मदर्स डे विशेष : ममत्त्व को शब्द में लिखना संभव है!
( मनीष गंगा )
हम बहुत सौभाग्यशाली हैं जो अपने विचारों के मोतियों को शब्दों की माला मे पिरोकर पाठकों के सामने रखते हैं। जिसमें भाषाओं का समावेश होता हैं। नियम-क़ायदे होते हैं। चाहे वो गज़ल हो, मुक्तक हो, दोहा या कोई कविता। कभी-कभी हम बिना नियम के भी भावनाएं व्यक्त कर देते हैं। कहानी के अंदाज़ में या कविता के माध्यम से हम बहुत-कुछ बयां कर सकते हैं। चाहे वो प्रेम हो, करुणा हो, त्याग हो, द्वेष हो, गुस्सा हो, चालाकी हो, भोलापन हो, भक्ति हो, नास्तिकता हो, दर्द हो, ख़ुशी हो, वीरता का गुणगान हो या भय की कहानी। सब-कुछ। ऐसा कोई विचार या भावना नहीं रहती जिसे हमारे लिए बयां कर पाना मुश्किल हो। परंतु एक ऐसा अहसास है जिसे हम सदियों से जीते आ रहे हैं। हमारे जन्म के समय से। हमारे मुस्कराने से हमारे रोने तक, हमारे गिरने से खड़े हो पाने तक, हमारे तुतलाने से साफ बोलने तक, हमारी सारी खुशियों और गमों में, जीवन के सारे अहसासों में जिसे साथ पाते हैं। उस अहसास को बयां करना, वो भी शब्दों में! जैसे कोई सूरज को दिया दिखाने चला हो! वह अहसास है ममत्त्व। माँ अपने बच्चो को देती है, बिना भेदभाव के। जिस प्रकार हाथ की किसी भी अँगुली को काटोगे तो रक्त एक-सा बहता हैं ठीक उसी प्रकार। त्रिदेवों में सबसे चतुर विष्णु जी कहे गये है। उन्होंने भी ममत्त्व के आंचल में रहने के लिये अनेकों बार पृथ्वी पर जन्म लिया। ख़ुद रुद्र भी अंजनी के लाल हुए क्योंकि वे भी लालायित थे ममत्त्व की छांव में रहने को। जिसे हम चाह कर भी नहीं लिख सकते, यही वो भावना हैं, जिसे कोई भी बड़ा शायर, कहानीकार, कवि नहीं लिख पाया! चाहें वो ख़ुद माँ हो। क्योंकि ये अहसास, ये भावनाएं, सिर्फ महसूस की जा सकती हैं। लिखना चाहूँ तो मैं भी लिख सकता हूं, माँ की ममता पर। उसकी करुणा, त्याग, ग़ुस्सा और उसकी ममता पर। जिसका क़ोई मोल ही नहीं हैं। वो कभी लिखा नहीं जा सकता। वो माँ ख़ुद भी चाहें तो बयां नहीं कर सकती। माँ ही हैं जो ख़ुदा नहीं हैं, पर ख़्याल ख़ुदा-सा रखती हैं। क्या शब्द औऱ कैसे लिखतें हैं? माँ के विषय मैं हम सीखते-सीखते थक जाते हैं, पर उसके ममत्त्व के आगे तो सागर भी बूंद बराबर दिखाई देता हैं। सूर्य का प्रकाश भी इतना तेज कहाँ जितनी माँ की ममता होती हैं। हम सच में सौभाग्यशाली हैं, जो हमें माँ के आंचल में रहने का सुख मिला हैं।
रूह को मेरी माँ सुकून नहीं आता,
गर इक रोज़ तेरा चेहरा नज़र नहीं आता।
लेख़क…
मनीष गंगा
म.नो 8878940271
जय हिंद नगर
इंदौर
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