रचनाकार

तू ही मेरा ताजमहल…

(शब्द मसीहा केदार नाथ की कहानी)

“रत्तू! आज क्या है? तेरे को कुछ याद है?” पत्नी ने साइकिल पर पति के लिए खाना बांधते हुए पूछा।

“अरे! मुझे कैसे मालूम होएगा, मेरे को अब वक्त ही किधर मिलता है। सुबह निकलता हूँ, दस किलोमीटर ये लोहे का घोड़ा खींचता हूँ, और फिर उधर जाकर सुपरवाइजर का गाली सुनता हूँ। सारा दिन अपना देह तोड़ता हूँ, और जब शाम को थक जाता हूँ, तो अपने घर को याद करके निकल पड़ता हूँ फिर से एक लोहे के घोड़े को दौड़ाते हुए। बस घर याद रहता है और तू याद रहती है।” रत्तू ने मुस्कुराते हुए कहा।

“मेरे को मालूम था, तेरे से ऐसा ही जवाब मिलने वाला है। मेरा साला किस्मत खराब है। मैं तेरे को इतना प्यार करती, और इतना तेरा ख्याल करती, मगर तेरे को आज का दिन का बिल्कुल खयाल नहीं। जा…. तू जा अपने काम पे।” मुंजा ने अपना गुस्सा दिखाते हुए कहा।

रत्तू की निगाह अपनी घड़ी पर गई। वह मन ही मन कुछ बुदबुदाया और उसने अपनी साइकिल को आगे बढ़ा दिया। रत्तू मन ही मन मुस्कुरा भी रहा था। उसे तो याद था कि आज उसकी शादी की तीसरी सालगिरह है। उसे मालूम था कि मुंजा घर में रहकर टीवी देखती है। और उस टीवी को देखते-देखते शायद मुंजा की ख्वाहिशों का संसार बहुत बड़ा हो गया है। ये सालगिरह और जन्मदिन के चोंचले तो गरीब आदमी के लिए हैं ही नहीं। गरीब आदमी अपनी रोजी-रोटी चलाएगा या फिर यह बेकार की फिजूलखर्ची करेगा, अपने जन्मदिन के नाम पर और अपनी सालगिरह के नाम पर। जिन लोगों के पास पैसा है, उनको पैसा खर्च करने का कोई बहाना चाहिए, दोस्तों को इकट्ठा करने का मौका चाहिए, और इसी के बीच में बहुत सारे शातिर लोग होते हैं, जो इन मौकों को खरीदारी से और गिफ्ट के लेने-देने से जोड़ देते हैं अपने व्यापार के लिए।

तभी रत्तू ने देखा की रेल का फाटक बंद हो गया है। जब भी रेल का फाटक बंद होता है, तो उसे कम से कम पंद्रह से बीस मिनट तक इंतजार करना पड़ता है। शायद इस रेलवे फाटक का आदमी यहां के लोगों से मिला हुआ है, इसलिए गाड़ी आने के दस-पंफरह मिनट पहले ही फाटक को बंद कर देता है, और गाड़ी जाने के बाद भी फाटक को दस-पंद्रह मिनट के बाद खोलता है। इस बीच कई लोग इन रेहड़ी पटरी वालों से अपने लिए सामान खरीद लेते हैं, और इन रेहड़ी पटरी वालों का मुखिया इस रेल फाटक के चौकीदार को कुछ पैसा देता है। मदारी बाबा बता रहे थे कि गरीब आदमी को ग्राहक को रोकना पड़ता है, और बड़ी दुकान पर ग्राहक दौड़ कर जाता है। इस फाटक की भी अजीब कहानी है। रत्तु ने तो यह भी सुन रखा था कि इस फाटक का चौकीदार फाटक के बगल में एक मजार भी बनाए बैठा है और उसके पीछे उसके दो कमरे भी हैं, जहां पर वह उन आशिकों को जगह दे देता है जिन आशिकों को अपने मन की प्यास बुझाने के लिए कोई छत नहीं मिलती।

