खास-मेहमान

बेबाक विचार : शादी के दबाव से मुक्त हों बेटियाँ

(शालिनी श्रीवास्तव)

आजकल मैंने अपने रिश्तेदारों से बात करना कम कर दिया है क्योंकि ज्यादातर लोगों को यह जानने में ज़्यादा दिलचस्पी है कि मैं शादी कब कर रही हूँ बजाए इसके कि मेरे जीवन में आगे बढ़ने की क्या योजनाएं है। हालांकि लड़की के पैदा होने के बाद से ही माता-पिता विवाह सम्बन्धी योजनाएं बनाने में जुट जाते है। परन्तु लड़की के 20 साल पार करते ही माता-पिता के साथ आस-पड़ोस, दोस्त-यार ,नाते- रिश्तेदार सभी इस बात को याद दिलाने लगते है कि घर की बेटी सायानी हो गई है। अतः इसके लिए वर ढूँढने का कर्यक्रम यथशीघ्र ख़त्म कर लिया जाये। ऐसा लगता है मानों बेटी की चिंता माँ-बाप को कम पड़ोसियों को ज़्यादा हो।

हद तो तब हो जाती है जब लड़की उम्र 25 या 30 हो जाती है। ऐसा लगता है मानों बेटीयों का घर में रहना पाप हो। ऐसे में वह घर-बाहर सबको खटकने लगती है। माता-पिता से कहीं ज़्यादा बोझ और दिखावटी चिंता-परेशानी आस-पास के लोगों और रिश्तेदारों को होने लगती है। ऐसा लगता है कि अगर बेटियां विदा ना हुई तो उनके घर का राशन ख़त्म हो जायेगा। कभी-कभी तो पड़ोसी एवं रिश्तेदार लड़की की शादी न होने पर उसके बारे में उलटे-पुल्टे कई मनगढन्त कहानियां भी गढ़ने लगते है। जैसे लड़की का शादी न करना बहुत बड़ा जुर्म हो और उसका कंवारी रहना कोई संगीन गुनाह। इतनी चिंता माँ-बाप एवं पडोसी आमतौर पर लड़कों के लिए नहीं दिखाते। उनकी उम्र 35 के पार हो जाए तब भी उनपर मानसिक तौर पर उतना दबाव नहीं बनाया जाता जितना की लड़कियों पर।

कितनी अज़ीब बात है कि लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 और लड़कों की 21 है। एक तो वैसे ही लड़कियों को बोझ समझा जाता है। हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी भी कम है। शादी का दबाव वे इंटरमीडिएट के बाद से ही झेलना शुरू कर देती है और तो और उन्हें अपना घर परिवार सब छोड़कर नई जिन्दगी की शुरुआत और हर तरह से सामंजस्य बैठाना पड़ता है। ऐसे में 18 वर्ष की आयु में अगर वे शादी के बंधन में बंध जाती है तो उनके आगे बढ़ने का रास्ता वहीं से खत्म हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाह रोकने के लिए भले ही लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 रखी हो, मगर यह विचारणीय बात है कि अगर लड़कियों को हर चीज़ में भागीदार बनाना है और उनके सपनों को भी उड़ान देना है तो उनको सरकार की तरफ से कुछ समय और मिलना चाहिए। ताकि घर वाले 18 वर्ष की उम्र से शादी का दबाव न बनाये और वह भी अपने करियर और सपनों के बारे में सोच सकें।

हालाँकि 18 साल में लड़कियों की शादी कर देने वाले माता-पिता कम ही होंगे मगर फिर भी उनपर दबाव बनाना शुरू कर दिया जाता है। आमतौर पर ज्यादातर अभिभावक 25 साल तक लड़कियों की शादी कर ही देते है। ऐसे में अनगिनत दबाव, चिंताओं और भावी ज़िन्दगी की अनिश्चितताओं से घिरी लड़कियाँ अपने भविष्य और सपनों के बारे में या तो सोच ही नहीं पाती या फ़िर उनको मौका ही नहीं मिलता। लड़कों को ना तो अपना घर छोड़ना होता है ना ही करियर बनने तक शादी का दबाव ही झेलना पड़ता है। उनकी उम्र अधिक निर्धारित है वस्तुतः लड़कियों से ज्यादा समय भी मिलता है और पुरुष प्रधान समाज होने का फायदा भी। कुल मिलाकर लड़कों को करियर पर फ़ोकस करने का पूरा मौका मिलता है और समय भी। लड़कियां इस मामले में ग़रीब है। कोर्ट ने भी 3 साल का फासला बना कर लड़कियों को 3 साल का समय कम दिया है। परिवार और रिश्तेदार तो वैसे ही लड़कियों के पीछे पड़े रहते है ऐसे में कोर्ट को बदलते समय के अनुसार बेटियों को आगे लाने के लिए थोड़ा और समय दे देना चाहिए।

