रचनाकार

कहानी : मैं पापा बनूँगा…

( शब्द मसीहा केदारनाथ )

लॉक डाउन खुल रहा है कल से , जब ये खबर उसके कानों में पड़ी, तो वह सोचने लगा कि मामा के भी दो बच्चे हैं। मामा कब तक हमारा खर्च उठाएगा । वह अपनी बड़ी बहिन के पास गया और बोला –

“श्यामली ! तेरे पास कितने पैसे हैं ? मैं तुझे महीनेभर बाद लौटा दूंगा वापिस।”

“ज्यादा नहीं हैं, पर तू करेगा क्या पैसों का ?” बहिन ने पूछा।

“तू मुझे रेहड़ी के ताले की चाबी दे, और बता तो जरा, वो तेल की कुप्पी कहाँ रखी है।” फिर से बहिन से कहा ।

“भैया ! रेहड़ी को क्या माँ बेच रही है ?” बहिन ने पूछा ।

“नहीं , मुझे चाहिए । रेहड़ी को तैयार करूंगा कल के लिए , और तू मुझे सुबह चार बजे उठा देना ।” वह बोला ।

“चार बजे क्यों ? क्या सुबह पढ़ने का मन कर रहा है ?” बहिन ने फिर सवाल किया ।

“नहीं , मुझे माँ कहीं काम करे अच्छा नहीं लगता । किताबें बेच दी हैं, कापियाँ तेरे लिए रख दी हैं, और मेरी साइकिल के भी आठ सौ रुपये आ गए हैं । कल सुबह से मैं सब्जी का काम करूंगा । कुल मेरे पास बारह सौ रुपये हैं।”

“पैसे तो मेरे पास हैं सात सौ , लेकिन तू सब्जी का काम करेगा भैया ?” बहिन ने कहा ,

“नहीं , मैं पापा बनूँगा ताकि तू पढ़ सके और माँ तुझे चाय बनाकर पिला सके जब तू मांगे।”

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