल के लिए शासन के दबाव में किया गया.
