मीडिया का बेशर्म बाज़ार
■ डॉ. अम्बरीष राय
एक आम धारणा है कि जो दिखता है वो बिकता है कमोवेश सही है लेकिन मीडिया की मण्डी में इस जुमले ने नई शक्ल अख्तियार कर ली है. ‘जो बिकता है वो दिखता है’ की तर्ज पर विकसित हो रहे नए मीडिया सामंतो ने ख़बरों की दुनिया को बेशर्म बाजार में तब्दील कर दिया है. मीडिया के इस बेशर्म बाजार में ख़बरों की बोली लगाई जा रही है. अब खबरनवीस नहीं, मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की जरुरत है. जो बेच सकता हो खबर की हर लाईन. खबर का हर शब्द. कॉरपोरेट घरानों की अख़बारों और टीवी चैनलों की दुनिया में हुई आमद ने ख़बरों की दुनिया में ग्लैमर तो भर दिया लेकिन खबरों के सरोकार ने अपना दम भी तोड़ दिया.
लगता है मानो कलम ने अपने हाथ ही खड़े कर दिए हों. इस अंधियारे में भी कुछ रौशनी की फसलें ऊग ही जाती हैं. पत्रकारिता में कुछ लोग अभी ज़िंदा हैं. ज़िंदा हैं इसलिए कि कुछ मरते हुए बचाये जा सकें. लेकिन उनकी ज़िन्दगी हर वक़्त खतरे के आगोश में अपनी खैर मांगती रहती है. जिन कलमकारों ने अपने हाथ नहीं खड़े किये हैं, उनके हाथ कलम किये जा रहे हैं. उसके बाद भी जो कलम अपना सर उठा रही है, उसका सर कलम कर देना, बस एक आसान खेल बनकर रह गया है.
गुलामी के दौर में पैदा हुई पत्रकारिता ने अपने बचपन से लेकर जवानी तक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खूब लिखा. इतना लिखा कि कलम जख्मी हो गई. लेकिन अंग्रेजों के जुल्मो सितम ने जब कलम की सियाही छीन ली तो कलम ने अपने खून से लिखना शुरू किया. कहने का आशय यह है कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखने वालों को बर्बर यातनाएं दी गईं. उन्हें काल कोठरी में डाल दिया गया. उनके परिवार के परिवार नष्ट हो गए. लेकिन एक जाता तो दूसरा कलम का सिपाही शब्दों के तीरों से अंग्रेजी हुकूमत की तोपों का सामना करने के लिए आ खड़ा होता. एक दिन अंग्रेज हिन्दुस्तान को छोड़कर चले गए. गुलामी का वो दौर आखिरकार बीत ही गया. हिन्दुस्तान आज़ाद मुल्क की शक्ल में तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने लगा. सभी संस्थाओं की तरह पत्रकारिता ने भी आज़ादी से अपने हाथ पांव पसारने शुरू कर दिए. लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान के लिए कलम का आज़ाद हो जाना खतरनाक है.
और खतरनाक चीजों पर अंकुश कैसे लगाया जाय, इसके बारे में सत्ता प्रतिष्ठान का थिंक टैंक निरंतर कार्यशील बना रहता है. नए -नए आज़ाद हुए हिन्दुस्तान की लीडरशिप भी आज़ादी के आंदोलन से निकली थी. और उस दौर के संपादक भी उस लड़ाई से दो चार थे. तमाम बड़े नेता पत्रकारिता का भी अनुभव रखते थे. लिहाज़ा सब मिलकर हिन्दुस्तान के नवनिर्माण में लग गए. नेताओं और पत्रकारों के आदर्शवादी जीवन के चलते छोटे-मोटे मतभेद भले रहे हों लेकिन एक बेहतर देश और समाज की परिकल्पना में लोकतंत्र के ये दोनों धड़े चलते रहे. मिशन की पत्रकारिता में गिरावट का दौर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में शुरू हुआ. क्योंकि सियासत ने भी उसी दौर में अपना आदर्शवादी चोला उतारना शुरू कर दिया था. इंदिरा गांधी के कद और उनके पद को कांग्रेस के अंदर और बाहर से कड़ी चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. विरोधियों को ठिकाने लगाने में पत्रकारों की सेवाएं ली जाने लगीं. चंद कलम के सिपाहियों ने सत्ता से मिलने वाले लाभों के लिए अपनी कलम का निशाना उन लोगों को बना लिया, जिन्हें सत्ता अपने लिए खतरा मानती थी. ऐसे कलमकारों ने सत्ता से खूब लाभ लिया. चंद चेहरों को खरीदने के बाद सत्ता ने अख़बारों को ही खरीदना चाहा तो, ऐसा हो न सका. 