उसी की शरण में चला जा तूँ आशिक़, बिना उसके चाहे किनारा न होगा…
■ रमेश चन्द्र सेठ (आशिक़ जौनपुरी)
(1)
बिना रब के कोई सहारा न होगा।
बिना उसकी मर्ज़ी इशारा न होगा।।
करे लाख हिकमत कोई भी यहाँ पर,
बिना उसके चाहे गुज़ारा न होगा।
सभी मुश्किलें दूर होती तुम्हारी,
कभी तुमने दिल से पुकारा न होगा।।
वो मालिक सभी का सभी उसके बंदे,
मगर तुमने रिश्ता निभाया न होगा।
क्यूँ रूठा हुआ है खुदा आज सबसे,
क्या उसको किसी ने पुकारा न होगा।
उसी की शरण में चला जा तूँ आशिक़,
बिना उसके चाहे किनारा न होगा।
(2)
ग़मों से दूर होने की भी राहें वो बताएगा…
कभीं रब को न भूलो बस वही बिगड़ी बनाएगा।
तुम्हें हर मुश्किलों से बस फ़क़त रब ही बचाएगा।।
वो मालिक है उसे भी हक़ तो है नाराज़ होने का,
मगर फिर भी करम तुमपे वो मालिक ही दिखायेगा।
हुई नादानियाँ जिसका सिला अब मिल रहा सबको,
दिया है ज़ख्म गर उसने वो चारागर भी लाएगा।
करो लाखों जतन पर बिन रज़ा उसके न कुछ होगा,
ग़मों से दूर होने की भी राहें वो बताएगा।
भरोसा छोड़कर उसका कहीं भी कुछ न पाओगे,
रहम जब वो करेगा तब सितारा जगमगायेगा।
झुका सजदे में सर उससे दुआ करते रहो आशिक़,
ख़ुदा ही हर मुसीबत से तुम्हें बाहर ले आएगा।