आमतौर पर लड़कियाँ बचपन से ही शादी सम्बंधित विचारधाराओं से परिचित रहती है। और युवावस्था में आते-आते शादी का दबाव उनपर इसकदर हावी रहता है कि कई बार दबाव् में आकर वह कहीं पर भी शादी कर लेती है। जिसका खामियाज़ा परिवार और लड़की दोनों को भुगतना पड़ता है। लोग क्या कहेंगे कि विचारधारा से ग्रस्त माँ बाप यह भूल जाते है कि लड़की सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि उन्हीं की कोख से पैदा बेटी है जिसके अपने भी कुछ सपने है। हर लड़की के लिए शादी ही सबकुछ नहीं होता। अगर माता-पिता बेटियों की शादी करके खुद को जिम्मेदारी से मुक्त करना चाहते है और इसीलिए वे उनपर लगातार दबाव बनाते है तो वे ग़लत है। लड़कियों को शादी सम्बंधित फैसले लेने के लिए पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। वे कब और किससे शादी करना चाहती है इस बात को समझना माँ बाप का कर्तव्य है। वे अगर शादी नहीं करना चाहती तब भी उसके फैसले का स्वागत करना चाहिए क्योंकि वह अपने जीवन के फ़ैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। माता-पिता को सहज भाव से शादी को लेकर अपनी सहमति-असहमति प्रकट करना चाहिए ना की जोर-जबरदस्ती या दबाव बनाकर। लड़का हो या लड़की दोनों को एक ही जीवन मिला है और वे इस जीवन में क्या करना चाहते है ये उनपर ही छोड़ देना चाहिए।

नाते-रिश्तेदारों और आस-पड़ोस को समझाना कई बार आसान हो जाता है अगर आपके घर वाले आपके फैसले के साथ खड़े हो और आपकी रज़ामंदी को प्राथमिकता दें। परन्तु अगर माता-पिता ही दबाव बनाएं तो कई बार लड़कियों के आगे बढ़ने का रास्ता बंद हो जाता है। अपने जीवन का फैसला और जीवनसाथी चुनने की आज़ादी भले ही कोर्ट ने दे दी हो, मगर आज भी ज्यादातर लड़कियों के हाथ में यह आज़ादी नहीं है कि वे शादी अपनी मर्जी से और जब चाहे करें। अक़सर माता-पिता की चिंता और सामाजिक दबाव में आकर लड़कियाँ अपने का करियर स्वाहा कर देती है।

सही उम्र पर शादी, आस-पड़ोस के ताने तथा भावी जीवन की अनगिनत जिम्मेदारियां और अपेक्षाओं के बीच झूलती युवतियां कई बार तनाव में आकर शादी के लिए हाँ तो कर देती है मगर ताउम्र कुछ ना कर सकने का अफ़सोस रह जाता है। कई बार तो माता-पिता स्वमं प्रतिभाओं के उभरने से पहले ही उन्हें खत्म कर देते है और ताउम्र ऐसी प्रतिभाएं दबी रह जाती है।
माता-पिता की चिंता स्वभाविक है मगर उन्हें बेटियों की मर्ज़ी भी जाननी चाहिए बजाए उसपर दबाव बनाने के। अगर कोई बेटी शादी से मना कर रही है तो उसके पीछे कारण हो सकता है। पेरेंट्स को बेटी के फैसले का स्वागत करना चाहिए क्योंकि आज युग बदल गया है । लड़कियां कई सारे बदलाव लेकर आ रही है। अगर आपकी बेटी आगे और पढ़ना चाहती है या किसी लक्ष्य प्राप्ति की तरफ बढ़ रही है तो उसका साथ दें उसपर शादी का दबाव बनाकर उसकी प्रतिभाएं न दबाएँ।

शादी करने का कोई सही समय नहीं होता। जबतक लड़का-लड़की मानसिक रूप से तैयार ना हो, उनकी शादी नहीं करनी चाहिए। एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद करियर में ऊँचाई पर जाने की अभिलाषा सभी की होती है। एक अच्छी नौकरी के बाद ही लड़का हो या लड़की मानसिक रूप से शादी पर विचार बना पाते है। जब तक वह अपने द्वारा तय बुलंदियों को प्राप्त नहीं कर लेते तबतक मन अशांत रहता है ऐसे में शादी कर देना उपाय नहीं है। ऐसे में शादी कर देने के बाद भी तनावपूर्ण जिंदगी बनी रहती है। संचारक्रान्ति के इस युग में लगभग सभी युवतियों को यह ज्ञान है कि उसके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। इसलिए उसको फैसले लेने की आज़ादी मिलनी चाहिए। और पेरेंट्स को भी बेटी की शादी का अनावश्यक तनाव लेना छोड़ देना चाहिये। जब 18 साल की उम्र में बेटी हो या बेटा देश का नेता चुन सकता है तो अपने जीवन का फैसला क्यों नहीं ले सकता।

