शब्द मसीहा की कहानी : खुशी को जीना सीखो
केदारनाथ शब्द मसीहा
पति घर में घुसा तो माहौल बदला हुआ था । बेटी एक कोने में किताब लिए बैठी थी और बेटे की आँखें लाल , चेहरा उतरा हुआ । पति को देखते ही पत्नी शुरू हो गई ।
“देख लो इसकी करतूत ! पूरी कालोनी में नाम डुबो दिया मेरा नाइंटी सिक्स परसेंट लाया है। जरा सा पढ़ लेता तो क्या घिस जाता इसका । अब वो चौहान की बीबी मुझे ताने मारेगी ।”
“तुम्हें ताने मिलने भी चाहिएँ ।”
“हाय राम ! तुम भी मुझे ही दोष दे रहे हो । सुबह से शाम तक इसका ख्याल रखती रही सो कुछ नहीं ? मेरी भी तो कलेजा करता कि कालोनी में सीना तानकर चलूँ ।”
“तभी तो कह रहा था , छत्तीस की आईं थी छप्पन हो गई हो , पर बच्चों को कैसे रखना है अभी तक नहीं सीखा । जब ये बालीबाल में कप लाया जीतकर आया था तब तुम खुश थीं और आज इतने अच्छे नंबर लाया है तो तुम मातम माना रही हो , कैसी माँ हो तुम ?”
“हाँ, तुम तो कहोगे ही , सत्तर परसेंट वाले का सीना तो चौड़ा होगा ही ।” पत्नी बोली ।
“जब सत्तर वाला तुम्हें और परिवार को अच्छे से पाल सकता है तो क्या छियानवे परसेंट वाला बेहतर ज़िंदगी नहीं जिएगा ? सिर्फ अपने अभिमान के लिए बच्चे की खुशी का गला घोंटना कहाँ की ममता है ?” पत्नी अब शांत हो गई थी ।
“चल ओए! जा मुंह धो के आ । और तुम तैयार हो जाओ । आज खाना बाहर खाएँगे । चौहान साहब के यहाँ मिठाई जरूर पहुंचाना , खुशी को जीना सीखो …नापना नहीं ।”

