नपुंसक…
( शब्द मसीहा केदारनाथ )
एक बार दो दोस्तों में अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत कहासुनी हुई। दोनों दोस्त अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे । दोनों की दोस्ती ख़तरे में थी । उनका एक और दोस्त था जो उम्र में बड़ा था और थोड़ा -सा बदनाम भी । जब उसको पता चला तो उसने एक प्लान बनाया और दोनों को अपने पास बुलाया।
“यारो ! आज मैं बहुत खुश हूँ । तुम्हें आज ऐश करने का मौका दे रहा हूँ । तुम्हारे लिए मैंने ट्रीट का इंतज़ाम किया है बस शर्त ये है कि जब तक तुम एंजॉय करोगे तुम उनसे कोई बात नहीं करोगे । जब तुम्हारा दिल भर जाय तब तुम ये कागज का लिखा पढ़ोगे और मुझसे आकार मिलोगे।”
दोनों एक-दूसरे को घूरते हुए देखते रहे और अपना-अपना कागज का पुर्जा लेकर चले गए। मन में बहुत उत्सुकता थी कि ये ट्रीट में क्या खास है ? ऐसा क्या लिखा है जो ट्रीट के बाद ही पूछना है? दिमाग में सवाल भी घूम रहे थे और दोस्त की बात भी ।
दोनों अलग-अलग औरतों के साथ हमबिस्तर हुए और जब फ़ारिग हो गए तो दोस्त की बात याद आई । उन्होने लड़कियों से धर्म पूछा उनका । लड़कियां उन्हें गाली देते हुए ज़ोर से हँसी-
“हम औरत हैं, हिन्दू के साथ सोये तब भी और मुसलमान के साथ सोये तब भी । औरत और मर्द के बीच मज़हब नहीं आता। बख्शीस निकाल और दफा हो।”
दोनों दोस्तों ने एक -दूसरे को देखा और फिर गर्दन नीचे किए वापिस उतर पड़े।
“कोई सबक सीखा ?” तीसरे दोस्त ने कहा।
“भाई ! माफ कर दो हमें ।” वे दोनों दोस्त बोले।
“एक शर्त पे माफ़ करूंगा।”
“क्या शर्त है ?”
“आज के बाद कभी दोस्ती में धर्म नहीं लाना । हम तो बुरे लोग थे । मैंने तुम्हें समझा दिया । पर बड़े लोगों को समझाना बहुत मुश्किल होता है।”
“पर ऐसा क्यों ?”
“साले सोच से भी नपुंसक जो होते हैं …..हा हा हा।”

