रचनाकार

मौत के आगोश में सो कर, फिर भी भारत की बेटी रोती है

मेरी कलम से…

आनन्द कुमार

लकड़ियों का सेज सजा,
उसपर कोई बेटी लेटी है,
रात का है घना अंधेरा,
खाकी की जबरदस्त ड्यूटी है।

आग की लपटे निकल रही,
सन्नाटा है चित्कार रहा,
मौत के आगोश में सो कर,
फिर भी भारत की बेटी रोती है।

एक बेटी चिल्ला चिल्ला कर,
पूछती यह किसका शव है,
पहरे में जो पुलिस लगा है,
कहता मुझे बोलने का अधिकार नहीं है।

आखिर किसके इशारे पर,
गुनाह दर गुनाह का खेल जारी है,
सत्ता, पुलिस और गुण्डों में,
किसकी आपस में यारी है।

क्यों चुपचाप जलाया गया,
किसने सत्ता को अधिकार दिया,
किसके इशारे पर प्रशासन ने,
धर्म की, की अनहोनी ?

इस देश में जीने का गर,
अधिकार खतम हो गया है,
तो क्या मर जाने के बाद, परिजन से,
अंतिम संस्कार बंद हो गया है।

जांच करा लो चाहे तुम जिससे,
फांसी दे दो चाहे आरोपी को,
दुष्कर्म के बाद के कुकर्मो को,
आखिर कैसे छुपा पाओगे।

निर्लजता की हद न पार करो,
मानवता का न गला तुम घोंटो,
जिन्दा को वो जो मार दिए,
तुम मौत को दुबारा मत मारो।

लाश तुम्हें देने चाहिए थे,
परिजन को अंतिम संस्कार को,
और सलामी खाकी से करवाकर,
बचाने चाहिए थे बेटी के अंतिम सम्मान को।

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