वाकई में यह फाटक वाला कोई देवता आदमी है। वैसे सुना है कि मजार पर वीरवार के रोज कोई बाबा आता है और उसकी वजह से कई लोगों को घर में औलाद हो गई है। अब तो मजार के पास वीरवार को अच्छा मेला लगता है। अगरबत्ती हो, चादर हो या तबर्रुक हो, सब यहीं पर मिल जाता है। लेकिन फाटक वाले चौकीदार के घर में अभी तक बच्चे की किलकारियां नहीं गूंजी हैं। यह बात भी बड़ी अजीब है।

रत्तू कुछ देर तक खड़ा रहा और फिर अचानक से उसने साइकिल को दूसरी तरफ मोड़ दिया। वह सुनार की दुकान के सामने जाकर उतरा तो सुनार अपनी दुकान की सफाई कर रहा था।

“अरे लाला! एक जोड़ी पाजेब कितने की पड़ जाएगी?” रत्तू ने पूछा।
“जितना दाम डालोगे उतनी मिठाई मिलेगी। मेरे पास सब तरह की पाजेब हैं। तुम अपनी जेब का हाल सुनाओ।” सुनार ने कहा।

रत्तू ने अपना पर्स निकाला और उसकी चोर जेब में से कुछ नोट निकाले और उन्हें गिनने लगा।

“लाला! थोड़े कम भार की और असली चांदी की पाजेब चाहिए, किसी लौंडिया को नहीं देनी है अपनी बीवी को देनी है।” रत्तू ने कहा।

“देखो भाई! यह पाजेब पाँच हजार की पड़ेगी, और यह वाली साढ़े तीन हजार की, और यह वाली ढाई हजार की। वैसे एक बात बताऊं, तेरी शादी का सामान भी तूने मुझसे लिया था, तू पाँच हजार वाली ले जा। जो भी कमी है वो बाद में दे देना।” सुनार बोला।

” मेरे पास चार हजार हैं, अब तुम इस पाँच हजार वाली का दाम सही लगा लो तो मैं इसे ही ले जाऊंगा। मेरे पैसे रख लो, मैं शाम को इसे लेकर जाऊंगा। तब तक तुम इसे अच्छे से चमका दो।” रत्तू ने पैसे सुनार की तरफ बढ़ा दिए थे।

इसके बाद रत्तू फाटक की तरफ चल पड़ा था। वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था। और अपने आप से ही बातें किए जा रहा था….. मुंजा भी मेरे को पागल समझती हैं, उसे लगता है कि मैं कुछ भी याद नहीं रखता हूँ। उसकी पहली रात से लेकर आज तक का एक-एक बात मुझे याद है। जब से उसके साथ शादी बनाई है, जिंदगी का मजा आ गया है। लेकिन वह पागल समझती है कि मैं कोई बहुत बड़ा आदमी हूँ। पंद्रह हजार रुपये महीने में घर चलाना कितना मुश्किल होता है, और मेरे जैसे आदमी के लिए यह जन्मदिन और शादी का सालगिरह किसी मुसीबत से कम थोड़े ही है। अपने को तो याद रखना पड़ता है कि अगर कोई नया चीज खरीदना है, तो कौन-सा चीज को छोड़ना पड़ेगा। गरीब आदमी को अगर अपना इज्जत बचा के रखना है, तो उसको अपनी चादर के हिसाब से ही पैर फैलाने होते हैं।

कुछ देर बाद फाटक के खुलने की आवाज से रत्तू का ध्यान टूटा और उसकी निगाह अपनी घड़ी पर गई। उसके मुँह से अनायास ही निकला…. अरे बाप रे…. आज तो साला सुपरवाइजर का डांट सुनने को मिलेगा। उसने किसी तरह फाटक को पार किया और फाटक से जाते हुए एक टेंपो को पकड़ लिया। अब उसकी साइकिल टेंपो की रफ्तार से दौड़ रही थी। कुछ दूर तक जाने के बाद टेंपो का सहारा भी चला गया और रत्तू को अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करना पड़ा ताकि फैक्ट्री पहुंचने में उसे देर न हो जाए।

