रचनाकारलाॅक डाउन और भारत

प्यार “त्याग भरा”

✍️ “रमा भारती”

ए जी कहाँ हैं आज कल आप
नहीं सुनाई देती है घर में आपकी आवाज
बेटियाँ भी पूछती रहती है पूरा दिन
उनके मासूम सवालों का क्या दूँ मैं जवाब!!!

नहीं भाता थाली का खाना
अधूरा लगता हर ताना-बाना
नहीं जाऊंगा कल कह
कर रोज जाते हो
क्यूँ हमें हर पल डर के
साए में रखते हो!!

चांद की छिटकती चाँदनी
भी लगती है अधूरी-सी
बेटियों का इठलाना भी
नहीं होता तुम्हारे बिना
कि मन के हर कोने में
अर्पण से बसे हो तुम
कि अब हर कोना भी
लगता है अधूरा-सा तुम्हारे बिना!!!

कब जाएगा ये निर्मोही कोरोना
कब मुक्त होंगे तुम अपने दायित्व से
कभी इधर हमारे तरफ भी देखो ना
टकटकी लगाए हर दिन हर पल
इंतज़ार करते हैं तुम्हारा बड़े प्यार से!!!

हमारे लिए लाते हो तुम
सारे जग के करार
बिन तुम्हारे लगता सब बेकार
बाहर वक़्त है बड़ा भयंकर
जाने कब कौन हो जाये दूर
ऐसे में भी तुम नहीं हो पास हमारे
धैर्य भी करने लगा है अब सवाल मुझसे

भागने तो नहीं कहूँगी अपने कर्तव्यों से
लेकिन अब आजाओ रहे सब साथ प्यारे!!!
जाने कितनी बार आपकी
जरूरत का होता है एहसास
आप नहीं होते हो मेरे पास
अजीब सी कशमकश पैदा
कर दी है कोरोना ने हमारे बीच
साथ रहने की है हमें आस
जाने कब होंगे हम पास-पास!!!

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