बस निकल आते है जज्बात मेरे, फिर सोचता हूं इन बहरों को मैं सुनाऊं क्यों…
( डा. राहुल राय )
बात कड़वी है, मुझसे ही बहसेंगे,
इन्हे मैं बताऊं ही क्यों,
जो सो रहे हैं, की मुर्दा हैं ?
उनको मैं उठाऊं ही क्यों।
जिनके लिए चुनाव जरूरी है,
ज़िन्दगी में ऐसे लोगों पर,
मैं अपना वक़्त गवाऊं क्यों।
जो बिक जाते है दारु, मूर्गे,
व चंद पैसो पर,
उस कौम के लोगों को,
मैं समझाऊ क्यों।
परेशां हैं, कुछ-कुछ है डरे,
पर भीड़ मैं रैली किये सब हैं पड़े,
इनके लिए अपनी जान पर,
मैं खतरा उठाऊ ही क्यों,
सोचता हूं, आज अस्पताल,
मैं जाऊं ही क्यों।
हर गांव ने खोया है,
हर मुहल्ले में है लाश,
जो इन लाशो को नहीं उठाता,
जिनके लिए एक मास्क है बोझ
उनका बोझ मैं उठाऊ क्यों।
जो है किस्मत के सहारे जी रहे,
ऐसे हालात में मुंह, आंख सब बंद किये,
इनको आइना मैं दिखाऊ ही क्यों।
तुम जाओ कल चुनाव है सब वोट करो,
थोड़ा कोरोना कम है, अभी इसको और मजबूत करो,
वोट देना मगर कभी सवाल मत करना,
किसी ने सच है कहा,
“जिन्दा कौमे सवाल करती है”
तुम हो मुर्दा तुम कोई बवाल मत करना,
पूछना मत की क्यों ये हालत है,
कोई सन्देश तुम्हारा कहीं पंहुचे न,
सवाल है तो कई,
मैं तुमको बताऊ ही क्यों।
ऑक्सीजन, बिस्तर सिस्टम,
हर गांव का बजट है एक करोड़,
तुम मर रहे हो फिर भी,
और समझाऊ कैसे,
क्या है नैतिकता हमारी, हम किस मोड़ पर खड़े हैं।
हर आपदा में अवसर हम ढूढ़ रहे,
बस निकल आते है जज्बात मेरे,
फिर सोचता हूं इन बहरों को मैं सुनाऊंं क्यों।।
( रचनाकार डा. राहुल राय मऊ में MBBS MD हैं )