फैक्ट्री में पहुंचकर उसने अपना टोकन दिखाया और फैक्ट्री के अंदर चला गया। उसके सामने सुपरवाइजर खड़ा हुआ था।

रत्तू ने अपनी घड़ी की ओर देखा। वह पाँच मिनट लेट था।

“साहब! रेल का फाटक बंद हो गया था इसलिए थोड़ा-सा लेट हो गया।” रत्तू ने कहा।

” कोई बात नहीं रतीराम, आज तो तेरी शादी की सालगिरह है। मैं तेरे को चेक करने के लिए नहीं खड़ा हूँ। मैं तेरी शादी में गया था और जब वापस आया था तो मेरे घर में मेरी बेटी पैदा हुई थी। कल मेरी बेटी का जन्मदिन है, और आज तेरा शादी का सालगिरह है, इसलिए मैं तेरे को अपने घर से देने के लिए ये गुलाब लाया हूँ। आज शाम को तू जल्दी निकल जाना। आज के लिए तेरे को सब माफ़ है।” सुपरवाइजर मुस्कुराते हुए बोला और उसने गुलाब रत्तू की तरफ बढ़ा दिये।

रत्तू भी इस व्यवहार को और इस उपहार को पाकर बहुत खुश हुआ। आज मैं भी सारा काम जल्दी-जल्दी निपटा दूंगा, मैं कोई कामचोर थोड़े ही हूँ, जो जल्दी भाग लूंगा। अपने हिस्से का पूरा काम करके ही जाऊंगा। फैक्ट्री तो मालिक की है और सुपरवाइजर साहब को पूरा काम न देने की वजह से अगर सुनना पड़े तो हम मजदूरों के ही खोटी होगी।

रत्तू मन ही मन सोचता हुआ आगे बढ़ गया और अपनी मशीन पर जाकर काम करने लगा। दोपहर को भी उसमें खाना बहुत जल्दी खा लिया था, और फिर से काम पर लग गया था।

सुपरवाइजर उसके पास आया और बोला, ” रतीराम! आज तो घर समय से चले जाओ। मैं तुमको छुट्टी देता हूँ।”

“क्या साहब, आपका बेइज्जती थोड़ी कराने का था मेरे को। मेरा प्रोडक्शन गिन लो । मैंने अपने हिस्से का काम पूरा कर दिया है। थोड़ा-सा वक्त खाने का बचा लिया था, इसलिए काम भी जल्दी निपट गया।” रत्तू ने मुस्कुराते हुए कहा।

“मुझे पता है, अगर कोई तुम्हारी चुगली भी करता है, तो मैं कभी भरोसा नहीं करता, क्योंकि तुमको मैं कई साल से जानता हूँ। जल्द ही तुमको अब मेरी जगह लेनी पड़ेगी। मालिक मुझको दूसरी जिम्मेदारी देना चाहते हैं, और मुझसे पूछा था कि कौन काम संभाल सकता है, तो मैंने तुम्हारा नाम ले दिया है। अब तुमको पैसा भी ज्यादा मिलेगा और जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी। आज तुम्हारे लिए खुशी का दिन है। घर में कुछ मिठाई लेकर जाना।” सुपरवाइजर ने रत्तू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा और फिर वह दूसरी तरफ चला गया।

रत्तू ने अपने कपड़े बदले और उसके बाद अपनी साइकिल उठाकर फैक्ट्री से बाहर निकल गया। उसकी कमीज की जेब में सुपरवाइजर के दिए हुए वो नायाब फूल थे जिनके साथ उसको खुशी की खबर मिली थी। अब उसे घर ज्यादा दूर नहीं लग रहा था। थकान होने के बावजूद भी रत्तू के मन में उत्साह भरा हुआ था। आज उसे जल्दी आने की वजह से रेलवे फाटक भी खुला मिला था। वह अपनी साइकिल को दौड़ाते हुए सुनार की दुकान पर पहुंच गया था। उसने सुनार से पाजेब ली और थोड़ी दूर जाकर उसने जलेबियां भी ले लीं।

