रचनाकार

बात रूहानी थी रूह तक उतरी, तुम ज़िस्म तक अपने को छोड़ आई

■ डॉ. अम्बरीष राय

मैं दोपहर शाम की बात करता हूं
तुम रात अपनी सहर छोड़ आई

मैं सुबह देख आया कितने अंधरे
तुम अपनी शाम पे निसार हो गई

इन्तिज़ामों का जंगल और इंतिज़ार
तुम वफ़ा अपनी पीछे छोड़ आई

जीना था यूँ जी भरकर तुमको
उफ़ बिस्तरों में खुशियां छोड़ आई

मुहब्बत के सबब और वफ़ादारी
तुम अब कितना रिश्ता छोड़ आई

मैं बोलता बहुत हूं सब जानते हैं
कितना चुप रह गया तुम जान आई

बात रूहानी थी रूह तक उतरी
तुम ज़िस्म तक अपने को छोड़ आई

इक इंतिज़ार और क्या कहें तुमसे
चलते हैं कमबख़्त अब कोई शाम नहीं

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