एक चिंता उम्र को लेकर माता-पिता के अंदर हमेशा बनी रहती है। वे चाहते है कि उनके जीते जी उनके सभी बच्चे शादी करके बस जाये। लेकिन अब नज़रिया थोड़ा बदलने की जरुरत है। क्योंकि आज बदलते समय में बहुत कुछ बदल चुका है। शादियों के टूटने का अनुपात बढ़ने लगा है। ऐसी शादी का कोई फायदा नहीं जिसमे लड़की या लड़का खुश ना हो। इससे तो अच्छा है कि लड़की-लड़का अपने हिसाब से शादी करे और जब मर्ज़ी हो तब करे। कोई जरुरी नहीं की बड़ी लड़की के बाद ही छोटी लड़की या लड़के की शादी की जाए। अगर छोटी लड़की या लड़का मानसिक रूप से तैयार है तो परम्परा बदलिए और उनकी शादी करिये। इससे आपका बोझ कम होगा और आपकी जिम्मेदारी भी। अब वह समय आ गया है कि माता-पिता समाज़ के दबाव में ना आये बल्कि अपनी बेटी के फैसलों को ख़ुशी से स्वीकार करें और समाज को भी राह दिखाए। करियर और शादी दो अलग चीज़ें है। पहले बेटी के करियर पर ध्यान दें, उसके बाद शादी पर। पर दोनों ही स्थिति में दबाव ना बनाए। जबतक पेरेंट्स बेटियों को मौका और आज़ादी नहीं देंगे, तबतक बेटियां ना तो आगे बढ़ सकेंगी और ना ही अपने फैसले ले सकेंगी।

बेटियां मज़बूत और कमजोर है तो माँ-बाप की वजह से। बेटों के साथ-साथ बेटियों को भी बराबर का मौका देना हर पेरेंट्स का कर्तव्य भी है और आज की जरूरत भी। पहली बार मुझे काफ़ी दुःख हुआ जब एक साक्षात्कार में मुझसे शादी का सवाल पूछा गया। यह सवाल आमतौर पर लड़कों से नहीं पूछा जाता। शादी तो लड़कों की भी होती है। उनसे भी पूछा जाना चाहिये कि शादी के बाद पत्नी को जॉब करने की आज़ादी दोगे या नहीं। ये ठीक बात है कि शादी के बाद लड़कियों को कई बार शहर और नौकरी तक छोड़नी पड़ती है। मगर किसी साक्षात्कार में लड़कियों से इसतरह के सवाल पूछा जाना यह दर्शाता है कि साक्षात्कर्ता या तो शादी को अहमियत देते है या फिर शादी के बाद लड़की के नौकरी छोड़ने के भय से उसको मौका नहीं देना चाहते।

इसतरह के व्यक्तिगत सवाल लड़कियों से नहीं पूछना चाहिए क्योंकि नौकरी और शादी दो अलग चीज़े है। प्रतिभा को देखकर नौकरी देना चाहिए ना कि शादी के बाद की घटना का पूर्वानुमान लगाकर। ऐसी मानसिकता वाले पुरुष लड़कियों की जिंदगी को सिर्फ शादी से जोड़कर देखते है। जबकि वे भूल जाते है कि उनकी भी शादी होगी और वे भी नौकरी को मैनेज करेंगे। जब वे सामंजस्य बैठा सकते है तो लड़कियाँ तो इसमें माहिर होती है।
बसना यानि सेटेल शब्द ने सबको कसमकस में डाल रखा है। माँ-बाप बच्चों की शादी कर सेटेल करना चाहते है। बच्चे करियर में सेटेल होना चाहते है कोई कहीं तो कोई कहीं और अपना सेटेलमेंट ढूंढ़ रहा है। ऐसे में किसी एक चीज़ में सेटेल हो जाने से भी काम नहीं चलता और सेटेलमेंट प्रक्रिया ताउम्र चलती है। आज के दौर में सिर्फ शादी सेटेलमेंट नहीं है। शादी के बाद भी तमाम तरह के सेटेलमेंट और सामंजस्य बिठाना पड़ता है। पेरेंट्स को अब इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि लड़का या लड़की मानसिक रूप से शादी सम्बंधित सेटेलमेंट को लेकर तैयार है या नहीं।

कुछ लोग मुझे कंवारी देखकर हमेशा चिंतित रहते हैं। शायद वे मुझे पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझा हुआ देखना चाहते है। या फिर मेरी सफलता से व्यथित है। इनमे से ज्यादातर लोग पुरुष है। ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि शादी सम्बंधित भलाई की सलाह वो मुझे ना दें और ना ही मेरी क़ाबिलियत पर शक ना करें। तमाम दबाव लिए अभी अकेले आगे बढ़ सकती हूं और मैं अपने लिये सही ग़लत फ़ैसले भी ले सकती हूं। इतना अधिकार सभी शेष है।

(लेखक शालिनी श्रीवास्तव मुक्त लेखिका हैं)
www.shalinisrivastav.com

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