इसके बाद तो जैसे रत्तू दुनिया का सबसे ताकतवर और खुश इंसान हो गया था। उसकी साईकिल के पेडल लगातार तेजी से चल रहे थे, और कुछ ही देर बाद वह अपने घर पहुंच गया था। सूरज अस्त हो गया था और आसमान लाल दिखाई दे रहा था। रत्तू को ऐसा लग रहा था जैसे पूरी धरती ने ही लाल रंग की चुनर पहन ली हो, और रात उसका इंतजार कर रही हो।

जब पत्नी ने साइकिल से खाने का डब्बा उतारा तो उसे साइकिल पर बंधी हुई जलेबियाँ भी दिखाई दीं। उसने जलेबियों को उतारकर रसोई में एक तरफ रख दिया। घर पहुंचकर रत्तू अपने आप को साफ करने और घर में पहनने वाले कपड़े पहनने में व्यस्त था।

मुंजा रसोई बनाने के लिए लग गई थी और रत्तू चारपाई पर लेटकर आराम करने लगा था। जब खाना बन गया, तब मुंजा ने उसके लिए खाना परोस दिया था और साथ में ही जलेबियां रख दी थी।

“मुंजा! आज तो मेरे साथ ही खाना खा न।” रत्तू ने मनुहार करते हुए कहा।

“आज क्या हुआ? वैसे तो तेरी माई बोलती है कि औरत को मरद के बाद में ही खाना चाहिए। तेरे को तो कुछ याद रहता नहीं है, तेरा क्या भरोसा, तू तो माई को बोल देगा कि मैं तेरे साथ साथ खाती है। मेरे को अपने मां-बाप और खानदान को माई को गाली देने का मौका नहीं देना है। और तेरे को किसने बोला था कि तू ये जलेबी लेकर आ। तेरा कितना कमाई है। घर में कुछ तो बचाकर रखना है या जुबान के स्वाद के लिए ऐसे पैसे उड़ाना है?” मुंजा ने सुबह का गुस्सा उतारते हुए कहा।

“ठीक है। अगर मेरे साथ खाने से तेरे को बुरा लगता है, तो मैं माई को बुला लेता हूँ, और तेरे को तेरे मां-बाप के पास भेज देता हूँ। वैसे भी मुझे माई की बहुत याद आ रही है।” रत्तू बोला।

” हां हां…… भेज दो मुझको। ऐसा मर्द के साथ अपना सिर मारने से क्या फायदा जिसको कुछ भी परवाह न हो, और जिसे अपनी जिंदगी के खास दिन भी याद न रहते हों। ऐसे मर्द को अपनी माई के साथ ही रहना चाहिए।” मुंजा ने थाली में और सब्जी परोसते हुए कहा।

“आज सब्जी में तूने मीठा डाला था क्या?”

“मेरा दिमाग खराब है? सब्जी के लिए सारा मसाला डाल के अच्छे से बनाई है। मुझे सब याद रहता है।”

“तो इतनी मीठी-मीठी बातें क्यों कर रही है? आज तेरी सारी बातों में जलेबी जैसा टेढ़ापन है।”

“क्यों नहीं होगा, तुमको कुछ भी कहने का हक है, तो क्या मेरे को जुबान नहीं दिया है। बात करता है …. सब्जी मीठी है। तेरे को तो मजाक करना भी नहीं आता है। गरम मसाला ज्यादा हो गया क्या?” मुंजा ने रत्तू की प्लेट से खाना चखते हुए कहा।

“मुंजा! तू खाना खा ले। आज बाहर का मौसम बहुत अच्छा लग रहा है। मैं तेरे को तालाब पर लेकर जाऊंगा। तू बोलती थी न कि तेरे को मेरे साथ घूमना है। तो आज तू अपना सपना पूरा कर ले।” रत्तू ने कहा।