1975 आते -आते सियासत की शतरंज पर मोहरे बहुत तेजी से चले जाने लगे. विपक्ष मजबूत हो रहा था. और इंदिरा गांधी लगातार कमजोर. इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी. सरकारी एजेंसियों ने चुन चुनकर इंदिरा गांधी के विरोधियों को गिरफ्तार कर लिया. छोटे से बड़े तमाम ऐसे नेता, जो श्रीमती गांधी की सत्ता के लिए चुनौती बन सकते थे, जेलों में ठूंस दिए गए. फिर नंबर आया अख़बारों और पत्रकारों का. सत्ता की किरकरी बने सभी अख़बारों के संपादकों को बुलाकर उन्हें सरकारी रीति नीति पर चलने का आदेश सुना दिया गया. जिन्होंने कांग्रेस राज की बात नहीं मानी, उनके सारे सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए. तमाम अख़बार इमरजेंसी के उस दौर में सत्ता प्रतिष्ठान के सामने झुक गए. खैर इमरजेंसी हटी. इंदिरा गांधी और कांग्रेस की सत्ता भी चली गई. लेकिन मीडिया के झुकने और बिकने का जो दौर उस वक़्त शुरू हुआ,वो आज तलक जारी है. इंदिरा गांधी से सत्ता जनता पार्टी के हाथ चली गई. तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की एक बात ने मीडिया के चाल चरित्र और चेहरे को खोलकर रख दिया था. आडवाणी ने कहा था ‘ उन्होंने ( कांग्रेस ) आपसे झुकने को कहा था, आप (मीडिया ) तो लेट ही गए.
जनमत को प्रभावित करने की ताकत ने मीडिया संस्थानों के मालिक और संपादकों को समाज में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया. 1987 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से अपनी राहें जुदा कीं तो उनको मीडिया ने हाथों हाथ लिया. 1989 में जनता दल की सरकार और विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री बनने के पीछे मीडिया का एक बड़ा रोल था. माना जाता है कि दिल्ली से निकलने वाले हिंदी अखबार जनसत्ता ने राजीव गांधी की मजबूत सत्ता को उखाड़ने में बेहद अहम किरदार निभाई. मीडिया की इसी ताकत से भयभीत होने वाले कॉर्पोरेट चेहरे ने विज्ञापनों की भेंट चढ़ाकर अपने व्यवसायिक हित सुरक्षित किये. मीडिया की इसी ताकत ने मीडिया घरानों के मालिकों के दिमाग में सामंतशाही कीड़े डाल दिए. अख़बार में काम करने वाले पत्रकार को कई अख़बार मालिक बंधुआ मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं समझते. मेरा खुद का अनुभव बहुत कड़वा रहा है. 2007 की बात है. मैं हिंदी के मशहूर अख़बार पंजाब केसरी जालंधर में सेन्ट्रल डेस्क पर कार्यरत था. अख़बार के मालिक विजय चोपड़ा से मिलने के पहले उनसे जुडी खौफ की कहानियों से मिलने का मौका मिला. रोज कोई न कोई सहकर्मी मुझे ये कहता कि बाबू ने अभी बुलाया कि नहीं? मैं कहता, कौन बाबू? तो सब कहते जल्दी पता चल जाएगा. एक दिन मेरा बुलावा आ ही गया. ये तो मैं जानता था कि पद्मश्री बाबू विजय चोपड़ा कुछ लिखते नहीं, बस उनकी सम्पादकीय उनके नाम से रोज छप जाती है. लेकिन मुझे उस वक़्त बड़ा