भींच लेना निर्जीव देह देर तक, भूला कर शिकवे तमाम
(मधु)
❤️ देखो जब मैं कफ़न ओढ़े
अंतिम सफर को निकलू ,,
तब तुम आखरी बार
मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भर
चूम लेना शिद्दत से माथा ,
जीवन भर की शिकायतें
पिघल जाएगी उसी पल
मत करना उस दिन लिहाज
परिवार के बुजुर्गों का
भींच लेना निर्जीव देह देर तक
भूला कर शिकवे तमाम
चूम लेना बेजान उंगलियाँ
और स्नेह से भिगो देना आत्मा ...
आखरी बार सीने से लगाकर
सुना देना तुम्हारी धड़कने.
याद करना रूठकर जब जब मैं
मनाने की प्रतीक्षा
करते थक गई और
"खाना लगाऊँ" प्रश्न से सुलह कर ली
तुम जानते हो मैं चुप्पियों से
बेहिसाब घबराती हूँ
अंतिम विदा में मेरी झोली में वो सारे
लंबित मनुहार देना जो
कह ना पाया था पौरुष तुम्हारा
रोम रोम से निथरते प्रेम को
महसूस ना कर पाओगे कि
मेरी मुंदी पलके रोक लेगी अश्रु धारा उस दिन
मगर पिंड दान के भी बिन
मोक्ष पाऊँगी मैं उसी दम, उसी छीन
जैसी प्रेम में सनी आई थी
वैसे ही लबालब भेजोगे
आखरी बार चूम कर शिद्दत से माथा
Madhu_writer at film writer’s association