मुंजा कुछ नहीं बोली थी और रत्तू की थाली में अपने लिए खाना परोसकर खाने लगी थी। रत्तू बाहर निकल आया था और फिर से चारपाई पर लेट गया था।

कुछ ही देर में मुंजा ने अपना काम खत्म कर लिया था और रत्तू के कानों के पास आकर अपने हाथों की चूड़ियां खनखनाने लगी थी। यह इस बात का सबूत था कि मुंजा अब चलने को तैयार है।

रत्तू ने अपने कपड़े बदले और घर को ताला लगाकर अपनी साइकिल पर मुंजा को लेकर तालाब की तरफ बढ़ गया। मुंजा साइकिल के डंडे पर बैठी हुई थी और जैसे ही कोई गड्ढा आता तो मुंजा कभी हैंडल की तरफ झुक जाती और कभी रत्तू के सीने से टकरा जाती। कुछ देर बाद वे तालाब के किनारे पहुंच गए थे। रत्तू ने साइकिल को एक तरफ खड़ा कर दिया और वे तालाब के किनारे बैठ गए।

तालाब के किनारे बैठकर बहुत ही अच्छा अनुभव हो रहा था। हवा तालाब के पानी को छूकर और भी ठंडी लग रही थी। आसमान मैं तारों का जमघट लगा हुआ था और अष्टमी का चंद्रमा उन दोनों को देखकर जैसे पूनम का चांद हो जाना चाहता था।

“रत्तू ! मेरे को इधर आकर बहुत अच्छा लग रहा है। आज तू जल्दी भी आ गया और जलेबी भी लेकर आया, आज क्या कोई खास बात है?” मुंजा ने बात शुरू की।

“हां, आज बहुत खास दिन है।”

“क्यों? आज क्यों खास दिन है? आज क्या तेरी माई की शादी हुई थी?” मुंजा जैसे उसे याद दिलाना चाहती थी।

“बिल्कुल सही कहा। आज मेरे होने वाले बच्चे की मां की शादी हुई थी और मैं उसके लिए देखो तो क्या लाया हूँ।” रत्तू ने अपनी जेब से गुलाब के फूल निकालकर मुंजा के हाथों में रख दिए।

“तेरा याददाश्त भी मरा हुआ है, और तेरा फूल भी मरा हुआ है। तुझे तो अपना नौकरी के अलावा और कुछ भी याद नहीं रहता है।” मुंजा गुस्साते हुए बोली।

“हमेशा तेरे बारे में ही सोचता रहता हूँ इसलिए मेरे को और कुछ याद नहीं रहता है। तू तो इधर टीवी देखती है, और तेरे सपने भी बड़े-बड़े हो गए हैं। तुझे लगता होगा कि मैं आज तेरी शादी की सालगिरह पर तुझे ताजमहल बना कर दूंगा, लेकिन मैं गरीब आदमी है। मैं बड़े सपने नहीं देखता। तू अपना पैर इधर कर।” रत्तू ने कहा।

” मेरे पैर का क्या करेगा तू?” मुंजा ने अपने पैर आगे करते हुए कहा।

रत्तू ने अपनी जेब से पायल निकाली और उसके पैरों में बांध दीं।

“मैं कोई बादशाह नहीं हूँ, मुझे मेरी चादर में ही रहना है, ज्यादा बड़े सपने नहीं देख सकता। मुझे सब कुछ याद था, पर तेरे को सताने में मुझे मजा आता है।” रत्तू ने मुंजा का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा।

“तू बहुत बदमाश है, पर मेरे को अच्छा लगता है। तेरे को ताजमहल बनाने की जरूरत नहीं है, तू ही मेरा ताजमहल है, और मैं तेरे दिल में रहती है, ये क्या छोटा बात है।” कहते हुए मुंजा ने अपने दोनों हाथ की चूड़ियों को खनखनाते हुए उसकी छाती पर मारा, और फिर उसकी छाती के ताजमहल में मुमताज़ बनकर समा गई।

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