रचनाकार

मरे हुए को और तो मत मारो

मेरी कलम से…

आनन्द कुमार

क्यों मौन हो तुम,
कुछ भी तो बोलो,
क्यों मौन हो तुम,
कुछ भी तो बोलो,
मां के पैरों से लिपटा,
बेटे का शव है यह,
काशी की सड़को पर,
मर चुकी सरकारी,
मानवता के अश्को पर,
कराहती, तड़पती, सिस्टम के,
अनगिनत छिद्रों से,
निहारती ममता के आंचल से,
विरह की अंतिम आंसू की,
चित्कारती, चिघाड़ती,
वेदना है यह।
गंगा की गोद में बसी,
विश्वनाथ की नगरी में,
कुछ लोग ऐसे क्यों,
हो जाते हैं।
काशी के कोतवाल से भी,
ना डरते हैं वे,
आखिर क्यों ?
चलो मानते हैं,
तुम ठीक न कर सके,
मौत मिल गया,
जिन्दा नहीं कर सकते,
मरे हुए को,
और तो मत मारो,
एक अदद कफन,
और एक एम्बुलेंस की,
व्यवस्था तो कर सकते थे,
लज्जा न ढक सके,
कम से कम लाश तो,
ढक सकते थे,
बनारस की संस्कृति,
व तहजीब को,
तुम पल दो पल के लिए,
बचा तो सकते थे,
महामना की बगिया को,
क्यों शर्मसार कर रहे हो,
भारतीयता को क्यों,
बदनाम कर रहे हो।
क्यों मौन हो तुम,
कुछ भी तो बोलो,
क्यों मौन हो तुम,
कुछ भी तो बोलो।।

One thought on “मरे हुए को और तो मत मारो

  • मंजर इस्लाम

    बहुत सुंदर लेखनी अति सम्वेदनशील रचना

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