मुझे कल पढ़ना
● भास्कर राय
मेरी बातें कल सुनना
मुझे कल पढ़ना..!
बहुत कुछ संभव है..
कि तुम..
मेरी बात समझ ही न सको
या सुनो..समझो भी
तो हंसकर टाल जाओ..!
हो सकता है..
मेरी इस हठवादिता पर
तुम्हे एतराज भी ही..!
लेकिन …ये सच है
कि मेरे…
आज के ये संदर्भहीन शब्द
कल तुम्हें सन्दर्भवान
महसूस होंगे..
जब तुम्हारा दर्द..
हद से गुजर जाएगा…
मरहम बनाने में क्रियाशील
हो जाएगा…
तुम्हारे बच्चे फूल की जगह
अंगार उगलेंगे…
तब शायद तुम सोचो..
कि कितना सार्थक था
मेरी मौनक्रान्ति के
विगुल का अक्षरमय शोर..!!
मुझे कल पढ़ना…!
मुझे कल सुनना..!!

