खास-मेहमान

शब्द मसीहा : दो खुशियाँ

“अरे! नाम तो लिखवा दिया है न तेरे खसम ने अस्पताल में ?” मुल्लानी उसके पेट को देखकर बोली .

“मौसी ! नाम तो लिखवा दिया है अस्पताल में .डाक्टरनी कहे थी कि पुष्टिक खाना है . कहाँ से आये खाने को ? सालभर हो लिया इनका काम भी कभी मिलता है , कभी नहीं . अब खुद ही इत्ते परेशान रहते हैं कि हम ते कुछ कहते नहीं बनता .”

“बुरा हो नासपीटों का …वोट लेने आयेंगे तो ऐसे-ऐसे वाडे करेंगे कि दुनियाँ पर स्वर्ग ले आयेंगे . मुए झूठ के पुलंदे हैं . लौडे का काम छूट गया अब रिक्शा चलाता है . बेचारे को पेट तो पालना है तीन-तीन बच्चे हैं …उनकी चोंच में चुग्गा तो डालना है न . सरकार की योजनाओं से क्या पेट भरता है !” मुल्लानी बोली .

“मौसी ! क्या बताऊँ घर में रोज का लाना खाना है . ये पेट में जो पल रहा है न जाने कैसी किस्मत ले के आया है . फ़ाकों तक की नौबत आ गई है कई बार . न जाने अब जान ही लेकर छोडेगा मेरी .”

“अरे ! पगली गाँव की मजबूत औरत है तू और दुःख तो हम गरीबों का दोस्त है . इस् से डरना कैसा ? मेहनत कर बच्चा भी ठीक होगा और चार पैसे आयेंगे तो तू भरपेट खा भी सकेगी .”

“मौसी मैं क्या काम करूँ इस् हालत में ? कौन काम देगा ? और इस् मटके को लटकाए कर भी क्या सकूंगी ?”

“देख शाम को मैं और मेरी बहू हंडा उठाएंगे शादी में . पैसा भी मिलेगा और हो सकता है भरपेट खाने को भी मिलेगा . तू भी चल . न तो बैठना है और न ही ज्यादा देर लगेगी .”

उसने हामी भर ली और शाम का इंतज़ार करने लगी . साड़ी पहनी ताकि पेट थोड़ा कम दिखे और वह शामिल हो गई . डेढ़ सौ रुपये तय हुए . घर की चाबी पडोसिन को दे दी और निकल पड़ी किस्मत से लड़ने के लिए . शायद रौशनी का हंडा ढोने से घर में कुछ रौशनी हो सके . बाजे वाले आ चुके थे . हंडे भी तैयार हो चुके थे . उसने भी अपने सिर पर हंडा उठा लिया . बारात चल पड़ी .दुल्हन के घर के पास पहुँचते ही उसे दर्द शुरू हो गये . उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे . असहनीय दर्द था . वह हंडे समेत जमीन पर बैठ गई . मुल्लानी की बहू ने उसे देखा तो उसने उस से पूछा –

“क्या हुआ ? बैठ क्यों गईं ?”

“अब नहीं हो सकेगा कुछ. मुझे लगता है समय आ गया . क्या करूँ ?”

उसने हिम्मत की और जोर से बोली – “अरे! कोई मदद करो इसे अस्पताल ले जाना पडेगा .बच्चा होने वाला है .”

बस फिर क्या था बारात के कई लोग उसकी तरफ देखने लगे . तभी कोई बोला – “अरे! बहू तो खुद डाक्टरनी है . इसे घर में ले चलो !”

उसे तुरंत घर में ले जाया गया . हाथों में मेहंदी लगी थी . लाल जोड़ा था और पूरा सिंगार किये थी डाक्टर आशा . इसी नाम से पुकार रहे थे उसे .

“अरे! तू क्या कर रही है ? आज तेरी शादी है . तू क्या करेगी इसका . किसी के साथ भिजवा देते हैं इसे अस्पताल .” आशा की माँ बोली .

“नहीं माँ ! रात के ग्यारह बज रहे हैं . बहुत देर हो जायेगी . लगता है बच्चे के ऊपर की पानी की थैली फट गई है . अभी डिलीवरी करवानी पड़ेगी वरना खतरा बढ़ जाएगा . शादी कुछ देर बाद भी हो सकती है .” आशा ने उसके कपडे उतारते हुए कहा .

“माँ ! बाहर रोज़ी होगी उसे मेरे पास भेज दो .” आशा बोली .

कुछ ही देर में उसकी सहायक रोज़ी भी आ गई . करीब एक घंटे बाद कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी . लोगों की गहमागहमी अचानक से हँसी में तब्दील हो गई थी . सब बहू की प्रशंसा कर रहे थे . उसका पति भी इंतज़ार कर रहा था कि उसकी पत्नी सजी धजी आ रही होगी . मगर आशा तो उस मुहूर्त में ही शादी करना चाहती थी सो उसने सलवार सूट पहना और पहुँच गई मंडप में . बाराती हैरान थे ऐसी अनोखी दुल्हन देखकर .

“अरे! दुल्हन सजी नहीं .” लड़के का चाचा बोला .

“डाक्टरनी है भाई साहब ! इसका सिंगार तो इसका हुनर ही है . जान बचाकर आ रही है एक गरीब की . लडकी हुई है . जिन्दगी से बड़ा सिंगार क्या होगा …हा हा हा .” आशा के पिता ने कहा .

“वाह ! अब तो समधी साहब आशीर्वाद दो आप बहू को .” बारातियों में से कोई बोला .

“आशीर्वाद ही आशीर्वाद है मेरा . मैं तो बेटी की हिम्मत और जज्बे से हैरान हूँ . मुझे नाज है इस पर .” उन्होंने पाँच हजार रुपये बहू के सिर से उबारे और बोले –

“ये पैसे उस गरीब औरत को दे दो . आज का मुहूर्त इस् से अच्छा हो ही नहीं सकता कि एक नहीं दो-दो खुशियाँ लेकर मेरी बहू आयी है .”

इधर मुल्लानी की बहू खुश थी कि बिना पैसे के सब हो गया था और पाँच हजार मिले सो अलग . अब उसे डेढ़ सौ की चिंता नहीं थी .

शब्द मसीहा केदारनाथ दिल्ली में रेलवे विभाग में इंजीनियर हैं, उन्होनें सोशल मीडिया पर वर्षो से तैर रहे फोटो का जो चित्रण किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है। फोटो मात्र काल्पनिक है लेकिन चिकित्सा धर्म का सुंदर चित्रण है एक बेटी द्वारा दो बेटियों के लिए।

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