टूट गई उम्मीद बिखर गए सपने, दम तोड़ते परिजनों को देखते रह गए अपने
( कृष्णा भिवानीवाला )
दहशत भरी जिन्दगी
कल तक सब कुछ था
हरा भरा, आज कैसी विरानी
छाई हुई है
गांव गलियों, चौबारे में चहलकदमी थी
आज कैसी मरधट सी खामोशी छाई हुई है
सहमे हुए लोग दहशत भरी निगाहें
अरे समाज के बै शर्म नेता और ठेकेदारों चुनाव को छोड़
जनमानस की सोचो
बाजारों और अस्पताल में होती काला बाजारी को रोको
देख मंजर अस्पतालों और श्मशान का मेरा हृदय रो पड़ा
आज ऐसी मुश्किल घड़ी में
नहीं कौन किसी के साथ खड़ा
कैसी मुश्किल दौर से गुजर रहे देश के वाशिंदे
अपनों कि याद में उनके
अपने औंधे मुंह है पडे
टूट गई उम्मीद बिखर गए सपने
दम तोड़ते परिजनों को देखते रह गए अपने।
( लेखिका कृष्णा भिवानीवाला कोलकाता के बेहाला की रहने वाली हैं )

