खास-मेहमान

समंदर

शाम का समय था . आसमां पर बादल हो रहे थे . हल्की -हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो चुकी थी . मैं भी तेजी से एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया . बहुत से बच्चे आनंद ले रहे थे . एक दूसरे को कभी पकड़ते , कभी धकियाते और हँसने लगते . बहुत ही मजा आ रहा उन्हें देखते हुए . तभी मेरी निगाह एक ओर गई. वहाँ एक बुजुर्ग औरत बैठी हुई थी . मुझे लगा शायद उठ नहीं पा रही हैं .

मैं उस सुन्दर दृश्य को छोड़ उस तरफ बढ़ा . मगर देखा तो हैरान रह गया . ये तो कुकरेजा आंटी थीं. आँखों से आँसू बह रहे थे . चश्मे से साफ़ दिख रहे थे . बारिश की बूँदें नहीं थी .

“क्या हुआ आंटी जी ? आइये मैं मदद करता हूँ .” मैंने अपना हाथ बढ़ाया .

“नहीं पुत्तर मैं चली जावांगी. पता नहीं किन्ने दिन होर भुगतना है जिन्दगी नू .” वह चुन्नी से अपना मुँह साफ़ करते हुए बोलीं .

“तू भी आता है घूमने ?” उन्होंने पूछा .

“हाँ, कभी-कभी मन करता है तो आ जाता हूँ . अभी उन बच्चों को देख रहा था . कितना अच्छा होता कि हम बच्चे ही रहते .” मैंने कहा .

“बेटा ! सब दिन एक वरगे नहीं रहते . बचपन को तो जाना ही होता है . मेरा बिट्टू भी ऐसे ही नाचता कूदता था . बड़ा अच्छा लगता सी .” और वह कहते -कहते रुक सी गईं . उनकी आँखों में फिर जैसे गंगा जमुना चढान पर आ गई थी .

“क्या हुआ आंटी ? कोई बात हुई क्या ?” मैंने पूछा .

“कोई गल नहीं , बेटा जी ! ये तो हर घर की कहानी है . चार बर्तन होते हैं तो खटकते भी हैं . कोई नई बात नहीं हैं . मैं भी उन बच्चों को ही देख रही थी . बिट्टू अब बड़ा हो गया है न . शादी के बाद तो मेरा रहा ही नहीं जैसे . काश बच्चे बड़े न होते .”

आंटी फिर चुप हो गईं . उनके दर्द का अनुमान ही लगा सकता था . कभी आंटी को इधर-उधर बैठे नहीं देखा था . घर की सीढियों पर बैठे लोगों को आते-जाते देखती रहतीं और दुआ सलाम कर लेतीं . पर आज जो उनकी पीड़ा को जाना तो अंदाजा लगा कि हँसी के फेन के नीचे गहरा गम का समंदर भी है .

शब्द मसीहा

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