आश्चर्य हुआ, जब मैंने देखा कि सम्पादकीय लिखने वाले हमारे बड़े बुजुर्ग पंडित जी को विजय चोपड़ा डांटते हुए सम्पादकीय में दो एक लाईन में फेरबदल का ज्ञान बांट रहे थे. हिमाचल प्रदेश के रहने वाले पंडित जी का नाम आज मुझे याद नहीं है, लेकिन उनकी कद काठी और उनका मेरे प्रति स्नेह मुझे आज भी याद है. बहरहाल मेरी क्लास इसलिए ली गई थी क्योंकि मैंने समाचार एजेंसी भाषा की जगह समाचार एजेंसी वार्ता की खबर क्यों नहीं लगाई ? जबकि खबर में कोई फर्क नहीं था. बाबू ने अखबार में चंद आदमी छोड़ रखे थे, जिनका काम बस इतना था कि अख़बार में काम करने वाले पत्रकारों की गलती ढूंढना और उन्हें बाबू को बताना. फिर बाबू पूरा पत्रकारीय ज्ञान और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करके दोषी ठहराए गए शख्स को आर्थिक जुर्माना लगाकर मुक्त कर देते थे. बाबू की महानता ये भी थी कि बड़ी शान से कहते थे कि जुर्माने की रकम वो थोड़ी रखते हैं, बल्कि उसे एक धर्मार्थ संस्था को दान कर देते हैं. ये और बात है कि वो धर्मार्थ संस्था भी उन्हीं की थी. बहरहाल मेरी पहली पेशी थी, लिहाजा गाली तो नहीं मिली लेकिन मुझे सिखाने के लिए सौ रूपये का जुर्माना और डांट की कॉकटेल देकर बाबू ने मुझे अपने शानदार केबिन से रुखसत कर दिया. फिर क्या था. मैंने पंजाब केसरी को सलाम किया और फिर आज तक उधर का रुख नहीं किया. विजय चोपड़ा दअसल एक व्यक्ति नहीं बल्कि मीडिया मालिकों के एक ऐसे घिनौने चेहरे का प्रतीक हैं, जो बहुतेरे मालिकों में प्रायः पाया जाता है.
लोगों के मन मस्तिष्क को प्रभावित कर सत्ता की चाभी को घुमाने वाली मीडिया की ताकत से कॉर्पोरेट घराने को ईर्ष्या होने लगी. कभी डरकर तो कभी अपने उत्पादों के प्रचार के लिए किये गए भुगतान के आकलन में कुछ कॉर्पोरेट घरानों का दिमाग ठनका और उन्होंने पॉवर पैसे के गठजोड़ से ख़बरों का जो तिलिस्म रचा वो आगे और भी बड़ा पॉवर पैसे का गठजोड़ बनकर उभरा. ख़बरों की दुनिया में आये बाजार के खिलाड़ियों ने पत्रकारिता को मिशन के सैद्धांतिक स्वरुप से निकालकर ग्लैमर की जो फसल बोई, उससे चमकदार चेहरे तो निकले लेकिन सच्ची और मिशन की पत्रकारिता के परिश्रम से तपे चेहरे बीते कल की बात होते दिखने लगे हैं. आज बड़े मीडिया घरानों के रसूख ने खबरों की दुनिया का एजेंडा अपने हिसाब से सेट करना शुरू कर दिया है. मजबूत संसाधनों के चलते इनकी पहुंच व्यापक हो चली है तो इनके एजेंडे पर चलना और भी पत्रकारीय चेहरों के लिए मज़बूरी बन जाता है. भले उस एजेंडे को गलत ही साबित करना पड़े. लेकिन आखिरकार पत्रकारिता उस खड़े किये गए एजेंडे में उलझकर रह जाती है. सत्ता का स्वभाव है, जनमत को अपने अनुकूल रखना. और ख़बरों की दुनिया के रहनुमा जब झुकने के आदेश पर लेटने लगें तो सत्ता तो सहज महसूस करेगी ही. और सत्ता के चेहरे निरंकुश भी होने लगते हैं. लेकिन सोशल मीडिया के असीमित संसार ने ख़बरों के आकाश को और भी बड़ा कर दिया है. मुझे एक बड़ी उम्मीद सोशल मीडिया से है, अपनी तमाम अराजक हरकतों के बावजूद. तमाम मुश्किलों और ख़त्म होती सम्भावना के बीच एक उम्मीद हमेशा ज़िंदा रहती है जो भरोसा दिलाती है. कभी मेरी ही कलम से निकला है कि हैसियत तेरे बाजार की अभी इतनी नहीं, के किरदार हम जैसों के, तुम खरीद लो.

