शब्द मसीहा के बोल : एक परिवार
भाव जिंदा हैं तो हम जिंदा हैं . आज अचानक से फेसबुक मित्र को फोन लगाया .
“कैसी हो बहिन ?”
“अच्छी हूँ भैया .”
“इतने दिन से कहाँ थीं. याद नहीं किया भाई को ?”
“बस व्यस्त थी . पर फेसबुक से हमने क्या कमाया ?”
मैंने बिना सोचे कह दिया -“क्या एक भाई नहीं कमाया ?” आँखें भर आयीं थी मेरी . उधर से फोन कट गया था . कुछ देर बाद मन संयत हुआ तो मेसेज किया मैंने .
“बहिन ! न जाने किस भाव में मैं रो पड़ा . अच्छा किया फ़ोन काट दिया . कुछ गलत कहा हो तो माफ़ कर देना मुझे.”
जवाब में लिखा था -“मैं भी रो दी भाई ,,,इसे ही कहते हैं अनकहे शब्द.”
जानता हूँ मेरी बहिन लीडर हैं बहुत व्यस्त रहती हैं .पर मेरी सोच को मजबूत किया है कि यहाँ भी एक परिवार है मेरा .
शब्द मसीहा

